टूटता भरोसा, बिखरता भविष्य

क्या देश की परीक्षा प्रणाली युवाओं के सपनों के साथ न्याय कर पा रही है?

बाबूलाल नागा

भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है। यह केवल एक जनसांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी ताकत भी है। हर वर्ष करोड़ों युवा सरकारी नौकरियों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। उनके लिए परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होती, बल्कि वर्षों की मेहनत, परिवार की उम्मीदों और बेहतर भविष्य का द्वार होती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद सामने आए हैं, उन्होंने इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। पेपर लीक, परीक्षा रद्द होना, परिणामों में देरी, भर्ती प्रक्रियाओं का वर्षों तक लंबित रहना और पारदर्शिता पर लगातार उठते सवाल युवाओं के मन में यह चिंता पैदा कर रहे हैं कि क्या उनकी मेहनत वास्तव में सुरक्षित है?

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला एक विद्यार्थी कई बार तीन से पांच वर्ष तक अपना पूरा समय, ऊर्जा और आर्थिक संसाधन इसी लक्ष्य के लिए समर्पित कर देता है। ग्रामीण और छोटे कस्बों से आने वाले लाखों युवा बड़े शहरों में किराये के कमरों में रहकर कोचिंग लेते हैं। परिवार अपनी सीमित आय में से बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है। माता-पिता अपने सपनों को बच्चों की सफलता से जोड़ लेते हैं। ऐसे में जब परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक होने की खबर आती है या पूरी परीक्षा रद्द कर दी जाती है, तो केवल एक परीक्षा नहीं रुकती, बल्कि लाखों परिवारों की उम्मीदें भी टूट जाती हैं।

परीक्षा प्रणाली में अविश्वास का सबसे बड़ा कारण बार-बार सामने आने वाली अनियमितताएं हैं। कई मामलों में प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले सोशल मीडिया पर वायरल हो जाते हैं। कहीं परीक्षा के बाद उत्तर कुंजी को लेकर विवाद होता है, तो कहीं भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक न्यायालयों में उलझी रहती है। इन घटनाओं से यह संदेश जाता है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं ऐसी कमजोरियां हैं, जिनका लाभ संगठित गिरोह और भ्रष्ट तत्व उठा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन विद्यार्थियों को होता है जिन्होंने पूरी ईमानदारी और मेहनत से तैयारी की होती है।

भर्ती प्रक्रियाओं में देरी भी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। कई सरकारी विभागों में लाखों पद रिक्त होने के बावजूद समय पर भर्तियां नहीं हो पातीं। विज्ञापन जारी होने से लेकर अंतिम नियुक्ति तक कई बार तीन-चार वर्ष बीत जाते हैं। इस दौरान अनेक अभ्यर्थी आयु सीमा पार कर जाते हैं और उनका अवसर हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। इससे युवाओं में निराशा और व्यवस्था के प्रति असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।

आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी एक बड़े उद्योग का रूप ले चुकी है। देश के अनेक शहर कोचिंग हब बन गए हैं, जहां लाखों विद्यार्थी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष बिताते हैं। पढ़ाई का दबाव, आर्थिक कठिनाइयां, प्रतियोगिता और भविष्य की अनिश्चितता पहले ही मानसिक तनाव पैदा करती हैं। यदि इसके ऊपर परीक्षा रद्द होने या भर्ती रुक जाने जैसी घटनाएं जुड़ जाएं, तो स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार अनिश्चितता युवाओं के आत्मविश्वास को कमजोर करती है और कई बार अवसाद जैसी समस्याओं को भी जन्म देती है।

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अवसर का अधिकार देता है। सरकारी नौकरियों में योग्यता और निष्पक्षता के आधार पर चयन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना है। इसलिए परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। यदि मेहनती और योग्य अभ्यर्थी यह महसूस करने लगें कि उनकी सफलता केवल उनकी मेहनत पर निर्भर नहीं है, तो यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाती है।

हाल के वर्षों में सरकारों ने परीक्षा सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए हैं। कड़े कानून बनाए गए हैं, डिजिटल निगरानी बढ़ाई गई है और तकनीकी सुरक्षा पर जोर दिया गया है। फिर भी आवश्यकता इस बात की है कि प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर परीक्षा परिणाम घोषित होने तक पूरी प्रक्रिया को अत्याधुनिक तकनीक, मजबूत साइबर सुरक्षा और स्पष्ट जवाबदेही के साथ संचालित किया जाए। परीक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी तय हो, भर्ती कैलेंडर का सख्ती से पालन किया जाए और अनियमितताओं के मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

यह भी आवश्यक है कि समाज स्वयं ईमानदारी और नैतिकता को महत्व दे। यदि नकल, पेपर खरीदने या अनुचित साधनों से सफलता प्राप्त करने की प्रवृत्ति को सामाजिक स्वीकृति मिलती रहेगी, तो केवल कानून व्यवस्था से समस्या का समाधान संभव नहीं होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और नैतिक नागरिक तैयार करना भी है।

देश का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर करता है और युवाओं का भविष्य एक विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली पर। यदि करोड़ों विद्यार्थियों का भरोसा टूटता है, तो इसका प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की सामाजिक, आर्थिक और लोकतांत्रिक संरचना पर भी पड़ेगा। इसलिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता नई परीक्षाएं कराने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की है जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी यह विश्वास कर सके कि उसकी मेहनत, उसकी प्रतिभा और उसके सपनों का सम्मान होगा। जब परीक्षा निष्पक्ष होगी, तभी परिणाम न्यायपूर्ण होंगे और तभी भारत की युवा शक्ति वास्तव में राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत बन सकेगी।(लेखक भारत अपडेट के संपादक हैं)

 संपर्क:वार्ड नंबर 1, जोबनेर, जिला-जयपुर (राजस्थान) मोबाइल: 9829165513

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