शिक्षा से जुड़ी जान जोखिम में डालने वाली चिन्ताजनक मजबूरियां

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने, विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और 2047 तक ‘विकसित भारत’ का स्वप्न साकार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन शिक्षा, नई शिक्षा नीति, आधुनिक विश्वविद्यालय और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे विषय हमारे विकास के प्रतीक बन चुके हैं। लेकिन इसी भारत की एक तस्वीर ऐसी भी है जो इन सभी उपलब्धियों को कठोर प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर देती है। मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में बरसाती उफान के बीच बेतवा नदी को पार कर स्कूल जाते मासूम बच्चों की तस्वीर केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल का आईना है जिसमें चमक अधिक है और संवेदना कम। वास्तव में किसी भी राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक मापदंड उसकी गगनचुंबी इमारतें, चौड़ी सड़कें अथवा डिजिटल सुविधाएँ नहीं होतीं, बल्कि यह होता है कि उस देश का सबसे अंतिम, सबसे कमजोर और सबसे गरीब बच्चा कितनी सुरक्षा और सम्मान के साथ शिक्षा प्राप्त कर पा रहा है। यदि किसी बच्चे को विद्यालय पहुँचने के लिए उफनती नदी, बहते नाले, टूटी पुलिया, जर्जर रास्ते या जानलेवा परिस्थितियों का सामना करना पड़े तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर भी प्रश्नचिह्न है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रत्येक बच्चे को उसके घर के समीप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अनेक गांवों में या तो विद्यालय हैं ही नहीं, और यदि हैं भी तो उनमें शिक्षक नहीं हैं। कहीं शिक्षक हैं तो विद्यार्थी नहीं, कहीं भवन हैं तो पढ़ाई नहीं, कहीं भवन ही जर्जर होकर मौत का इंतजार कर रहे हैं। ऊपर से विद्यालयों के समानीकरण की नीति ने अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों की दूरी और बढ़ा दी है। परिणामस्वरूप छोटे-छोटे बच्चों को प्रतिदिन कई किलोमीटर पैदल चलकर, नदियाँ पार कर अथवा जोखिम भरे रास्तों से होकर विद्यालय पहुँचना पड़ता है। विडंबना यह है कि आज हम शिक्षा में तकनीक के बढ़ते प्रयोग पर गर्व कर रहे हैं। स्मार्ट बोर्ड, डिजिटल कंटेंट, ऑनलाइन परीक्षाएँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित शिक्षण की चर्चा हो रही है। लेकिन जब बच्चा विद्यालय तक सुरक्षित पहुँच ही नहीं पा रहा, तब यह सारी तकनीकी प्रगति उसके लिए केवल एक दूर का सपना बनकर रह जाती है। शिक्षा की पहली शर्त सुरक्षित विद्यालय तक पहुँचना है। यदि यही सुनिश्चित नहीं है तो स्मार्ट क्लासरूम भी उस बच्चे का उपहास ही बन जाते हैं।
यह समस्या केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है। देश के अनेक राज्यों में बरसात आते ही हजारों बच्चे उफनते नालों, अस्थायी पुलों और क्षतिग्रस्त सड़कों को पार कर विद्यालय जाने को मजबूर होते हैं। कहीं नाव की व्यवस्था नहीं, कहीं पुल वर्षों से अधूरा पड़ा है, कहीं सड़क निर्माण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। कई स्थानों पर बच्चे घंटों पानी उतरने का इंतजार करते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। कई बच्चे भय के कारण विद्यालय जाना ही छोड़ देते हैं। इस प्रकार शिक्षा से वंचित होने का सबसे बड़ा कारण केवल गरीबी नहीं, बल्कि असुरक्षित आधारभूत संरचना भी बनती जा रही है। शिक्षा क्षेत्र की जानलेवा परिस्थितियाँ केवल नदी या नाले तक सीमित नहीं हैं। पिछले वर्षों में अनेक दर्दनाक घटनाएँ सामने आई हैं। कहीं जर्जर स्कूल भवन ढह गए, कहीं विद्यालयों में करंट लगने से बच्चों की मौत हुई, कहीं आग लगने से मासूम झुलस गए, कहीं ओवरलोड ऑटो और वैन दुर्घटनाग्रस्त हो गईं। दिल्ली के कोचिंग संस्थान में हुई त्रासदी ने यह भी दिखाया कि शिक्षा के नाम पर संचालित संस्थानों में सुरक्षा मानकों की कितनी घोर अनदेखी होती है। नीट जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक और उससे उपजी निराशा ने अनेक प्रतिभाशाली छात्रों को आत्महत्या तक के लिए विवश किया। क्या यह भी शिक्षा व्यवस्था की असुरक्षा का ही एक रूप नहीं है?