नाटक समाज को चेताने का काम करता है

साहित्यकार अर्जुन देव चारण संबोधन दे रहे हैं। मंच पर हैं राजेंद्र जोशी; लक्ष्मीनारायण रंगा और शांतनु जी।
साहित्यकार अर्जुन देव चारण संबोधन दे रहे हैं। मंच पर हैं राजेंद्र जोशी; लक्ष्मीनारायण रंगा और शांतनु जी।
दर्शक-श्रोता दीर्घा में हैं साहित्यकार उषाकिरण सोनी; आनंद कौर व्यास; भवानीशंकर व्यास विनोद; राजेश व्यास; बुलाकी शर्मा; मोहन थानवी; नवनीत पांडे; एम एम माथुर; कमल रंगा; डा नीरज दैया और संस्कृतिकर्मी।
दर्शक-श्रोता दीर्घा में हैं साहित्यकार उषाकिरण सोनी; आनंद कौर व्यास; भवानीशंकर व्यास विनोद; राजेश व्यास; बुलाकी शर्मा; मोहन थानवी; नवनीत पांडे; एम एम माथुर; कमल रंगा; डा नीरज दैया और संस्कृतिकर्मी।
बीकानेर, 17 सितम्बर। ‘नाटक प्रतिरोध का माध्यम है। वह समाज को चेताने का काम करता है, समाज में व्याप्त
विसंगतियों-विदू्रपताओं-विरोधाभासों को वह उद्घाटित करता है, इसलिए अपना प्रतिरोध करन े वाले इस माध्यम को
समाज साथ नहीं द ेता, कि ंतु आज प्रतिरोध की ज्यादा जरूरत है, इसलिए नाटक की महत्ता पहले से भी ज्यादा बढ़
गई है।
ये विचार प्रतिष्ठित नाटककार, साहित्य अकादेमी में राजस्थानी भाषा परामर्श समिति के संयोजक एवं राष्ट्रीय
नाट्य विद्यालय के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. अर्ज ुन द ेव चारण न े साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली एवं मुक्ति संस्थान की
ओर से आयोजित दो दिवसीय ‘राजस्थानी नाटकः परम्परा अर चुणौतियां’ विषयक समारोह की अध्यक्षता करते हुए
व्यक्त किए।
र ेलवे स्ट ेशन क े पास स्थित होटल राजमहल पैलेस के सभाकक्ष में आयोजित उद्घाटन सत्र में शनिवार को
डॉ. चारण ने कहा कि राजस्थानी रंगमंच छह सौ वर्षो ं से भी अधिक प्राचीन है, जिसके पुख्ता प्रमाण ‘मुंहता नैणसी री
ख्यात’ सहित अनेक प्राचीन गं्रथों मे ं मिलत े हैं। उन्हा ेंन े कहा कि कोई भी परम्परा सौ-सवा सौ साल पुरानी नहीं
होती, वरन ् वह आदिकाल से चली आ रही हा ेती है। उन्होंने अंग्र ेजी साहित्य आलोचना में चली आ रही मान्यताओं
को खारिज करते हुए कहा कि भारतीय रंगमंच की परम्परा संस्क ृत रंगमंच की समूह परम्परा से निकली है। भरतमुनि
का नाट्य शास्त्र इसका साक्ष्य है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि समाज का यह दायित्व है कि वह लोकनाट ्य
को जीवित रखने हेत ु प्रयास करे। उन्होंने र ंगकर्म में अभिनेता की पहली भूमिका बताते अपेक्षा की कि उन्हें ‘भारतीय
चित्त’ को समझने की जरूरत है। ‘मन’ बहुत महत्त्वपूर्ण है, नाटक में एवं अभिनेता ही मृत्यु और नियति का अतिक्रमण
करके अभिनीत चरित्र में प्रवेश करने की सामर्थ्य रखता है, जबकि ऐसा हम अपन े जीवन व्यवहार में नहीं कर सकते।
वरिष्ठ नाटककार लक्ष्मीनारायण र ंगा न े मुख्य अतिथि क े रूप में बोलत े हुए कहा कि र ंगमंचीय नाटक
त्रिन ेत्रीय होता है, जो भूत, वर्तमान एवं भविष्य को अपन े में समाविष्ट किए होता है। उन्होंने र ंगकर्मियों से अपेक्षा की
कि वे अर्ज न से ज्यादा से सृजन को महत्त्व द ेवें तथा समर्पित भाव से संलग्न रहें, तब ही रजस्थानी रंगमंच समर्थ हो
सकेगा।
आरम्भ में साहित्य अकादेमी क े अधिकारी शांतन ु गंगोपाध्याय न े आगंत ुकों का स्वागत किया तथा कहा कि
अकादेमी सभी भारतीय भाषाओं क े विकास के लिए विभिन्न तरह क े आयोजन करती रही है। राजस्थानी नाट्य
परम्परा पर यह दो दिवसीय समारोह निश्चित ही राजस्थानी र ंगमंच क े लिए उपलब्धिमूलक रहेगा।
मुक्ति के सचिव कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने संयोजकीय सम्बोधन में कहा कि मात ृभाषा राजस्थानी का
प्राचीन साहित्य बहुत समृद्ध रहा है तथा मौज ूदा दौर में भी निर ंतर सृजन हो रहा है, किंतु नाटक विधा मे अन्य
विधाओं की त ुलना में कम सृजन हुआ है।
उद्घाटन सत्र में आभार प्रदर्शित करत े हुए वरिष्ठ व्यंग्यकार-कथाकार बुलाकी शर्मा न े इस दो दिवसीय
समारोह में होन े वाली चर्चाओं से राजस्थानी नाट्य लेखन को विशिष्ट दृष्टि मिलन े की आशा व्यक्त की।
उदयपुर से आए वरिष्ठ कवि-समालोचक डॉ. ज्योति पुंज की अध्यक्षता में प्रथम सत्र ‘राजस्थानी नाटक
परम्परा’ विषयक हुआ, जिसमें जोधपुर के डॉ. सुखद ेव राज, बीकानेर क े अविनाश व्यास तथा हनुमानगढ़ के
दीनदयाल शर्मा न े राजस्थानी नाटक की परम्परा को दर्शात े हुए उसके इतिहास क े बारे मे ं चर्चा की एवं मौज ूदा
स्थिति से अवगत करवाया। डॉ. ज्योति पुंज ने अपन े अध्यक्षीय उद्बोधन में अपन े रंगमंचीय अन ुभवों को साझा करत े
हुए कहा कि समर्पित भाव से नाट्यकर्म में आकर ही हम इसको पल्लवित-पुष्पित कर सकते हैं। इस सत्र का
संयोजन कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया न े किया।
‘राजस्थानी नाटक अर लोकनाट ्य परम्परा’ विषय द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करत े हुए लोककला मर्मज्ञ डॉ.
श्रीलाल मोहता न े कहा कि शास्त्रो ं से भी पहले लोक है। लोक में जो आस्था और मान्यताएं हैं, वे शास्त्रों से भी पूर्व
से चली आ रही हैं तथा लोक उन्हीं से संचालित होता है, इसलिए हमें लोकमन को परखते हुए राजस्थानी नाटकों
का सृजन करना चाहिए। इस सत्र में र ंगकर्मी विपिन पुरोहित, इकबाल हुसैन और कथाकार राजेन्द्र जोशी न े
राजस्थानी नाटक के विभिन्न आयामों को अपन े पत्रवाचन में खोला। इस सत्र का संचालन युवा कवि-रंगकर्मी हरीश
बी. शर्मा न े किया।

… मोहन थानवी

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