स्वप्न मेरे उसके काजल में रहते हैं

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
स्वप्न मेरे उसके काजल में रहते हैं,
बच्चे ज्यों माँ के आँचल रहते हैं .

बूढ़े पीपल ने बतलाया उसके सब,
नाती-पोते तो जंगल में रहते हैं.

सह सकते जो धूप ,अनिश्चय ,प्यास,चुबन,
वो अपने दम पर मरुथल में रहते हैं.

मोर और खेतों के रिश्ते रूहानी,
दोनों के ही सुख बादल में रहते हैं

कमल एक दिन कहलायेंगे सोच यही,
बड़े गर्व से वे दलदल में रहते हैं.

फटेहाल ख़्वाबों से उनका क्या लेना,
उनके सपने तो मखमल में रहते हैं.

बागी हैं एहसास, छिपा कर जिनको हम,
लगता है जैसे चम्बल में रहते हैं.
सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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