ब्रिक्स प्लस देशों की महिला नेताओं ने नवप्रवर्तन में महिला नेतृत्व पर एक बाध्यकारी घोषणा की भाषा की मांग की

नई दिल्ली, सितंबर, 2026- ब्रिक्स प्लस देशों में महिलाओं का नेतृत्व आगे बढ़ाने के लिए बाध्यकारी घोषणा की भाषा और संस्थागत तंत्र जरूरी हैं। यह बात महिला नेताओं के एक उच्च स्तरीय पैनल ने ब्रिक्स प्लस डायलॉग 2026 में कही। 18वें ब्रिक्स समिट से पूर्व इस कार्यक्रम का आयोजन गैर लाभकारी संस्था ब्रिक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा की गई जो ब्रिक्स प्लस और साझीदार देशों में व्यापार एवं वाणिज्य को बढ़ावा देती है। “हाशिए से मुख्यधारा तकः ब्रिक्स नवाचार पारितंत्र में महिलाओं के नेतृत्व को संस्थागत रूप देना” विषय पर आयोजित सत्र के लिए इस संस्था के वुमेन्स बिजनेस एलायंस (डब्लूबीए) चैप्टर्स और संस्थागत समुदाय से प्रमुख नेता एकत्रित हुए।

इस पैनल में ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका, ईरान और भारत के लोगों को एक साथ लाया गया जो ब्रिक्स समूह के पूरे भौगोलिक दायरे को दर्शाता है। पैनल में ब्रिक्स सीसीआई डब्लूई (वुमेन एंपावरमेंट) की अध्यक्ष और वाइस की प्रोग्राम लीड सुश्री रूबी सिन्हा, ब्रिक्स के पूर्व शेरपा एवं सचिव (भारत सरकार) श्री संजय भट्टाचार्य, ब्रिक्स वुमेन्स बिजनेस एलायंस- दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री लेबोगांग जुलु, ब्रिक्स डब्लूबीए ब्राजील चैप्टर की चेयरपर्सन सुश्री मोनिका मोंटेरियो, ब्रिक्स डब्लूबीए- ईरान के इनक्लूसिव इकोनॉमी वर्किंग ग्रुप की सदस्य सुश्री शादी सेदघिनेजाद और रशियन एजुकेशन एजेंसी (आरईए) की निदेशक (अंतरराष्ट्रीय परियोजना) सुश्री याना ओसेयेवा शामिल रहीं।

सत्र की शुरुआत करते हुए सुश्री रूबी सिन्हा ने कहा कि महिला नेतृत्व मार्गदर्शन पहल ग्लोबल वुमेन लीडरशिप प्रोग्राम (जीडब्लूएलपी) अपने तीसरे संस्करण में है और 2025 में ब्राजील के रियो डे जेनेरियो में ब्रिक्स वुमेन बिजनेस एलायंस के वार्षिक पूर्ण अधिवेशन के दौरान लांच की गई वुमेन इन इन्नोवेशन, साइंस एंड आंत्रप्रिन्योरशिप (वाइस) पहल इस पूरे साल सार्थक गति से आगे बढ़ा है। वाइस पहल तीन मुख्य स्तंभों- नवप्रवर्तन एवं गठबंधन, फंडिंग तक पहुंच और नीतिगत वकालत पर आधारित है और इसका मकसद ब्रिक्स प्लस समुदाय में महिलाओं को स्टेम और एआई सहित नई पीढ़ी की टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका निभाने में सक्षम बनाना है।

ब्रिक्स सीसीआई डब्लूई (वुमेन एंपावरमेंट) की अध्यक्ष एवं वाइस की प्रोग्राम लीड सुश्री रूबी सिन्हा ने कहा, “ब्रिक्स देशों में उद्यमी, वैज्ञानिक और नवप्रवर्तक के तौर पर महिलाओं की मौजूदगी बढ़ रही है, फिर भी नवप्रवर्तन को दिशा देने वाले संस्थानों फंडिंग देने वाली संस्थाओं में नेतृत्व के स्तर पर पुरुषों का दबदबा कायम है। उदाहरण के लिए, रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं के नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स को वैश्विक कैपिटल फंडिंग का 2 प्रतिशत से भी कम हिस्सा मिलता है और फंडिंग के बारे में निर्णय करने वाले लोगों में भी असंतुलन है। जैसे वीसी फर्मों में पार्टनर या फैसला लेने वाले पदों पर लगभग 15.4 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि केवल 4.9 प्रतिशत वीसी फर्मों में ज्यादातर महिला पार्टनर हैं।”

