छतरपुर -हमारे भारतीय इतिहास में अनादि काल से गुरू और षिष्य की परम्परों को संत तुलसीदास जी ने श्री राम चरित मानस में स्पष्ट लिखा है कि राजा दषथ जी ने अपने चारों पुत्रों को कौचिंग और टयूषन प्रथा से मुक्ति दिलाने श्री राम लक्ष्मण भरत ष्षत्रूघन जी को गुरू के घर पढ़ने भेजा उनके आश्रम में रहरक षिक्षा ग्रहण करने के लिए पुत्र मोह का त्याग किया था । और गुरू ने सबसे पहिले कहा कि जो बालक अपने माता-पिता और गुरू को आदर मान सम्मान देना सीख लेगें समझ लेगें वह जीवन में कभी असफल नही होगें । सफलता के लिए बच्चों में बचवप से संस्कृति नैतिक षिक्षा और सभ्यता के संस्कार सिखा देगें ऐसे बच्चें कभी भी जीवन में गलत रास्ता तय नही करेगें । माता पिता और गुरू के बचने को जीवन में उतार लेगें ऐसे बच्चो में कभी भी नकारात्मकता के विचार नही आ सकते है । बर्तमान में आज का विद्धार्थी अपनी संस्कृति और संस्कार को भूल गये उनके बात चीत और रहने के बातावरण में अष्लीलता आने से बच्चो में मानसिक तनाव पैदा होने लगा । जिससे युवा और युवतियों में अष्लीलता और असभ्यता ने स्थान बना लिया । जिसको समाप्त करने केलिए घर-परिवार और समाज को संयुक्त परिवार के साथ संस्कारों को स्थान देना होगें ।
उपरोक्त विचार बुन्देलखण्ड के समाजसेवी संतोष गंगेले कर्मयोगी ने ष्षासकीय हायर सेकेण्ड्री स्कूल मवई जिला टीकमगढ में डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णनन जी जयन्ती पर आयोजित विचार गोष्ठी में कहें । उन्होने कहा कि हमारी संस्कृति में षिक्षक को भगवान माना गया है । इसलिए षिक्षक बनने के साथ जो रास्ता तय किया वह एक कठिन त्याग परिश्रम और देष प्रेम प्रत्येक षिक्षक में होना आवष्यक है । आज हम जिस महापुरूष भारत रत्न की जयंती मना रहे है उन्होने षिक्षकों के सम्मान केलिए टीचर्स डे की मान्यता दी थी । उनकी योग्यताऔर ईमानदारी के कारण उन्हे भारत के सर्वोच्च पद महामहिम राष्ट्रपति के पद तक पहुॅचने का अवसर मिला । भारत सरकार व्दारा उन्हे भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था ।
श्री संतोष गंगेले कर्मयोगी ने छात्र / छात्राओं को संबाधित करते हुऐ कहा कि प्रत्येक वालक के लिए प्रथम गुरू मॉ होती है, मॉ ही बच्चें को षिक्षा, संस्कार और संस्कृति सभ्यता से अपने गोद से ही परिचित करती है । प्रथम गुरू मॉ और पालक संरक्षक पिता होता है, षिक्षक एवं विद्धार्थी के बीच श्रध्दा विष्वास और भक्ति का मार्ग तय होता जो अंधकार से दूर कर प्रकाषमय जीवन को साकारा करता है । गुरू और षिक्षक के अपने अपने मार्ग अलग -अलग होते है लेकिन जहां गुरू के माध्यम से संस्कार और षिक्षक से षिक्षा मिलती है वहीं मॉ सरस्वती का उदगम ज्ञान का संगम होने से बुध्दि विवेक ज्ञान षिक्षा संस्कृति संस्कार रीति रिवाज और परम्परों से आगे जीवन को सफल संचालन करने केलिए एक मीठा फल की तरह कर्मयोगी बनकर परिवार समाज और देष की सेवा का संकल्प के साथ विद्धार्थी सम्पूर्ण आत्म विष्वास और सकारात्मकता के साथ जीवन के पथ की ओर अग्रसर हो जाता है । जीवन का पथ प्रदर्षक चरित्र निर्माण का कार्य ष्क्षिक करता है । षिक्षक को भी अपने कर्तव्यों को ज्ञान होना आवष्यक हो गया । आज भारत में भारतीय संस्कृति पतन की ओर जाने का मुख्य कारण परिवारों में अंग्रेजी विचार धारा का प्रवेष हो चुका है साथ ही माता-पिता अपने बच्चों को प्यार तो करते है लेकिन उन पर निगरानी नही करते है इसलिए बच्चों में रास्ता भटकने की प्रबृतियॉ पैदा हो रही है उन्हे बचाने और सम्भालने केलिए प्रत्येक परिवार में भारतीय महापुरूषों की चर्चायें उनके जीवनी का अध्ययन करने की प्रेरणा देना होगी । आज विद्धार्थी इंटरनेट का उपयोग करना नही जानते है अपना समय का दुरूपयोग कर रहे है जिसके परिणाम अपराघिक जगत की ओर से जा रहे है साथ ही हत्या और आत्म हत्याओं से परिणाम आ रहे है । इस अवसर पर संस्था के प्रभारी प्रार्चाय श्री एस एन षिवहरे एवं श्री बी एल अहिरवार ने अतिथि संतोष गंगेले कर्मयोगी का स्वागत किया साथ ही उन्हे देष का सर्वोच्य आदर्ष षिक्षा रत्न मिलने पर बधाईयॉ दी गई । आयोजन में बेटीओं के पद पूजन सम्मान किया गया । कार्यक्रम का संचालन षिक्षक श्री सूखलाल नामदेव जी ने किया । अतिथि संतोष गंगेले कर्मयोगी ने ष्षाला में उपस्थित सभी षिक्षकों को सम्मान कर उनके कार्यो की सराहना की ।
इसी प्रकार ष्षा0हाई स्कूल रानीपुरा संस्था के प्रार्चाय श्री योगेन्द्र कुमार मिश्रा ने समाजसेवी संतोष गंगेले के परोपकारी कार्याे की सराहना की । ष्षासकीय हाई स्कूल कन्नपुर टीकमगढ संस्था में प्रार्चाय श्री मनोहर प्रसाद पाठक, राजकुमार राय, रघुवर दयाल अहिरवार, अनुज गंगेले अवधेष पटैरिया संदीप अहिरवार राकेष अहिरवार ष्षा0मा0षाला बुदौरा की षिक्षक श्रीमती सुषमा एवं कु0 रीना अहिरवार सभी को ं षिक्षक दिवस पर सम्मान किया । सभी संसथाओं में बच्चों को विभिन्ना बिषयों के ज्ञान अर्जित कराया गया । विद्धाथिओं को षिक्षक और छात्र जीवन पर प्रकाष डाला गया ।
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