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि हमारी सरकारी व्यवस्था अक्सर किसी दुर्घटना के बाद ही क्यों जागती है? जब तक कोई बच्चा नदी में बह नहीं जाता, भवन गिर नहीं जाता, आग नहीं लग जाती या कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता, तब तक प्रशासनिक मशीनरी की संवेदनाएँ जैसे सोई रहती हैं। घटना के बाद जांच समिति बनती है, निलंबन होता है, मुआवजा घोषित होता है और कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर सामान्य हो जाता है। यह प्रतिक्रियात्मक शासन व्यवस्था किसी भी सभ्य लोकतंत्र के लिए उचित नहीं कही जा सकती। इस विफलता के पीछे भ्रष्टाचार भी एक बड़ा कारण है। भवन निर्माण से लेकर सड़क, पुल, विद्यालय सुरक्षा प्रमाणपत्र, वाहन फिटनेस और निरीक्षण व्यवस्था तक अनेक स्तरों पर लापरवाही और भ्रष्टाचार व्याप्त है। कई बार बिना सुरक्षा मानकों की पूर्ति किए ही विद्यालयों, कोचिंग संस्थानों और परिवहन वाहनों को अनुमति मिल जाती है। निरीक्षण कागजों में पूरा हो जाता है और वास्तविकता किसी दुर्घटना के बाद सामने आती है। यदि जिम्मेदारी तय करने की संस्कृति विकसित नहीं होगी तो ऐसी घटनाएँ कभी समाप्त नहीं होंगी।
सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा केवल पुस्तकें बाँटने, छात्रवृत्ति देने और परीक्षाएँ आयोजित करने का नाम नहीं है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ है-बच्चे के लिए सुरक्षित वातावरण, सम्मानजनक विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और निर्भय आवागमन की व्यवस्था। जिस बच्चे का प्रतिदिन का संघर्ष विद्यालय तक जीवित पहुँचने का हो, वह ज्ञान की ऊँचाइयों तक कैसे पहुँचेगा? आज आवश्यकता यह है कि शिक्षा सुरक्षा को राष्ट्रीय मिशन बनाया जाए। जिन क्षेत्रों में नदी या नाले बाधा बनते हैं, वहाँ स्थायी पुलों का निर्माण प्राथमिकता से हो। जब तक पुल नहीं बनते, तब तक सुरक्षित नाव या जल परिवहन की सरकारी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। प्रत्येक विद्यालय का वार्षिक सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य हो। जर्जर भवनों को तत्काल बंद किया जाए और नए भवनों का निर्माण समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए। स्कूल वाहनों के लिए कठोर सुरक्षा मानक लागू हों तथा उनका नियमित निरीक्षण हो। प्रत्येक विद्यालय में अग्निशमन, आपदा प्रबंधन और प्राथमिक उपचार की प्रभावी व्यवस्था हो। साथ ही प्रत्येक दुर्घटना के लिए केवल निचले कर्मचारियों पर कार्रवाई न होकर उच्च अधिकारियों तक जवाबदेही तय की जाए।
विकसित भारत का सपना तभी सार्थक होगा जब विकास का लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े बच्चे तक पहुँचेगा। जिस राष्ट्र में बच्चे शिक्षा पाने के लिए जान जोखिम में डालने को विवश हों, वहाँ विकास के दावे अधूरे प्रतीत होते हैं। विश्वगुरु बनने का मार्ग केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, सुरक्षित शिक्षा और समान अवसरों से होकर गुजरता है। आज आवश्यकता नए कानून बनाने से अधिक उन कानूनों को ईमानदारी से जमीन पर उतारने की है। जब तक शासन की प्राथमिकताओं में बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च स्थान नहीं पाएगी, तब तक विकास के बड़े-बड़े दावे खोखले लगते रहेंगे। सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज-सभी को यह संकल्प लेना होगा कि देश का कोई भी बच्चा केवल इसलिए अपनी जान जोखिम में नहीं डालेगा कि वह पढ़ना चाहता है। यदि भारत को वास्तव में 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो सबसे पहले उसे अपने बच्चों के लिए सुरक्षित बचपन और सुरक्षित शिक्षा सुनिश्चित करनी होगी। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी संसदों, मंत्रालयों या महानगरों में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे विद्यालयों में लिखा जाता है जहाँ मासूम बच्चे अपने सपनों के साथ बैठते हैं। यदि उन सपनों की रक्षा नहीं हो सकी, तो विकसित भारत का स्वप्न भी अधूरा ही रह जाएगा।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133 

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