अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग दो
ताजिंदगी दैनिक नवज्योति से जुड़े रहे श्री नरेन्द्र चौहान लाजवाब इंसान तो हैं ही, खबरनसीस भी अपनी किस्म के इकलौते हैं। चंद लफ्जों में उनका इजहार करने के लिए इतना कहना ही काफी होगा- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। यह उनके मिजाज में तो है ही, लफ्जों की बाजीगरी में भी नजर आत है। डॉ. रमेश अग्रवाल की तरह लिखने का उनका अपना अलग अंदाज है। वे उर्दू के लफ्जों का जमकर तड़का लगाते हैं। अजमेर में उनके अलावा दैनिक न्याय से जुड़े रहे श्री अरविंद कौशिक के सटायर व टिट-बिट्स उर्दू की चाशनी में ही डूबे हुआ करते थे।

नरेन्द्र चौहान
श्री चौहान को हिंदी में तो महारत हासिल है ही, कई जगह ठेठ उर्दू के लफ्जों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें समझने के लिए आपको दिमाग पर पूरा जोर लगाना पड़ जाएगा। या फिर उर्दू के जानकार का दरवाजा खटखटाना पड़ जाएगा। मगर इतना तय है कि कंटेंट से भरपूर उनके आलेख को पढऩे के बाद लगेगा कि आपका वाकई किसी दमदार खबरनवीस से पाला पड़ा है। उनकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि जहां पत्थर पर रगडऩा जरूरी होता है, वहां बड़ी बेदर्दी से रगड़ते हैं और सहलाते भी बड़े खुलूस से हैं। यूं तो अनेक मुद्दों पर लिखते हैं, मगर अमूमन पर बदइंतजामियों पर जमकर तंज कसते हैं। मुल्क के ताजा तरीन मसलों पर भी सटीक लिखते रहे हैं। वे बेहतरीन कार्टूनिस्ट भी हैं। दैनिक नवज्योति में लंबे समय तक फ्रंट पेज पर उनके कार्टून शाया हुए हैं। भले ही नए खबरनवीस उन्हें न जानते हों, मगर वे अजमेर की पत्रकारिता के आइकन हैं।
गत दिनों दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी के जीवन पर रचित गौरव ग्रंथ, जिसका संपादन करना मेरी खुशनसीबी थी, में श्री चौहान की कलम से निकले जज्बात की चंद सफें बतौर बानगी पेश हैं:-
चलो अब इन कमायतों के दरमियां गलों सी गुफ्तगू करें और देखें कि इस सफर की हिमाकतों के दौर में कैसे कैसे लोग मिले हैं।

जुस्तजू हो तो सफर खत्म कहां होता है,
यूं तो हर मोड़ पर मंजिल का गुमां होता है।
तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के, हवा से पूछना
दहलीज पर ये कौन जलता है।

यहां तंगी-ए-कफस है, वहां फिक्रे-आशियाना
न यहां मेरा ठिकाना, न वहां मेरा ठिकाना।

आंखन देखा वह मंजर आज भी मेरे दिलों दिमाग में जेबस्त है। झील के किनारे गुजरते हुए अब जब पानी की उत्ताल तरंगों से टकरा शीतल हवा की बहारें मन-शरीर को छूती हैं तो उस दौर का अफसाना-ए-जिक्र जरूरी हो जाता है और अफसानों को हकीकत में तब्दील होते देखने का सुखद अहसास भी होता है।
श्री चौहान ने खुद के बारे में लिख कर भेजा था, मगर वह शाया नहीं किया जा सका, चूंकि ऐसा फॉरमेट नहीं था, मगर आपकी नज्र हैं चंद सफें-
एक मायावरी और मुख्र्तालास जी जिंदगी की क्या पहचान। मां-बाप ने नाम दिया, मास्टरों ने पढ़ाया लिखाया और कुछ दिमाग का खोखलापन खत्म किया। कहानियों, किस्सों की तिलस्मी तलब ‘नवज्योतिÓ के दरवाजे ले आई। ड्राइंग के शौक ने सफेद और काली लकीरें खींचने की आदत को परवान चढ़ाया। राजस्थान में पहली बार नवज्योति में रोजाना बड़े राष्ट्रीय रिसालों की तर्ज पर पाकेट कार्टून छपने शुरू हुए। हैडलाइन थी- ‘यही जिंदगी हैÓ, जो अभी भी तमूदार है। एक लेखकीय नजर से मामूली इंसान की तकलीफें, राजनेताओं, नौकरशाहों की उठापटक, तिकड़मबाजी, जद्दोजहद पर उठ कर कलमघसीटी की। नतीजतन ‘शहर अपने ही आइने मेंÓ ‘चकतलानÓ, ‘चिंतन का मंथनÓ, ‘मेरे इर्द गिर्दÓ, रिवर्स गियरÓ, ‘कबीरा खड़ा बाजार में, ‘नजरियाÓ जैसे मामलों में शब्दों को कागज पर उकेरा। चापलूसी और मक्कारी से परहेज ने कई परेशानियों को झेलना भी सिखाया। यह मेरे सच और मेरे झूठ हैं, इसके अलावा दिमाग में कुछ नहीं है। साफगोई की तराजू आपके हाथ में है।
कुल जमा ये कहने का मन करता है कि बिंदास जेहनियत का ऐसा इंसान व खबरनवीस अजमेर की अखबारी दुनिया का सुनहरा सितारा है।

क्रमश:

-तेजवानी गिरधर
7742067000

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