अमृतसर। पोलियोग्रस्त होने के चलते मैं ऊंची तालीम नहीं ले पाई, लेकिन अब इन्हीं बैसाखियों के सहारे अपने बच्चों को आईपीएस, आईएएस बनाऊंगी। ये जज्बात हैं फूड एंड सप्लाई विभाग में कार्यरत कैलाश वंती के।
जूनियर ऑडिटर के पद पर कार्यरत कैलाश का हौसला पंछियों की उड़ान को भी पीछे छोड़ देता है। रोज करीब 30 किलोमीटर वह बैसाखी हाथों में थामकर घर से दफ्तर व दफ्तर से घर पहुंचती हैं। दो साल की उम्र में पोलियो होने से कैलाश अपने कदमों पर तो खड़ी नहीं हो पाती, लेकिन उनकी हसरत यही है कि बेटा अमनदीप सिंह व बेटी गगनदीप कौर को उच्च शिक्षा दिलाकर उन्हें बड़ा अधिकारी बनाए। बेटी गगनदीप बीसीए कर रही है, जबकि बेटा ग्रेजुएशन।
कैलाश वंती बताती हैं कि उनका मायका जंडियाला में है। मैट्रिक के बाद पढ़ने के लिए उसे करीब 30 किलोमीटर दूर अमृतसर आना पड़ता। 1984 में प्रदेश में आतंकवाद के चरम पर होते हुए कैलाश वंती की आगे पढ़ने की इच्छा, इच्छा ही रह गई। इसकेबाद पिता सौदागर सिंह और मां बंती देवी ने अजनाला रोड एरिया अमृतसर के निवासी अमरजीत सिंह के साथ कैलाश वंती की शादी कर दी। वह स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थे।
बाद में कैलाश को फूड एंड सप्लाई डिपार्टमेंट में नौकरी मिल गई। अब कैलाश कभी बस तो कभी रिक्शा में घर से दफ्तर आती हैं। कई बार काफी दूर तक बस या अन्य वाहन के लिए बैसाखी के सहारे ही चलना पड़ता है। कैलाश समय की पाबंद हैं। अच्छा खाना बनाती हैं, किताबें पढ़ने का भी शौक है। मैं अपने मां-बाप के साथ-साथ अपने ससुराल एवं विभाग के सभी अधिकारी व स्टाफ की शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मुझे हर कदम पर साथ दिया। मेरी हसरत यही है कि बैसाखी केसहारे ही मैं उन्नति के हर पर्वत पर चढ़ सकूं।