क्या ममता बनर्जी मुहम्मद अली जिन्ना के रास्ते पर चल पड़ी हैं

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुप्रसिद्ध विचारक डॉ. राकेश सिन्हा ने कहा है कि ममता बनर्जी मुहम्मद अली जिन्ना के रास्ते पर चल पड़ी हैं ! इसलिए ममता बनर्जी पर बात करने से पहले हमें यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि जिन्ना का रास्ता क्या था ! मुहम्मद अली जिन्ना कराची के एक सम्पन्न मुस्लिम व्यापारी का लड़का था जो मूलतः गुजरात में गांधीजी के जन्म स्थान के निकटवर्ती गांव का निवासी था। मुहम्मद अली जिन्ना का मूल नाम मामद था। जब मामद 17 साल का हुआ तब उसके पिता ने उसका विवाह अपने पैतृक गांव पनेली के खोजा परिवार की 14 साल की लड़की एमीबाई से कर दिया और मामद को इंगलैण्ड की एक कम्पनी में व्यापार का प्रशिक्षण लेने के लिये लंदन भेज दिया। मामद के पिता ने मामद के तीन साल के व्यय के लिए एक बैंक में बड़ी राशि भी जाम करवा दी। पिता के कराची जाते ही मामद ने अपने पिता से विद्रोह करके अपना नाम बदलकर मुहम्मद अली जिन्ना कर लिया तथा बैंक से सारे पैसे निकाल लिए। वह लंदन की एक संस्था से ड्रामा का प्रशिक्षण लेने लगा और फिर लंदन से ही कानून की पढ़ाई करके बैरिस्टर बन गया। उसकी जन्मतिथि 20 अक्टूबर 1876 थी किंतु जिन्ना ने अपनी जन्मतिथि से बगावत करके 25 दिसम्बर को अपनी जन्मतिथि घोषित किया ताकि वह लंदन वासियों को गुमराह कर सके कि मैं ईसा मसीह के जन्म दिन पर पैदा हुआ।
भारत लौटने पर जिन्ना ने अपने परिवार को त्याग दिया तथा अपनी पत्नी, अपने पिता एवं भाइयांें से सम्पर्क बंद करके बम्बई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने लगा। 40 वर्ष की आयु में जिन्ना ने अपने पारसी मुवक्किल दिनशॉ की नाबालिग लड़की रत्तन बाई को प्रेमपाश में फांस लिया। दिनशॉ के मना करने के बाद भी जिन्ना ने दिनशॉ से विद्रोह करके अपनी उम्र से लगभग 24 साल छोटी रत्तन बाई से विवाह कर लिया। कुछ वर्षों बाद जिन्ना ने रत्तन बाई से भी बगावत की तथा उसे छोड़ दिया। रत्तनबाई ने आत्महत्या कर ली। 1904 में जिन्ना कांग्रेसी नेता दादा भाई नौरोजी का सचिव बन गया तथा स्वयं को सम्प्रदायवादी राजनीति का विरोधी कहने लगा। शीघ्र ही वह कांग्रेस से विद्रोह करने पर उतर आया और सार्वजनिक मंचों से गांधीजी का अपमान करने लगा। 1912 में वह मुस्लिम लीग में शामिल हो गया।
अब जिन्ना को भारत के मुसलमानों का नेतृत्व करना था इसलिए उसने अपने मूल धर्म से बगावत करने का निश्चय किया। जिन्ना का परिवार मूलतः खोजा इस्माइली समुदाय से था जो हिन्दू लोहाना समुदाय का वंशज था तथा शिया मुसलमान था किंतु भारत के बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमानों का नेता बनने के लिए उसने स्वयं को पंजाबी राजपूत मुसलमानों का वंशज घोषित किया तथा सुन्नी मुसलमान होने का दिखावा करने लगा। 1934 के बाद जिन्ना आखण्ड भारत से विद्रोह करके पाकिस्तान की मांग का समर्थक बन गया। कांग्रेस किसी भी कीमत पर भारत के विभाजन के लिए तैयार नहीं थी इसलिए जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्यवाही दिवस का आयोजन किया जिसमें लाखों निर्दोष लोगों की जानें गईं। इस रक्तपात को देखकर ब्रिटिश शासकों की रूह कांप गई तथा कांग्रेस भी समझ गई कि जिन्ना द्वारा की जा रही पाकिस्तान बनाने की मांग स्वीकार कर लेना बेहतर है। इस प्रकार लगभग 20 लाख लोगों के शवों पर जिन्ना पाकिस्तान का जनक बन गया।
उसने भारत के मुसलमानों को यह कहकर मुस्लिम लीग के आंदोलन के साथ जोड़ा था कि वह मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की लड़ाई लड़ रहा है जिसमें सब मुसलमान सुखी रहेंगे किंतु जब पाकिस्तान बना तो जिन्ना अकेला ही हवाई जहाज में बैठ कर कराची चला गया तब भारत में रह गए मुसमलानों को उसके छल का पता चला। चूंकि पाकिस्तान में पंजाबी मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा थी इसलिए जिन्ना जीवन भर स्वयं को पंजाबी राजपूत मुसलानों का वंशज कहता रहा और सुन्नी मुसलमान होने का दिखावा करता रहा। 1948 में जिन्ना की मृत्यु के बाद जिन्ना की सम्पत्ति के उत्तराधिकार को लेकर जिन्ना की बहिन फातिमा तथा उसके पति लियाकत अली ने 24 सितम्बर 1948 को कराची उच्च न्यायालय में संयुक्त याचिका दायर करके शिया उत्तराधिकार कानून के अनुसार जिन्ना की वसीयत पर हक जताया। तब पाकिस्तान की जनता को पक्की तौर पर मालूम हुआ कि जिन्ना सुन्नी नहीं, शिया मुसलमान था। कुल मिलाकर यह था जिन्ना का रास्ता।
क्या ममता बनर्जी भी जिन्ना के रास्ते पर चल रही हैं! लगता तो कुछ ऐसा ही है, उनकी सम्पूर्ण राजनीतिक यात्रा भी बगावतों की कहानी है। वे कांग्रेस में रहीं, कांग्रेस से बगावत की। वे अटलजी की एनडीए सरकार में रहीं किंतु एनडीए से बगावत की। उन्होंने यूपीए से एलाइंस किया तथा उससे बगावत की। उन्होंने भारत में बलात्कार को खुले विकल्प वाला खुला बाजार कहकर भारत की संस्कृति से बगावत की। कलकत्ता के बहुचर्चित शारदा चिटफण्ड घोटाले तथा रोज वैली वित्तीय घोटालों में उनके मंत्रियों की भूमिका को लेकर उनकी घनघोर आलोचना हुई।
वे भारत के एक ऐसे सीमावर्ती राज्य की मुख्यमंत्री हैं जो विभाजन का दंश झेल चुका है किंतु वे बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा की भावनाओं को कुचलकर अपने मुस्लिम मतदाताओं की नाजायजा तरफदारी कर रही हैं। वर्ष 2013 से लेकर 2017 तक पश्चिमी बंगाल में कई बार बड़े साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं जिनमें ममता बनर्जी तथा उनकी सरकार पर मुस्लिम दंगाइयों की तरफदारी करने तथा हिन्दुओं की आवाज को अनसुनी करने के आरोप लगते रहे हैं। 2016 में 12 अक्टूबर को दुर्गापूजा तथा 13 अक्टूबर को मुहर्रम थी। ममता ने 12 अक्टूबर को शाम 4 बजे के बाद से दुर्गापूजा पर यह कहकर रोक लगा दी कि इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत हो सकती हैं। बंगाल में इन्द्रधनुष को रामधोनु कहा जाता है। ममता सरकार ने स्कूली किताबों में से रामधोनु शब्द निकालकर उसकी जगह रंगधोनु शब्द लिखवाया और इसका कारण भी यही बताया कि रामधोनु शब्द से मुसलमानों की भावनाएं आहत हो सकती हैं।
हाल ही में ममता बनर्जी ने दुर्गा पूजा के बाद हिन्दुओं द्वारा 1 अक्टूबर को किए जाने वाले मूर्ति विसर्जन पर रोक लगा दी है क्योंकि उस दिन मोहर्रम भी है। जब न्यायालय ने उनसे कहा कि सरकार को हिन्दू और मुसलमान दोनों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए तब उन्होंने भारत की न्यायिक व्यवस्था से विद्रोह करते हुए कहा कि चाहे मेरी गर्दन पर छुरी रख दो मैं तो वही करूंगी जो मुझे ठीक लगेगा। उनके इस वक्तव्य पर प्रोफेसर राकेश सिन्हा ने कहा है कि ‘‘यह शांतिकाल में दंगा फैलाने तथा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की साजिश है। ममता बनर्जी मुसलमानों के लिए अलग ग्रेटर बंगाल बनाना चाहती हैं तथा इसके लिए वे एक डिजाइन के तहत काम कर रही हैं।’’ वोटों की राजनीति के खातिर बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा की भावनाओं का दमन करना तथा न्यायपालिका के आदेश के प्रति अनादर दिखाना ही वास्तव में मुहम्मद अली जिन्ना का बगावती रास्ता है।
ममता बनर्जी के अंर्तचेतन में मुस्लिम मतों का जो गणित काम कर रहा है उसकी भी एक चर्चा की जानी आवश्यक है। वर्ष 1911 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 27 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है तथा हिन्दू सिमटते हुए 70.54 प्रतिशत रह गए हैं। मुर्शिदाबाद, मालदाह तथा उत्तरी दीनापुर में मुस्लिम जनसंख्या हिन्दुओं की जनसंख्या से अधिक हो गई है। राज्य के कुल 10 जिलों में मुस्लिम जनसंख्या 25 प्रतिशत या उससे अधिक हो गई है। मुर्शिदाबाद जिले में मुस्लिम जनसंख्या 66.27 प्रतिशत, मालदाह में 51.27 प्रतिशत तथा उत्तरी दीनापुर में 49.31 प्रतिशत है। बीरभूम जिले में मुस्लिम जनसंख्या 37.06 प्रतिशत, दक्षिणी चौबीस परगने में मुस्लिम जनसंख्या 35.57 प्रतिशत, नाडिया में 26.76 प्रतिशत, होरा में 26.20 प्रतिशत, उत्तरी चौबीस परगने में 25.82 प्रतिशत, कूच बिहार में 25.54 प्रतिशत तथा दक्षिणी दीनापुर जिले में 24.63 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ममता बनर्जी मुस्लिम मतों के इसी गणित को देखते हुए हिन्दुओं के दुर्गा पूजा एवं मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाने का घृणित कृत्य कर रही हैं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता
www.rajasthanhistory.com

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