भारत में ताजिया निकालने की शुरुआत 12वीं शताब्दी में गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबद्दीन ऐबक के समय से हुई थी। धार्मिक एकता और सद्भाव भारत में मोहर्रम केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों जैसे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सदियों से हिंदू परिवार भी ताजिया बनाते आ रहे हैं। यह त्योहार भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की एक अद्भुत मिसाल है। मोहर्रम का महीना हमें सच्चाई के रास्ते पर चलने अन्याय का विरोध करने और मानवता के लिए किसी भी बलिदान से पीछे न हटने की प्रेरणा देता है। यह महीना आत्मनिरीक्षण सब्र और अल्लाह की इबादत करने का समय है।
मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना और इस्लाम में सबसे पवित्र महीनों में से एक है। इसे विशेष रूप से पैगंबर मुहम्मद के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की शहादत की याद में शोक के महीने के रूप में मनाया जाता है।
मोहर्रम का इतिहास और कर्बला की जंग मोहर्रम के महीने में ही 680 ईस्वी में इमाम हुसैन और जालिम शासक यजीद की सेना के बीच इराक के कर्बला में एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। यह जंग अन्याय के खिलाफ सच्चाई की लड़ाई थी। इस दौरान इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने इस्लाम धर्म और सच्चाई की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी लेकिन यजीद के सामने घुटने नहीं टेके। आशूरा (दसवां मोहर्रम ) का महत्व मोहर्रम के महीने के दसवें दिन को कहा जाता है। यह दिन इमाम हुसैन की शहादत के रूप में याद किया जाता है। शिया समुदाय के मुसलमान इस दिन काले कपड़े पहनकर जुलूस निकालते हैं और कर्बला के शहीदों की कुर्बानी को याद कर मातम मनाते हैं। ताजिया निकालने की परंपरा मोहर्रम के दौरान इमाम हुसैन के मकबरे की याद में खूबसूरत और कलात्मक ताजिया बनाए जाते हैं।
मोहर्रम का इतिहास
इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का मोहर्रम एक प्रमुख महीना है। इस माह की उनके लिए बहुत विशेषता और महत्ता है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम हिजरी संवत् का प्रथम मास है। पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन एवं उनके साथियों की शहादत इस माह में हुई थी।
मोहर्रम सब्र का इबादत का महीना है। इसी माह में पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब मुस्तफा सल्लाहों अलैह व आलही वसल्लम ने मक्का से मदीना में हिजरत की थी यानी कि आप मक्का से मदीना मुनव्वरा तशरीफ लाए।
मोहर्रम में कई लोग रोजे रखते हैं। पैगंबर मुहम्मद के नाती की शहादत तथा करबला के शहीदों के बलिदानों को याद किया जाता है। कर्बला के शहीदों ने इस्लाम धर्म को नया जीवन प्रदान किया था। कई लोग इस माह में पहले 10 दिनों के रोजे रखते हैं। जो लोग 10 दिनों के रोजे नहीं रख पाते वे 9 और 10 तारीख के रोजे रखते हैं। इस दिन जगह-जगह पानी के प्याऊ और शरबत की छबील लगाई जाती है। इस दिन पूरे देश में लोगों की अटूट आस्था का भरपूर समागम देखने को मिलता है।
सन् 60 हिजरी को यजीद इस्लाम धर्म का खलीफा बन बैठा ssss। वह अपने वर्चस्व को पूरे अरब में फैलाना चाहता था जिसके लिए उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी पैगम्बर मुहम्मद के खानदान के इकलौते चिराग इमाम हुसैन जो किसी भी हालत में यजीद के सामने झुकने को तैयार नहीं थे।
इस वजह से सन् 61 हिजरी से यजीद के अत्याचार बढ़ने लगे। ऐसे में वहां के बादशाह इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मदीना से इराक के शहर कुफा जाने लगे लेकिन रास्ते में यजीद की फौज ने कर्बला के रेगिस्तान पर इमाम हुसैन के काफिले को रोक दिया।
वह मोहर्रम का दूसरा दिन था जब हुसैन का काफिला कर्बला के तपते रेगिस्तान पर रुका। वहां पानी का एक मात्र स्रोत फरात नदी थी जिस पर यजीद की फौज ने 6 मुहर्रम से हुसैन के काफिले पर पानी के लिए रोक लगा दी थी। बावजूद इसके इमाम हुसैन नहीं झुके। यजीद के प्रतिनिधियों की इमाम हुसैन को झुकाने की हर कोशिश नाकाम होती रही और आखिर में युद्ध का ऐलान हो गया।
