नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत मजबूर थी। मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाले जिस केस ने उसकी नींद उड़ा दी थी उसके बारे में वह कोई स्पष्ट आदेश नहीं दे पाई। उसे दो ऐसी बच्चियों की जिंदगी के बारे में फैसला लेना था जिन्हें कुदरत ने जोड़कर भेजा था, लेकिन लंबी जिंदगी के लिए जिनका अलग होना जरूरी था। माता-पिता ने बच्चियों की मेडिकल जांच कराने से मना कर दिया और रिपोर्ट के अभाव में कोर्ट जिंदगी के बारे में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दे सका। वह सिर्फ जीवन के अधिकार और बच्चों के अधिकार का कानून बघारता रह गया।
यह पीड़ा व मजबूरी न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के फैसले में साफ दिखाई देती है। जो मेडिकल जांच रिपोर्ट के अभाव में सिर से जुड़ी बहनों सबा और फराह के इलाज के बारे में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दे सके। जस्टिस राधाकृष्णन ने फैसले की शुरुआत में लिखा है कि इस मामले का हल ढूंढने के लिए उनकी रातों की नींद चली गई। कई बार मानव जिंदगी को बचाने या छोड़ देने का फैसला करने में न्यायाधीश मानसिक और भावनात्मक दबाव से गुजरते हैं। पीठ ने मजबूरी जताते हुए कहा है कि मेडिकल विशेषज्ञों की स्पष्ट राय के अभाव में वह कोई भी सकारात्मक निर्देश नहीं दे पा रहे। उनके सामने ऐसी कोई विशेषज्ञ राय नहीं है जो कहती हो कि ऑपरेशन से दोनों में से कम से कम एक बच सकती है। डॉक्टरों की टीम माता-पिता के विरोध के कारण बच्चियों की जांच नहीं कर पाई। ये ठीक है कि वे गरीब हैं और उन्हें आर्थिक मदद मिलनी चाहिए, लेकिन जब दोनों बहनों की जान दांव पर लगी हो तो क्या कम से कम एक की जान नहीं बचाई जानी चाहिए।
कानून की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि सभी को जीवन का अधिकार है जिसमें सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार शामिल है। सबा-फराह का मामला कई सवाल खड़े करता है। जैसे नाबालिग का अधिकार, उन्हें मिला जीवन का अधिकार, माता-पिता का नजरिया, डॉक्टरों का कर्तव्य। इसके अलावा चिकित्सा कानून, परिवार कानून, मानवाधिकार और क्त्रिमनल लॉ भी बीच में आता है। कोर्ट को इन सवालों पर जाना चाहिए या फिर सबा- फराह के हित पर विचार करना चाहिए। क्या कोर्ट सबा-फराह के हित पर सोचते हुए माता-पिता की इच्छा को नजरअंदाज कर सकता है। सामान्य कानून में परिवार की सहमति के बगैर ऑपरेशन गैरकानूनी है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें सबा और फराह दोनों प्यारी हैं, लेकिन अगर ऑपरेशन न होने पर दोनों की मौत होने की संभावना हो और ऑपरेशन से एक के जीवित रहने की उम्मीद हो तो क्या कोर्ट का कर्तव्य नहीं है कि वह एक की जान बचाए। सबा-फराह इस अदालत की बच्चियां हैं और यह अदालत उनकी संरक्षक है।