प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु को उनकी 128वीं जन्म जयंती पर श्रद्धा सुमन Part 1

डा. जे.के.गर्ग
डा. जे.के.गर्ग
नेहरू जहाँ धर्म-विरक्त थे, वहीं गांधी अपने विश्वासों के अनुरूप ईश्वर पर आस्था रखते थे |नेहरू भारत की पारंपरिक गरीबी से मुक्ति पाने के लिए औद्योगीकरण को ही एकमात्र विकल्प मानते थे, जबकि गांधी ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था के पक्षधर थे| जहाँ नेहरू आधुनिक सरकारों में सामाजिक-व्यवस्था को सुधारने और गतिशील बनाने की क्षमता में पूरा यकीन करते थे वहीं दुसरी तरफगांधी राज-तंत्र को शंका की नजर से देखते थे,उनका विश्वास व्यक्तियों और ग्राम-समुदायों के विवेक पर केंद्रित था | इन असहमतियों के साथ दोनों के बीच बुनियादी सहमतियां भी थीं, दोनों व्यापक अर्थ में देशभक्त थे,जिन्होंने किसी जाति,भाषा,क्षेत्र,धर्म या कि किसी भी तरह अधिनायकवादी सरकार के साथ होने के बजाय अपने को पूरे देश के साथ एकाकार कर लिया था|दोनों हिंसा और आधिनायकवाद नापसंद करते थे|दोनों अधिनायकवादी सरकारों की तुलना में लोकतंत्रात्मक सरकारों को पसंद करते थे| (सन्दर्भ ——-रामचन्द्र गुहा की पुस्तक” मेकर्स ऑफ़ मोर्डन इंडिया”) नेहरू ने भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक नींव देने के लिए आवश्यक योजनायें बनाईं और उनके क्रियान्वयन के लिये उपयुक्त वातावरण भी। नेहरूजी ने अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत के सम्मान को शिखर तक पहुंचाया एवं उनकी नीतियों की वजह से ही देश के भीतर एक ऐसा राजनीतिक-आर्थिक एवं सामाजिक आधार निर्मित किया गया जिससे भारत की एकता,अखण्डता व प्रजातंत्र को कोई ताकत खत्म नहीं कर सकी। स्वतंत्र तालोकप्रिय में अनेक बार जेल यातनाओं को सहते हुए नेहरू को अपार लोएवं देशवासियों का प्यार मिला | जनता ने उनकी खुशमिजाजी और बदमिजाजी को समान रूप से सहेजा| जब युवा उनके जैसे वस्त्र पहनने लगे,उनकी तरह बोलने और लिखने लगे. इस तरह वे अघोषित प्रतिष्ठा के प्रतीक हो गये|
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