इतिहास कहता है कि हजरत हुसैन पैगंबर मुहम्मद के नाती तथा चौथे खलीफा (धर्मनेता) हजरत अली के बेटे थे। हजरत अली के बाद वे मक्का में खलीफा माने जाते थे किन्तु अरब के सुदूर कोने में यजीद अपने को खलीफा घोषित कर चुका था। एक बार कूफा वालों ने हजरत हुसैन को संवाद भेजा कि यदि आप हमारे यहाँ आएँ तो हम आपको खलीफा मान लेंगे। जब लंबी यात्रा करके हजरत हुसैन कूफा पहुँचे तो वहाँ यजीद के अनुचरों ने उन्हें घेर लिया। जिन्होंने उन्हें कूफा बुलाया था उन्होंने भी बड़ी गद्दारी की। हजरत हुसैन केवल तीस-चालीस लोगों के साथ थे जिनमें मासूम बच्चे एवं स्त्रियाँ भी थीं। कूफा में यजीद के गवर्नर अम्र-बिन-साद ने हजरत इमाम हुसैन के छोटे काफिले को आगे बढ़ने से रोक दिया। लाचार होकर उसी रेगिस्तानी इलाके में हजरत इमाम हुसैन को खेमा गाड़ना पड़ा।
यजीद की 80 हजार की फौज के सामने हुसैन के 72 बहादुरों ने जिस तरह जंग की उसकी मिसाल खुद दुश्मन फौज के सिपाही एक-दूसरे को देने लगे। लेकिन हुसैन कहां जंग जीतने आए थे वे तो अपने आपको अल्लाह की राह में कुर्बान करने आए थे।
उन्होंने अपने नाना और पिता के सिखाए हुए सदाचार उच्च विचार अध्यात्म और अल्लाह से बेपनाह मुहब्बत में प्या, दर्द भूख और पीड़ा सब पर विजय प्राप्त कर ली। 10वें मोहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे और आखिर में खुद अकेले युद्ध किया फिर भी दुश्मन उन्हें मार नहीं सका।
आखिर में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन खुदा का सजदा कर रहे थे तब एक यजीदी को लगा कि शायद यही सही मौका है हुसैन को मारने का। फिर उसने धोखे से हुसैन को शहीद कर दिया। लेकिन इमाम हुसैन तो मरकर भी जिंदा रहे और हमेशा के लिए अमर हो गए पर यजीद तो जीतकर भी हार गया।
उसके बाद अरब में क्रांति आई। हर रूह कांप उठी और हर आंखों से आंसू निकल आए और इस्लाम गालिब हुआ। इसी शहादत की यादगारी में इस्लाम मानने वाले मोहर्रम की पहली तारीख से दसवीं तारीख तक दस दिनों का मातम मानते हैं। मुसलमानों में जो शिया हैं उनके लिए तो यह घटना बहुत गमनाक-दर्दनाक है। वे जंजीर से अपने सीने और पीठ को पीट-पीटकर लहूलुहान कर लेते हैं। औरतें स्याह मातमी पोशाक में नजर आती हैं। वे अपने महापुरुषों की याद में छाती पीट-पीटकर रोती-चिल्लाती हैं।
इसी अवसर पर सिपर (ढाल) दुलदुल (घोड़ा) परचम (पताका) और ताजिए निकाले जाते हैं। ये सब इस भयानक युद्ध के स्मारक हैं। मोहर्रम की सातवीं से दसवीं तारीख तक दिन-रात निशान लेकर जुलूस निकाले जाते हैं। डंके बजाए जाते हैं तथा चौराहों एवं मोड़ों पर रुककर युद्ध कौशल दिखाए जाते हैं। ये सब बताते है कि इमाम किस बहादुरी के साथ दुश्मनों से लड़े थे।
हजरत हुसैन यद्यपि बहुत कम लोगों के साथ कर्बला के मैदान में घिर गए थे। उनके पास बहुत कम हथियार थे। उनके पास भोजन और पानी का प्रबंध नहीं था तथापि वे असत्य और अन्याय के विरुद्ध पूरी शक्ति के साथ युद्ध करते रहे। उन्होंने यजीद को कभी अपना खलीफा नहीं स्वीकार किया। भले ही उन्हें बड़ी-से-बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी। इसलिए यह पर्व उस आदर्श की याद दिलाता है जिसमें मनुष्य के लिए उसके जीवन से बढ़कर उसके आदर्श की महत्ता है। मनुष्य पर चाहे विपत्तियों का पहाड़ ही क्यों न टूट पड़े किंतु धर्म और सत्य के मार्ग से उसे विचलित नहीं होना चाहिए। अन्याय के सक्रिय विरोध का प्रतीक है- मोहर्रम ! यही कारण है कि मोहर्रम इस्लाम के इतिहास में अविस्मरणीय पर्व बन गया है।
आज मुसलमानों के लिए ईद हर्ष का त्योहार है तो मोहर्रम विषाद का। इस्लाम धर्म के अनुयायी अपने शहीदों की याद तरोताजा रखने के लिए इस त्योहार को बड़ी श्रद्धा से मनाते हैं। इस्लामी इतिहास की सबसे दुःखद घटना की याद में वर्ष के पहले महीने की पहली तारीख से दसवीं तारीख तक मोहर्रम मनाया जाता है।
–श्रीमती संतोष शर्मा
स्वतंत्र पत्रकार