तुम्हारी गरीबी

तुम्हारी खाली थाली में
किसी का चुनावी वादा पलता है,
तुम्हारी टूटी छत के नीचे
किसी का भाषण सजता है।

हर बरस नए सपनों का मौसम आता है,
नारे बदल जाते हैं,
चेहरे बदल जाते हैं,
पर तुम्हारे घर का चूल्हा
वहीं का वहीं रह जाता है।

तुम्हारे आँसू
किसी के पोस्टर की चमक बन जाते हैं,
तुम्हारी मजबूरियाँ
किसी की रैली की भीड़।

वे कहते हैं—
“बस एक और मौका…”
और तुम,
उम्मीद की आख़िरी लौ बचाए,
फिर से विश्वास कर लेते हो।

सच तो यह है—
जिस दिन भूख हार जाएगी,
जिस दिन हर हाथ को सम्मान मिलेगा,
उस दिन राजनीति का अर्थ भी बदल जाएगा।

इसलिए याद रखो—
अपनी तक़दीर किसी नारे के हवाले मत करना,
अपने हिस्से की सुबह
अपने हाथों से लिखना।

क्योंकि इतिहास गवाह है—
जब जागता है आम इंसान,
तब सबसे ऊँचे सिंहासन भी
झुकना सीख जाते हैं।

राहत टीकमगढ़

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