1978 में जब लोकसभा में जनता दल के एक सांसद ओमप्रकाश पुरुषार्थी ने एक निजी विधेयक लाकर देश में धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी तो मुस्लिम और ईसाई नेता इसको रोकने के लिए सड़कों पर उतर आए थे। देश की राजधानी दिल्ली में ईसाई संगठनों द्वारा इसके खिलाफ जिस मार्च का आयोजन किया गया था उसका नेतृत्व मदर टेरेसा ने किया था।
उधर ‘इस्लाम को बचाने’ के नाम पर जमीयत उलेमा के अध्यक्ष मौलाना असद मदनी भी मैदान में कूद पड़े थे।इन दोनों अल्पसंख्यक नेताओं का जोर इस बात पर था कि धर्मांतरण पर पाबंदी लगाना भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा जिसकी धारा 25 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई है। वह किसी भी धर्म को मान सकता है और उसके अनुसार आचरण कर सकता है।
हिन्दू धर्म का आधार धर्मांतरण नहीं बल्कि जन्म है जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म में यह जरूरी नहीं कि जो बच्चा किसी मुसलमान या ईसाई के घर में पैदा हो उसे जन्म से ही उस धर्म का अनुगामी मान लिया जाए। ईसाई या मुसलमान बनने के लिए इन धर्मों के धर्माचार्य विशेष संस्कारों का आयोजन करते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि हिन्दुओं ने कभी भी धर्मांतरण का प्रयास नहीं किया जबकि अन्य धर्म धर्मांतरण के सहारे ही फैले हैं।
बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन का यह कहना सोलह आने सच है कि यदि धर्मांतरण नहीं होता तो इस्लाम का नामोनिशान न होता।इस बात से कोई भी व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि इस देश में आज जो करोड़ों मुसलमान और ईसाई हैं उनके पूर्वज कभी हिन्दू हुआ करते थे।
जम्मू-कश्मीर के प्रमुख नेता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा ‘आतिशे चिनार’ में यह स्वीकार किया है कि उनके दादा हिन्दू थे और उनका नाम प्रेमनाथ कौल था। उर्दू के विख्यात कवि और पाकिस्तान के प्रवर्तक शेख मोहम्मद इकबाल ने भी यह स्वीकार किया है कि उनके दादा का नाम रतनचन्द सप्रू था।पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना ने ‘मेरी कहानी’ नामक आत्मकथा में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि उसके दादा हिन्दू थे।
आज भी इस देश में लाखों मुसलमान और ईसाई ऐसे हैं जिनके पूर्वजों ने किसी जबरदस्ती या मजबूरी के कारण धर्मांतरण किया था मगर आज भी उनके घरों में हिन्दू देवी-देवताओं की विधिवत पूजा होती है। यदि ऐसे लोग पुनः हिन्दू धर्म में स्व-इच्छा से शामिल होना चाहें तो उनकेबारे में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि हजारों सालों से विधर्मी इस देश में हिन्दुओं का धर्मांतरण करते आ रहे हैं। हजरत, ईसा के एक प्रमुख अनुयायी सेंट थामस 86 ईसवी सन् में मद्रास पहुंचे थे और उन्होंने भारत में हिन्दुओं को ईसाई बनाने का सिलसिला शुरू किया था। सेंट थामस द्वारा स्थापित आर्थोडाक्स सीरियन चर्च आज भी केरल और तमिलनाडु आदि में फलफूल रहा है। क्या यह सच नहीं है कि हजरत मोहम्मद साहब के निधन के तुरन्त बाद 111 हिजरी सन् में अरब मुसलमानों के कदम मालाबार तट पर पड़ चुके थे? इसकी साक्षी केरल के कनानोर क्षेत्र में स्थित इस्लाम की दूसरी प्राचीनतम मस्जिद चिन्नामन है। इस मस्जिद का निर्माण काजीकोड के हिन्दू शासकों ने करवाया था और अरबों को हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की खुली अनुमति प्रदान की थी।
हिन्दुओं के धर्मांतरण का सिलसिला हजारों सालों से चल रहा है।इसी तरह से 400 वर्ष पूर्व पुर्तगालियों ने गोवा में हिन्दुओं को जबरन ईसाई बनाने का जो सिलसिला शुरू किया था उसको भला कौन नहीं जानता? यह जरूर है कि अंग्रेजों ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए जबरदस्ती की बजाय प्रलोभन का सहारा लिया।
मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई पादरियों की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों और धर्मांतरण के लिए अपनाये जा रहे हथकंडों की जांच के लिए 1956 में नियोगी आयोग गठित किया गया था जिसने इस बात की पुष्टि की थी कि ईसाई पादरी धर्मांतरण के लिए जबर और प्रलोभन जैसे अनेक हथकंडों का सहारा लेते हैं।इसके बाद उड़ीसा, बिहार, अरुणाचल प्रदेश आदि राज्य सरकारों ने ईसाई पादरियों की गतिविधियों की जांच के लिए जो जांच आयोग गठित किए थे उन्होंने भी नियोगी आयोग के निष्कर्षों की ही पुष्टि की। यही कारण है कि कई राज्य सरकारों ने कानून बनाए ताकि ईसाई पादरी भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाकर उनका धर्मांतरण न करवा सकें।
रोचक बात यह है कि इस तरह के कानून कांग्रेस सरकारों ने बनाए।ईसाई पादरी गत 300 वर्ष से भारत में धर्मांतरण के काम में जुटे हुए हैं। मुस्लिम जगत में जब समृद्धि में वृद्धि हुई तो वह भी इस दौड़ में शामिल हो गया। सरकारी सूत्रों के अनुसार 2010 में विदेशों से भारत में धर्म प्रचार के लिए आठ हजार करोड़ की धनराशि प्राप्त हुई थी जो कि 2012 में बढ़कर 14 हजार करोड़ तक पहुंच गई। इसमें से अधिकांश धनराशि इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए किया गया। उर्दू समाचार पत्रों के अनुसार गत वर्ष इस्लाम धर्म के प्रचार व प्रसार के लिए देश के विभिन्न भागों में 35 विशाल इज्तिमाओं का आयोजन किया गया। इनमें से प्रत्येक पर औसतन 50 करोड़ रुपए खर्च हुए। यह धन कहां से आया? इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि देश के विभिन्न भागों में जो पृथकतावादी आंदोलनों की आग भड़की है उसके पीछे भी ऐसे प्रचारकों का हाथ रहा है जोकि विदेशों के इशारों पर इस देश के टुकड़े करना चाहते हैं।
जहां तक घर वापसी अभियान का संबंध है, सन् 1926 में आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन के रूप में हिन्दुओं से ईसाई और मुसलमान बने बन्धुओं को अपने पुराने धर्म में वापस लेने का अभियान स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में शुरू किया था। यह प्रयास कट्टरवादियों को नहीं भाया और अलीमुद्दीन नामक एक धर्मांध व्यक्ति ने स्वामी जी की निर्मम हत्या कर दी। इसी तरह से उड़ीसा में धर्मांतरण का विरोध करने वाले स्वामी लक्ष्मणानन्द को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। अब जब धर्म जागरण मंच नामक जैसे संगठनों ने घर वापसी का अभियान वापिस शुरू किया है तो मीडिया और संघ विरोधी दलों ने अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए इसका विरोध शुरू कर दिया है।
Akhil Gupta