विश्व योग दिवस- 21 जून, 2026
आज जब पूरी दुनिया युद्धों, आतंकवाद, हिंसा, मानसिक तनाव, पर्यावरणीय संकट और नई-नई बीमारियों की चुनौतियों से घिरी हुई है, तब मानवता एक ऐसे मार्ग की तलाश में है जो केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को भी संतुलित कर सके। ऐसे संक्रमणकाल में योग केवल एक व्यायाम पद्धति या स्वास्थ्य विज्ञान नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए आशा का प्रकाश-स्तंभ बनकर उभरा है। यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज केवल भारत का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व का उत्सव बन गया है। भारत अनादिकाल से योग की भूमि रहा है। इस भूमि के कण-कण में ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और योगियों की साधना की सुगंध समाई हुई है। वैदिक ऋषियों से लेकर भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, आदि शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी, श्री अरविन्द, आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ तक, सभी ने योग को जीवन के उत्कर्ष और मानव कल्याण का आधार माना। योग ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को ही नहीं गढ़ा, बल्कि विश्व को यह संदेश भी दिया कि मनुष्य का वास्तविक विकास भीतर से प्रारंभ होता है।
आज विश्व जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह चिंता का विषय है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, आतंकवाद की घटनाएं, साम्प्रदायिक तनाव और हथियारों की बढ़ती होड़ मानव सभ्यता को भय और असुरक्षा की ओर धकेल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान और तकनीक ने अभूतपूर्व सुविधाएं दी हैं, लेकिन इनके साथ विनाश की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में योग की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। योग मनुष्य को भीतर से शांत, संतुलित और संवेदनशील बनाता है। जब व्यक्ति के भीतर शांति होगी, तभी समाज और राष्ट्र में शांति का वातावरण निर्मित होगा। योग का मूल अर्थ ही है-जोड़ना। यह मनुष्य को मनुष्य से, आत्मा को परमात्मा से, व्यक्ति को समाज से और मानवता को सम्पूर्ण सृष्टि से जोड़ता है। योग विभाजन नहीं, एकता का दर्शन है। इसलिए वह हिंसा, घृणा, आतंक और संघर्ष का स्वाभाविक प्रतिरोधक है। जो व्यक्ति योग के माध्यम से अपने भीतर करुणा, प्रेम और अहिंसा का विकास करता है, वह किसी के प्रति द्वेष नहीं रख सकता। यही कारण है कि महात्मा गांधी की अहिंसा और भगवान महावीर का जीव-दया का संदेश भी योग की व्यापक चेतना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज मानसिक तनाव, अवसाद, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे दौड़ रहा है, लेकिन भीतर से खाली और अशांत होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में योग एक समग्र चिकित्सा-पद्धति के रूप में सामने आया है। योग शरीर, मन और भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करता है। नियमित आसन, प्राणायाम और ध्यान व्यक्ति की प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाते हैं, तनाव को कम करते हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी दुनिया ने अनुभव किया कि स्वस्थ जीवनशैली और मजबूत प्रतिरोधक क्षमता कितनी महत्वपूर्ण है। उस समय योग, प्राणायाम और ध्यान ने करोड़ों लोगों को शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी चिकित्सक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार करते हैं कि योग अनेक बीमारियों की रोकथाम और प्रबंधन में अत्यंत प्रभावी सहायक माध्यम है। यह दवाओं का विकल्प नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन का आधार है।
योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल रोगों से मुक्ति नहीं देता, बल्कि जीवन को दिशा देता है। पातंजलि ने योग को “चित्तवृत्ति निरोध” कहा है। अर्थात् मन की चंचलता और विकारों पर नियंत्रण। जब मन नियंत्रित होता है, तब व्यक्ति में निर्णय क्षमता, धैर्य और आत्मविश्वास का विकास होता है। आज की पीढ़ी, जो तनाव, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल व्यसनों के बीच जी रही है, उसके लिए योग मानसिक संतुलन का सबसे सशक्त माध्यम बन सकता है। योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका नैतिक और मानवीय आयाम भी है। यम और नियम जैसे सिद्धांत सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और संतोष की शिक्षा देते हैं। यदि इन मूल्यों को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में अपनाया जाए, तो हिंसा, भ्रष्टाचार, अपराध और सामाजिक विद्वेष