सुनो साधो!
मैंने कहा—
“कहो कबीर!”
कबीर बोले—
“जल्दी कहो। मुझे अपनी सुनाने जंतर-मंतर जाना है।”
मैं चौंका—
“अपनी सुनाने? तुम तो लोगों की सुनते थे।”
कबीर हँसे—
“वह पुराना ज़माना था। अब सुनने वाला कौन है? आजकल सब अपनी-अपनी सुनाने में लगे हैं। मैं ही था जो सबकी सुन लेता था। अब सरकार के पास भी सुनने का समय नहीं, विपक्ष के पास भी नहीं, जनता के पास भी नहीं। इसलिए मैंने भी सुनना छोड़ दिया है।”
मैंने कहा—
“तो फिर सुनो साधो…”
कबीर बोले—
“हाँ, अब यही सबसे कठिन काम है।”
पहले काकरोच घर के कोनों में मिलते थे। बड़े समझदार जीव थे। जानते थे कि उजाले में निकलेंगे तो चप्पल पड़ेगी। इसलिए अँधेरे, सीलन और दरारों से अपनी पुरानी दोस्ती निभाते थे।
पर समय बड़ा शिक्षक है। पेपर लीक, व्यवस्था वीक और जनता की चीख ने काकरोचों को भी राजनीति पढ़ा दी।
अब वे कोनों में नहीं मिलते।
अधबीच में मिलते हैं।
रोटी और भूख के बीच।
सच और बयान के बीच।
कानून और न्याय के बीच।
जनता और व्यवस्था के बीच।
और जब से हर नाली का रास्ता जंतर-मंतर होकर जाने लगा, तब से काकरोचों ने भी समझ लिया कि सबसे सुरक्षित जगह कोना नहीं, व्यवस्था का अधबीच है। वहाँ जानलेवा चप्पल से ज़्यादा बहसें चलती हैं, निर्णय कम होते हैं।
फायर ब्रिगेड की गाड़ियों से बौछारें चलीं। लगा था काकरोच बह जाएँगे।
पर नालियों ने पानी कम, काकरोच ज़्यादा उगले।
दूर-दूर से बसों, ट्रेनों और गलियों से वे ऐसे उमड़े जैसे चुनाव आते ही वादे निकलते हैं , रंग-बिरंगे, आत्मविश्वासी और संख्या में अकूत।
सत्ता ने चप्पल उठाई।
सबसे बुज़ुर्ग काकरोच मुस्कराया..
“इतनी पुरानी तकनीक? अब इससे कुछ नहीं होगा।”
पुलिस ने ‘हिट’ छिड़का।
वह बोला—
“धन्यवाद! विरोध हमारे लिए वही काम करता है, जो खाद फसल के लिए करती है।”
अफ़सर ने फिनाइल बहाई।
काकरोच उसमें ऐसे तैरने लगे जैसे कुछ लोग योजनाओं के बजट में तैरते हैं।
झाड़ू उठाई ही थी कि सलाह आ गई—
“पहले यह सिद्ध कीजिए कि आपकी झाड़ू निष्पक्ष है।”
काकरोच अब कीट नहीं रहे थे।
वे प्रतिक्रिया नहीं, व्यवस्था की प्रवृत्ति बन चुके थे।
समाचार आया कि जंतर-मंतर पर उनका धरना चल रहा है।
तख्तियों पर लिखा था,
“अँधेरा हमारा मौलिक अधिकार है।”
“दरारें बचाओ, लोकतंत्र बचाओ।”
“चप्पल हिंसा है, सड़ांध सह-अस्तित्व है।”
देखते-देखते नेता पहुँच गए।
सरकार के प्रबंधन विभाग ने काकरोच नेताओं को बुलवाया। दो घंटे प्रतीक्षा करवाई ताकि वे अपना महत्व समझ सकें। डमरू भी बजाया, पर जादू चला नहीं।
एक नेता बोला—
“काकरोच हमारी प्राचीन विरासत हैं।”संस्कृति के प्रतीक हैं
दूसरा बोला—
“इनका संघर्ष सदियों पुराना है।”
तीसरे ने घोषणा की
“हमारी सरकार बनी तो हर सीलन को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाएगा।”
तालियाँ बजीं।
काकरोचों ने मूँछों पर ताव दिया।
पास बैठी छिपकली को पहली बार लगा कि लोकतंत्र सचमुच सबको अवसर देता है।
इधर एक गृहिणी अपनी रसोई बचाने में लगी थी।
उधर टीवी पर बहस चल रही थी—
“क्या चप्पल असंवैधानिक है?”
“क्या फिनाइल पर्यावरण-विरोधी है?”
“क्या सफ़ाई सामाजिक न्याय के विरुद्ध है?”
पाँच एंकर गरज रहे थे।
काकरोच चुपचाप पिज़्ज़ा, बर्गर, मैगी, ब्रेड और बिस्कुट कुतर रहे थे।
वे जानते थे—
खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे,
काकरोच मौज करे।
सुनो साधो!
अब डर कोनों में दुबके काकरोचों से नहीं लगता।
वे तो रोशनी होते ही भाग जाते हैं।
डर उन बहुरुपिया काकरोचों से लगता है जो अधबीच में आ बैठते हैं—
रोटी और भूख के बीच,
सच और झूठ के बीच,
कानून और न्याय के बीच,
आदमी और उसकी समझ के बीच।
और सबसे अधिक डर उन लोगों से लगता है जो बाहर से मनुष्य दिखाई देते हैं, भीतर से सड़ांध की नागरिकता लिए घूमते हैं।
काकरोच गंदगी पैदा नहीं करते।
वे केवल उसका पता बताते हैं। वे वहीं होते हैं जहां सिस्टम की गंदगी इकठ्ठा हो जाती है।
इसलिए जब किसी समाज में काकरोचों की संख्या नहीं, उनके पक्षधर बढ़ने लगें, तब समझ लीजिए कि सफ़ाई का संकट नहीं, विवेक का संकट शुरू हो चुका है।
याद रखो साधो—
काकरोचों से बड़ा खतरा काकरोच नहीं,
सड़ांध का महिमामंडन है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव