ढहता सोना : निवेशकों का असमंजस, सरकार की उम्मीद

30_06_2013-30goldcनई दिल्ली [जाब्यू]। ग्लोबल बाजारों में रिकॉर्ड गिरावट के बाद सोना सरकार के लिए उम्मीद और निवेशकों के लिए असमंजस का सबब बन गया है। हाल की तेजी देख चुके ग्राहकों के लिए सोने की कीमतों में इस कदर कमी बला का आकर्षण है लेकिन ग्लोबल बाजार उनकी इस उम्मीदों को सहारा देता नहीं दिख रहा है। दूसरी तरफ, सरकार व रिजर्व बैंक ने बाजार में पीली धातु की थोक व सटोरिया आपूर्ति के सभी रास्तों पर पहरा बैठा दिया है। इसलिए मांग हो भी तो आपूर्ति नहीं है।

सोने की घटती चमक सरकार की आंखों में चमक लौटा रही है। मांग घटने और आपूर्ति पर रोक के कारण जुलाई-सितंबर तिमाही में सोने के आयात में अपेक्षित कमी की उम्मीद बंधने लगी है। यह कमी चालू खाते के घाटे को कम करने और रुपये को मजबूती में मदद करेगी। सोने की कीमतों में अप्रैल की गिरावट से ही सरकार को राहत मिल गई थी। अब तो कीमतों ने 45 वर्ष की सबसे तेज तिमाही गिरावट दर्ज की है।

निवेशकों के लिए यह असमंजस का वक्त है। इसलिए जून में सोने की कीमतें 13 फीसद घटने के बावजूद बाजार में अप्रैल जैसी जोरदार खरीद निकलती नहीं दिखी। हालांकि, देसी अर्थव्यवस्था में सोने की खरीद को समर्थन देने वाले महंगाई जैसे कारक मौजूद हैं, लेकिन इस बार सोने में जल्दी तेजी लौटने की धारणा नहीं बन रही है। सरकार व रिजर्व बैंक के कदम भी निवेशकों की सटोरिया खरीद को हतोत्साहित करने में कारगर रहे हैं।

अप्रैल में सोने की कीमत गिरी थी। तब इसकी खरीद के सामने सरकार व रिजर्व बैंक विवश नजर आए थे। इसलिए इस बार तैयारी नजर आई। मई से लेकर अब तक कई ताकतवर परोक्ष कदम उठाए गए, जो बाजार में सोने की आपूर्ति को सीमित करते हैं। इसी श्रृंखला में बीते शुक्रवार को बैंकों को सोना खरीदने के लिए कर्ज देने से रोक दिया गया। इससे पहले सोने के थोक आयात को सीमित किया जा चुका है। वहीं, सोने व गोल्ड फंड के बदले कर्ज, नकदी के बदले सोने की खरीद और सोने के सिक्कों व छड़ों की बिक्री पर रोक के कदम उठाए जा चुके हैं। यही वजह है कि इस बार सोना दोबारा टूटा तो बाजार में मांग तो है मगर आपूर्ति नहीं है।

यह हाल के वर्षो में पहला मौका है जब सरकार व रिजर्व बैंक ने सोने को लेकर नपीतुली परोक्ष रणनीति पर अमल किया है। इससे सोने की मांग केवल आभूषणों तक सीमित रखने में सफलता मिली है। बांबे बुलियन एसोसिएशन का आकलन है कि जुलाई से सितंबर की तिमाही के दौरान सोने का आयात निर्धारित लक्ष्य का आधा यानी करीब 150 टन रह सकता है।

बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच ने अप्रैल में आकलन किया था यदि सोने की कीमत 1,670 डॉलर प्रति औंस रहती है तो वर्ष 2014 में भारत का चालू खाते का घाटा जीडीपी के अनुपात में 3.9 फीसद पर आए जाएगा। यह पिछली तिमाही में 4.3 फीसद था। अब तो कीमत 1,200 डॉलर पर है, यानी वक्त और बाजार सरकार की मदद कर रहा है।

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