नानक दुखिया सब संसार : भय्यू जी हों या दाती महाराज

ढ़ह रहे हैं नैतिक मूल्यों के मानस्तम्भ, आखिर और कितना गिरेंगे हम?

-तेजवानी गिरधर-
पिछले कुछ वर्षों में राजनेताओं के बाद जिस प्रकार एक के बाद एक साधु-संत भी भ्रष्टाचार अथवा दुराचार के मामलों में फंसे हैं, उससे एक ओर जहां हमारे चारित्रिक व नैतिक पतन की पराकाष्ठा उजागर हुई है, वहीं यह भी स्थापित हुआ है कि जो तथाकथित महापुरुष दुनिया के दु:खों को दूर करने के लिए प्रतिष्ठित रहे हैं, वे भी कहीं न कहीं दु:ख के शिकार हुए हैं और होते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ है कि हमारी महान संस्कृति में जिन जीवन मूल्यों की हम दुहाई देते हैं, उनका लगातार क्षरण होता जा रहा है। जिन पर हमारी आस्था रही है, उन पर ही अब अविश्वास होने लगा है। कदाचित कुछ संत अथवा राजनेता अब भी विश्वास के काबिल हों, मगर अधिसंख्य पर संदेह होता है। ऐसे में हमारा समाज अभी और कितना गिरेगा, उसकी कल्पना मात्र से सिहरन होती है।
छतरपुर स्थित शनिधाम मंदिर के संस्थापक दाती महाराज उर्फ मदनलाल को ही लीजिए, जितने बिंदास तरीके से अपनी बात रखते हैं, जिससे उनके भीतर सच्चाई और नैतिकता का आभास होता रहा है, आज वे भी संदेह के दायरे में आ गए हैं। हो सकता है कि उनके पास ज्योतिष की विद्या कूट-कूट कर भरी हो, जिसकी वजह से उन्होंने प्रतिष्ठा हासिल की और अनेकानेक बड़ी हस्तियां के उनके चरणों में लौटती हों, मगर दुष्कर्म के मामले में फंसने के बाद सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जिन शनि महाराज के वे उपासक हैं और डंके की चोट दुनिया को दु:ख निवारण के उपाय बताते हैं, वे उनकी रक्षा क्यों नहीं कर रहे? इससे संदेह ये होता है कि कहीं वे जो उपाय बताते हैं, या तो वे कपोल कल्पित हैं या फिर शनि देव को प्रसन्न करने के जो वे रहस्य बताते हैं, उनकी पालना में ही उनसे खुद से चूक हो गई। हालांकि अभी न्यायालय को ये तय करना है कि वे दोषी हैं या फिर षड्यंत्र के शिकार हुए हैं, मगर एक बारगी तो यही लग रहा है कि दाल में जरूर काला है। मामला निर्णय तक पहुंचने में जरूर समय लगेगा और उनका क्या हश्र होगा, ये वक्त ही बताएगा, मगर इस तरह की घटनाओं से ज्योतिर्विद्या पर भी सवाल खड़े होते हैं। सीधी सपाट भाषा में कहें कि जो खुद ही अपना भविष्य नहीं जानते, वे क्या लोगों की भविष्य बताएंगे। या तो उनकी विद्या झूठी है या फिर जिस सच्ची विद्या के कारण वे जाने-पहचाने जाते हैं, उसका पालन खुद ही नहीं करते।

तेजवानी गिरधर
एक बात और। साधु-संतों के इस प्रकार दुष्कर्म के मामलों में फंसने और कष्टों से घिरने से यह तो साबित होता ही है कि इस दुनिया में सुखी कोई नहीं है। चाहे कोई कितना भी बड़ा महात्मा क्यों न हो, कितने ही संसारियों के दु:ख हरता हो, मगर सांसारिक दु:ख से वह भी अछूता नहीं रहता। आसाराम जी महाराज इसके साक्षात उदाहरण हैं। भले ही अब भी उनके प्रति हजारों लोगों के मन में अटूट आस्था और विश्वास हो, मगर पिछले कितने वर्षों से जेल में पड़े हैं। न तो उनका उनकी आर्थिक संपदा व राजनीतिक रसूकात उनको बचा पाए और न ही उनके ईष्ठ, जिनकी वे उपासना करते हैं।
इंदौर के आध्यात्मिक गुरू भय्यूजी महाराज को ही लीजिए। उन्होंने असंख्य असहायों की मदद की, उनका कल्याण किया, उनके दु:खों का निवारण किया, मगर वे भी वैसे ही दु:खों से घिरे हुए थे, जैसे कि आम आदमी घिरा रहता है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार भय्यूजी महाराज पिछले 2 साल से बहुत ज्यादा तनाव में थे और पुणे में उनका इलाज चल रहा था। हालांकि अभी तक इस राज से पर्दा नहीं उठ सका है कि वह कौन सी वजह थी, जिसकी वजह से भय्यूजी 2 साल से तनाव में थे, मगर जांच में सामने आया है कि भय्यूजी महाराज पुणे के देवयानी हॉस्पिटल के डॉक्टर श्रीरंग लिमये से इलाज करवा रहे थे। कहा जा रहा है कि भय्यूजी महाराज की पहली पत्नी की मौत के बाद उन्होंने दूसरी शादी कर ली थी जिस वजह से परिवार में बहुत कलह थी।
कुल जमा हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि विद्या अपनी जगह है, सत्कर्म अपने स्थान पर हैं, मगर कोई कितना भी बड़ा धर्मात्मा हो, वह भी अगर सत्य के मार्ग से च्युत होता है तो वह भी दंड का भागी बन जाता है। लालसा व लोभ के चक्कर में हर कोई आ ही जाता है। और इसी कारण सुखी कोई नहीं है। तभी तो कहा जाता है कि नानक दुखिया सब संसार।
एक बात और समझ में आती है। वो यह कि इस भौतिक युग में राजनेता हो या फिर साधु-महात्मा, सत्ता व प्रतिष्ठा हासिल करने के साथ उनकी दौड़ आर्थिक संसाधन जुटाने की होड़ की ओर भी बढ़ जाती है। और नाना प्रकार से हासिल किया हुआ धन ही दु:ख का कारण बन जाता है। सबसे बड़ा दु:खद पहलु ये है कि संत राजनेताओं व सत्ता के सहारे अपनी संपदा बढ़ाते हैं और राजनेता वोटों की लालच में बिना जांचे परखे हर किसी संत के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। ये गठजोड़ बहुत खतरनाक है। इससे हमारी राजनीतिक व आध्यात्मिक सत्ता तो कलंकित हो ही रही है, साथ ही अच्छे नागरिक व देशभक्त होने का जो संकल्प दिलाया जाता है, वह भी क्षीण होने लगा है। सत्ताधीश भी भ्रष्ट और हमारे प्रेरक भी भ्रष्ट। इन सब के बावजूद ये देश चल रहा है, विकास की दौड़ में सरपट दौड़ रहा है, तो जरूर कोई शक्ति है, जो इस देश को चला रही है। फिर भी हम इस मुगालते में हैं कि एक बार फिर हमारा देश विश्व गुरू बनेगा।

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