उन्होंने कहा कि हाशिये से मुख्यधारा की ओर बढ़ने के लिए सिर्फ दृश्यता ही नहीं, बल्कि एक केंद्रित संस्थागत डिजाइन की जरूरत है। इस साल कोच्चि में हमें ब्रिक्स महिला ट्रैक के तहत पहली बार संयुक्त बयान देखने को मिला जोकि एक बड़ी उपलब्धि है। जो काम अभी तक नहीं हुआ है, वह अधिक मुश्किल है और वह है इन वादों को सिर्फ एक कार्यकाल से आगे भी जारी रखना। वाइस जैसी पहल का मकसद इसी अंतर को खत्म करना है- यह एक विशेष और स्थायी पहल है जिसे ठोस संसाधनों और जवाबदेही का समर्थन हासिल है और जो इसी आधार पर आगे बढ़ती है।

पूर्व ब्रिक्स शेरपा एवं सचिव (भारत सरकार) श्री संजय भट्टाचार्य ने कहा, “हमें (महिलाओं के लिए) नेतृत्व की भूमिकाओं के लिए जोर देना होगा क्योंकि ब्रिक्स शुरू से ही एक व्यवहारिक और परियोजना उन्मुखी परियोजना रहा है जो बेहतरीन क्षेत्रों, संयुक्त कार्यक्रमों और निश्चित रूप से न्यू डेवलपमेंट बैंक पर आधारित है। अगर आप ब्रिक्स देशों पर नजर डालें तो पाएंगे कि टेक्नोलॉजी, नवप्रवर्तन और रचनात्मक उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी काफी ज्यादा है। लेकिन हमारे कुछ समाज में अभी भी शिक्षा की कमी है और समाज के कम सुविधा प्राप्त वर्गों की महिलाएं अक्सर कम सशक्त होती हैं। हमने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसमें समिट को अलग अलग समूह संबोधित करते हैं ताकि समिट के स्तर पर ही महिलाओं की महत्वपूर्ण एवं प्रमुख भूमिका को पूरी तरह से मान्यता मिल सके। लेकिन हमें अब भी कुछ और चुनौतियों का सामना करना है।”

ब्रिक्स वुमेन्स बिजनेस एलायंस- दक्षिण अफ्रीका की चेयरपर्सन सुश्री लेबोगांग जुलु ने इस अंतर को सीधे ब्रिक्स महिला उन्नति कोष से जोड़ा जिसे पहली बार 2023 में दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स राष्ट्राध्यक्षों द्वारा अनुमोदित किया गया था और अब यह डब्लूबीए की 2026 की अध्यक्षता का मुख्य लक्ष्य है। उन्होंने कहा, “ब्रिक्स महिला स्टार्टअप प्रतियोगिता के जरिए हमारे पास एक लाख से अधिक स्टार्टअप व्यवसायों का डेटाबेस है जिसमे ऐसे शानदार समाधान शामिल हैं जिन्हें ब्रिक्स देशों में बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है। लेकिन यहां ऐसा कोई प्लेटफॉर्म नहीं है जो उन्हें वीसी, बाजार और खरीदारों से जुड़ने में मदद करे। यह हमारा अगला लक्ष्य है.. 2026 की डब्लूबीए अध्यक्षता का मुख्य कार्य ब्रिक्स महिला उन्नति कोष के लिए ऐसा ढांचा तैयार करना है जो हमारे लिए भी सही हो और एनडीबी की भाषा के अनुरूप भी हो। यह कोई एक दिन का काम नहीं है और ना ही यह कोई आसान काम होने वाला है। लेकिन जैसा कि मेरे देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने कहा थाः जब तक कोई काम पूरा ना हो जाए, तब तक वह हमेशा असंभव ही लगता है।”

