नई दिल्ली। प्रकृति केवल हमारे जीवन का आधार नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व की सबसे बड़ी धरोहर है। जब जंगल कटते हैं तो केवल पेड़ नहीं गिरते, बल्कि जीवन का संतुलन भी टूटता है। इसी गंभीर विषय को अत्यंत मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है पर्यावरण पर आधारित नाटक “धरा रह रह के पुकारेगी “जिसे एल टी जी सभागार के ब्लेक कैनवस मे रूबरू थिएटर ग्रुप द्वारा प्रस्तुत किया गया। वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और वनों की अंधाधुंध कटाई जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, ऐसे समय में “रूबरू की प्रस्तुति, नाटक -धरा रह रह के पुकारेगी जिसकी नाटककार और निर्देशन काजल सूरी हैं , दर्शकों के लिए केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का जीवंत संदेश भी है।
नाटक की कहानी एक ईमानदार वन अधिकारी विनोद, साहसी युवती रचना और स्वार्थ तथा लालच में अंधी रानी ठाकुर के इर्द-गिर्द घूमती है। जंगलों की अवैध कटाई और वन्यजीवों के शिकार के विरुद्ध विनोद का संघर्ष धीरे-धीरे जनआंदोलन का रूप ले लेता है। रचना अपने मां के अन्याय के विरुद्ध खड़ी होकर यह सिद्ध करती है कि सत्य और प्रकृति का पक्ष सबसे बड़ा धर्म है। अंततः दोनों पेड़ों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दे देते हैं। उनका त्याग केवल दो व्यक्तियों की मृत्यु नहीं, बल्कि प्रकृति के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन जाता है। वर्षों बाद उनके पुनर्जन्म के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि प्रकृति की रक्षा का संकल्प कभी समाप्त नहीं होता।
नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह उपदेश नहीं देता, बल्कि संवेदना जगाता है। इसके संवाद दर्शकों को यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि यदि जंगल समाप्त हो गए तो स्वच्छ हवा, जल, वर्षा, जैव विविधता और अंततः मानव जीवन भी संकट में पड़ जाएगा। नाटक यह संदेश देता है कि विकास तभी सार्थक है, जब वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े।यह नाटक हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी हमारे उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमानत है।