जैसी समस्याओं में स्वाभाविक कमी आ सकती है। इसलिए योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक पुनर्निर्माण का भी अभियान है। भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता में योग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना भारत की सांस्कृतिक शक्ति और विश्वसनीयता का बड़ा प्रमाण है। आज दुनिया के लगभग सभी देशों में योग का अभ्यास किया जा रहा है। यह केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक विजय है। प्रधानमंत्री मोदी ने योग के साथ-साथ भारतीय अहिंसा, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, मिलेट्स आधारित भारतीय खानपान और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा को भी विश्व मंच पर स्थापित करने का प्रयास किया है। यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारत केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति बनने का सपना नहीं देखता, बल्कि मानवता को स्वस्थ, संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन का मार्ग दिखाने की क्षमता भी रखता है। यही “विश्वगुरु भारत” की अवधारणा का मूल है।
भारतीय आयुर्वेद और योग का संबंध भी अत्यंत गहरा है। आयुर्वेद शरीर की चिकित्सा करता है, जबकि योग मन और चेतना को संतुलित करता है। दोनों मिलकर स्वस्थ जीवन की संपूर्ण व्यवस्था प्रस्तुत करते हैं। आज जब दुनिया रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों और जीवनशैली जनित रोगों से चिंतित है, तब योग और आयुर्वेद एक वैकल्पिक नहीं, बल्कि पूरक एवं स्थायी समाधान के रूप में उभर रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि योग ने हर युग में एक मौन क्रांति को जन्म दिया है। इसने राजाओं को ऋषि बनाया, योद्धाओं को संत बनाया और सामान्य मनुष्यों को असाधारण व्यक्तित्व प्रदान किए। स्वामी विवेकानन्द ने योग के माध्यम से भारतीय अध्यात्म को विश्व के सामने रखा। महात्मा गांधी ने कर्मयोग और अहिंसा के बल पर एक साम्राज्य को चुनौती दी। श्री अरविन्द ने योग को मानव चेतना के विकास का साधन बनाया। यह सब योग की परिवर्तनकारी शक्ति के उदाहरण हैं। इसलिये योग दिवस उत्सव का नहीं, संकल्प का अवसर बने। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों, उद्योगों और सामाजिक संस्थाओं में योग को जीवनशैली के रूप में अपनाने की पहल हो। परिवारों में योग, ध्यान और सकारात्मक संवाद की संस्कृति विकसित हो। यदि व्यक्ति स्वस्थ होगा तो परिवार स्वस्थ होगा, परिवार स्वस्थ होगा तो समाज स्वस्थ होगा और समाज स्वस्थ होगा तो राष्ट्र एवं विश्व भी स्वस्थ और शांतिपूर्ण बन सकेगा।
योग और ध्यान की भारतीय परम्परा को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नई दिशा देने वाले महान दार्शनिक, चिंतक एवं आध्यात्मिक धर्मगुरु आचार्य महाप्रज्ञ का योगदान भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने ‘प्रेक्षाध्यान’ पद्धति के माध्यम से ध्यान की पारंपरिक अवधारणाओं को एक नया वैज्ञानिक एवं प्रयोगधर्मी स्वरूप प्रदान किया। सदियों से ध्यान मुख्यतः आध्यात्मिक साधना और मोक्ष के मार्ग के रूप में देखा जाता रहा था, किन्तु आचार्य महाप्रज्ञ ने उसे जीवन-विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और व्यक्तित्व विकास से जोड़कर एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। उनका मानना था कि मनुष्य यदि अपने शरीर, श्वास, चित्त, भावों और चेतना को ‘प्रेक्षा’ अर्थात् गहराई से देखना सीख जाए, तो उसके भीतर छिपी अनेक मानसिक विकृतियां स्वतः समाप्त होने लगती हैं। प्रेक्षाध्यान ने ध्यान को केवल साधु-संतों की साधना न रहने देकर सामान्य जनजीवन का हिस्सा बनाया।
वर्तमान समय में मानवता जिस दोराहे पर खड़ी है, वहां योग केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन गया है। यह शरीर को निरोग, मन को शांत, बुद्धि को निर्मल और आत्मा को जागृत करता है। यह युद्ध के स्थान पर शांति, हिंसा के स्थान पर करुणा और तनाव के स्थान पर संतुलन का मार्ग दिखाता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का वास्तविक संदेश भी यही है कि मनुष्य बाहर की दुनिया को बदलने से पहले अपने भीतर की दुनिया को बदले। भारत ने योग के माध्यम से विश्व को एक अमूल्य उपहार दिया है। यदि मानवता इस उपहार का सही अर्थों में उपयोग करे, तो एक नई वैश्विक चेतना का उदय संभव है-ऐसी चेतना, जिसमें शांति हो, स्वास्थ्य हो, सह-अस्तित्व हो और समस्त मानवता के कल्याण का भाव हो। यही योग का स्वप्न है, यही भारत का संदेश है और यही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
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