ब्रिक्स डब्लूबीए ब्राजील चैप्टर की चेयरपर्सन सुश्री मोनिका मोंटेरियो ने उपभोक्ता और खरीदने की क्षमता को एक ऐसा जरिया बताया जिसका पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। और साथ ही उन्होंने चैप्टर के अपने काम करने के तरीके में आए बदलाव की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा, “हमारे पास चुनने की ताकत है। ऐसी महिलाएं हैं जिनके पास पहले से ही बैंक में पैसे हैं और जब हम सुपरमार्केट जाते हैं तो हम ऐसी कंपनी चुन सकते हैं जो महिलाओं का सम्मान करती हो ना कि ऐसी कंपनी जो महिलाओं को नजरअंदाज करती हो। यही आर्थिक ताकत है। हम अपनी पसंद की कंपनियों के उत्पाद चुनेंगे और इससे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी। हम दुनिया की अर्थव्यवस्था को बदल देंगे क्योंकि हमारे पास चुनने का अधिकार है। मोंटेरियो ने भारत और ब्राजील के बीच व्यापार में साल दर साल 25 प्रतिशत की वृद्धि और नई दिल्ली में पर्यटन के साथ ही कृषि व्यवसाय, आधारभूत ढांचा और टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रतिनिधिमंडल की ओर भी इशारा किया। साथ ही उन्होंने कहा कि वाणिज्यिक साझीदारी के लिए सांस्कृतिक जान पहचान एक जरूरी शर्त है।”

ब्रिक्स डब्लूबीए के इनक्लूसिव इकोनॉमी वर्किंग ग्रुप की सदस्य सुश्री शादी सेदघिननेजाद ने कहा, “हम एक ही परिवार का हिस्सा हैं। यदि हम मिलकर काम करें, व्यवस्थित तरीके से और अधिक क्रिया उन्मुख होकर सहयोग करें तो हम ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जहां हमें फंडिंग मिल सकती है और हम एक दूसरे से मुकाबला करने के बजाय मिलकर बड़ी बाजार हिस्सेदारी हासिल कर सकते हैं। कुछ रुकावटें हैं, लेकिन हमें उनसे आगे बढ़कर चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर काम करना होगा। भले ही ईरान में हमारे सामने आने वाली कुछ चुनौतियां ब्रिक्स परिवार के दूसरे सदस्यों की मौजूदा चुनौतियों से बड़ी हो सकती हैं। मुझे विश्वास है कि ऐसी और भी चुनौतियां हैं जिनका सामना हर कोई कर रहा है और जो ब्रिक्स देशों में आम हैं।”

रशियन एजुकेशन एजेंसी (आरईए) की अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं की निदेशक सुश्री याना ओसेयेवा ने ब्रिक्स स्तर पर मानकीकरण की वकालत की जिसमें जांच पड़ताल और खरीद के लिए एक जैसे मानक और स्वतंत्र मान्यता एवं रैंकिंग प्रणाली शामिल हों। सुश्री याना ने कहा, “भारत कई देशों को मिलाकर भी उनसे ज्यादा महिला इंजीनियर तैयार करता है। लेकिन लगभग आधी महिला ग्रेजुएट, स्नातक के बाद इस उद्योग में नहीं होती हैं। इसका अर्थ है कि हमें तब कुछ करने की जरूरत है जब महिलाएं विश्वविद्यालय में हो, ना कि उसके बाद। हमें पहले ही साल से उद्योग के लोगों द्वारा पढ़ाए जाने वाले अनिवार्य पाठ्यक्रम की जरूरत है। और पहले ही साल से हमें महिलाओं के लिए भी हर कोर्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शामिल करना होगा क्योंकि जो पेशे से पहले पुरुषों के लिए माने जाते थे, उन्हें अब महिलाएं भी कर सकती हैं खासकर एआई की मदद से। ब्रिक्स प्लस देशों में प्रोग्राम और डिग्री को मान्यता देने के लिए एक्रेडिटेशन सिस्टम होना चाहिए।”

सत्र के आखिर में पैनल ने साझा प्लेटफॉर्म बनाने की जरूरत पर बल दिया जैसे ज्ञान का आदान प्रदान, सीमा पार व्यापार के तरीके, उद्यमशीलता के लिए फंडिंग और डिजिटल पहुंच।

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