
सितंबर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध का आरंभ हुआ। मानव इतिहास के इस भीषणतम संघर्ष में करोड़ों लोग मारे गए। युद्ध ने केवल राष्ट्रों की सीमाएँ नहीं बदलीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने विज्ञान के रचनात्मक और विनाशकारी दोनों रूपों का भयावह उदाहरण प्रस्तुत किया। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम के प्रयोग ने दुनिया को यह सोचने पर विवश कर दिया कि यदि विज्ञान मानवता से विमुख हो जाए तो उसकी शक्ति कितनी विनाशकारी हो सकती है।
लेकिन इस युद्ध को याद करते हुए भारत से जुड़े एक ऐसे अध्याय को भी याद करना आवश्यक है, जिसे लंबे समय तक राजनीतिक सुविधा के कारण पर्याप्त चर्चा नहीं मिली।
जब राष्ट्र से ऊपर विचारधारा हो गई।
द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ में भारतीय कम्युनिस्टों ने ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध कहा। उनका दृष्टिकोण उस समय सोवियत संघ की अंतरराष्ट्रीय नीति से गहराई से प्रभावित था। लेकिन 1941 में जब हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया और सोवियत संघ ब्रिटेन के साथ मित्र राष्ट्रों के खेमे में आ गया, तो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का युद्ध के प्रति दृष्टिकोण भी अचानक बदल गया। जिस युद्ध को कल तक साम्राज्यवादियों का युद्ध कहा जा रहा था, वही अब “जनयुद्ध” बन गया। और यहीं से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में गंभीर प्रश्न उठते हैं।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि में CPI पर से ब्रिटिश सरकार का प्रतिबंध हटाया गया। इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी को खुले रूप से राजनीतिक गतिविधियाँ करने की अनुमति मिली और उसने ब्रिटिश युद्ध-प्रयास के समर्थन का रास्ता अपनाया। दूसरी ओर, कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ता जेलों में थे, भूमिगत आंदोलन चल रहा था और देश का एक बड़ा वर्ग अंग्रेजी शासन से निर्णायक मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था। यह विरोधाभास इतिहास के सामने आज भी खड़ा है—एक ओर भारत अंग्रेजी दासता की जंजीरें तोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था और दूसरी ओर एक संगठित राजनीतिक धारा ब्रिटिश शासन के युद्ध-प्रयास के समर्थन में खड़ी थी।
तत्कालीन कम्युनिस्ट नेतृत्व और ब्रिटिश प्रशासन के बीच हुए संपर्कों तथा सूचनाओं के आदान-प्रदान से संबंधित दस्तावेजों और संस्मरणों में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जिनसे यह प्रश्न उठता है कि क्या उस समय कुछ कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने ब्रिटिश प्रशासन को राष्ट्रवादी और भूमिगत गतिविधियों की जानकारी उपलब्ध कराई थी। यह केवल इतिहास का एक फुटनोट नहीं है। यह उस मूल प्रश्न से जुड़ा है कि किसी भारतीय राजनीतिक विचारधारा की सर्वोच्च निष्ठा भारत के प्रति थी या अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन के प्रति।
नेताजी के प्रति दृष्टिकोण
इस पूरे प्रसंग का सबसे पीड़ादायक पक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के प्रति तत्कालीन कम्युनिस्ट प्रचार में दिखाई देता है। जिस समय नेताजी विदेशी धरती पर भारत की स्वतंत्रता के लिए सेना खड़ी कर रहे थे और “दिल्ली चलो” का आह्वान कर रहे थे, उस समय कम्युनिस्ट प्रकाशनों में उनके विरुद्ध अत्यंत तीखा प्रचार किया गया। उन्हें जापानी साम्राज्यवाद का उपकरण बताने से लेकर उनके व्यक्तित्व को अपमानित करने वाली प्रचार सामग्री तक प्रकाशित हुई। नेताजी को लेकर प्रकाशित वह कुख्यात कार्टून, जिसमें उन्हें जापानी प्रधानमंत्री तोजो के अधीन एक बंधे हुए कुत्ते के रूप में चित्रित किया गया था, राजनीतिक असहमति से कहीं आगे जाकर राष्ट्रनायक के अपमान का उदाहरण बन गया। यह स्मरण रखना आवश्यक है कि नेताजी किसी विदेशी सत्ता के प्रतिनिधि नहीं थे। उनका एकमात्र घोषित लक्ष्य था—भारत की पूर्ण स्वतंत्रता।
भगत राम तलवार का रहस्य
भगत राम तलवार का प्रसंग भी इसी दौर की राजनीतिक जटिलताओं और अंतर्विरोधों को सामने लाता है। वे नेताजी की भारत से बाहर निकलने की यात्रा में सहायक के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखों में उनके ब्रिटिश तथा अन्य खुफिया नेटवर्क से संबंधों और सूचनाओं के आदान-प्रदान का भी उल्लेख मिलता है। इतिहास का यह अध्याय जितना जटिल है, उतना ही असहज भी। यह हमें सावधान करता है कि स्वतंत्रता संग्राम को केवल विचारधाराओं के चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और राष्ट्र की स्वतंत्रता के केंद्रीय प्रश्न से देखना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद भी प्रश्न समाप्त नहीं हुआ। आजादी के बाद भी भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति और राष्ट्रीय हितों के संबंध को लेकर प्रश्न उठते रहे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय विभिन्न कम्युनिस्ट नेताओं और संगठनों के वक्तव्यों तथा राजनीतिक रुख ने इस बहस को और तीखा किया।
यहाँ किसी एक व्यक्ति या संगठन को इतिहास का पूरा प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा; लेकिन उन राजनीतिक रुखों का मूल्यांकन अवश्य होना चाहिए जिनमें भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के प्रश्न पर वैचारिक अंतरराष्ट्रीयता को प्राथमिकता मिलती दिखाई दी। राष्ट्र किसी भी विचारधारा से बड़ा है। भारत किसी भी अंतरराष्ट्रीय वैचारिक सत्ता से बड़ा है और मातृभूमि के प्रति निष्ठा किसी भी राजनीतिक सिद्धांत से ऊपर होनी चाहिए। भारत में साम्यवाद के राजनीतिक उत्थान और बाद के पतन को समझने के लिए इन ऐतिहासिक प्रसंगों पर ईमानदारी से विचार करना आवश्यक है। बंगाल, त्रिपुरा और नक्सल आंदोलन के इतिहास में इसके अनेक और अध्याय मिलते हैं—उनकी चर्चा फिर कभी। आज, द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत के इस दिन, इतिहास से केवल एक बात सीखने की आवश्यकता है— विचारधारा बदल सकती है, राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय मित्र बदल सकते हैं; लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि रहना चाहिए।
प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल
कुलगुरू
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर