
महात्मा गांधी का कथन है कि, “आशा अमर है,उसकी आराधना कभी विफल नही होती”।
अभी जैसे ताजा ही बात है -, अजमेर के ही ब्यावर कस्बे में पुलिस ने एक काण्ड कर डाला ।जो खबरो की सुर्खियां बन गई । अपना रौब गालिब करते हुए झूठी वाहवाही के चक्कर मे पुलिस ने वहां 14 लड़के-लड़कियो को “सैक्स रैकेट” चलाने के मामले मे ‘पीटा’ एक्ट के तहत धर लिया। पकडे गये अधिकांश आरोपी जयपुर की एक इवेन्ट – कम्पनी मे काम करनेवाले लोग थे। ये एक ख़ास समारोह मे कार्यक्रम के लिए यहां पहुंचे थे। इनकी किसी ने नहीं सुनी।और आरोपियों को जेल की हवा खिलादी गई ।
रोजाना की खबरों में ही सुर्ख़ियों में आये इस काण्ड के नामजद आरोपियों ने जेल से छूटते ही अपनी व्यथा जब रो रोकर पुलिस के आला अफसरो से साझा की और तब महकमे के ब्यावर थानाधिकारी को हटाते ही हड़कम्प मच गया है। आगे सत्यता की जांच भी खुद पुलिस ही कर रही है।कहते है मामले में राजनीति का असर था। उधर ब्यावर विधायक शंकर सिह रावत ने भी पुलिसिया झूठे काण्ड की गम्भीरता को समझते निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई की मांग कर डाली। एक्शन हुआ । खैर जो भी हो सब हो तो गया ही है।
बहुचर्चित इस पुलिसिया काण्ड से उपजे- सवाल पर सबसे ज्यादा उँगलियाँ इस बात को लेकर उठ रही हैं कि, कारगुजारी से दर्ज हुआ मामला तो कानूनी दांवपेंच और खामियों के चलते किसी तरह
रफा दफा हो सकता है लेकिन समाज की नजरों में गिराये गए इन बेचारें पढते लिखते नौजवानो के आत्म सम्मान को लौटाएगा कौन और कैसे ?
जिसकदर घिनौने आरोप इन पर कसे गये
उनका तो निराकरण होना संभव सा लगता है , चूंकि कानून के शिकंजे मे आते ही पैरोकार कई रास्ते और गलियां दिखा देते हैं,कानून की नजर से उन्हे बाइज्जत बरी भी किया जा सकता है।लेकिन अपनी ही नजरो मे गिराए गये इन नौजवानो का वो आत्म सम्मान बरसो तक लौट कहां पाएगा ! स्वय इनका ह्रदय अरसे तक कचोटता नहीं रहेगा ?
अब यहाँ बात फिर आती है आशा की, जीहाँ आशा की एक किरण उन्हें जरूर दिखाई देती है, जो
समय के गर्भ में छुपी है। ये लोग इसीके सहारे उस ‘वक्त’ का इंतजार ही कर सकते है। यही है वो ‘वक्त’ जो इन्है एक झटके मे रसातल के अंधेरों मे घसीट ले गया था । बहरहाल इंतजार रूपी साथी ही बनेैगा इनके घावो का मरहम ।
यो अगर ज्योतिष के हिसाब की मानें तो, पीडि़तो के खराब दिनमानों के कारण परिस्थितियां विपरीत होगई और इन्हें हवालात की हवा खानी पडी़। इन्होने तो सपने मे भी नही सोचा होगा, ऐसे दिन भी कभी आएंगे ? घटना मे नया मोड आने से लगता है , अब शायद फिर से दिनमान ठीक होने लगे हैं।
‘वक्त’ ऐसे बदलता है ,घटना के दो दिनो बाद ही अजमेर बार एसो.के दो पूर्व अध्यक्षों राजेश टंडन और अजय त्रिपाठी ने समाचार पत्रों के जरियें इस मामले में रही कानूनी खामियो की जानकारी साझा करते पोल खोली । उधर विधायक ने ताल ठोकी ।जागरूक जनों ने आशा की एक किरण तो दिखा ही दी है।
आरोपियों की शिकायत और बढे जनविरोध
के मद्देनजर पुलिस के आला अधिकारियों ने फिर से निष्पक्ष जांच का जिम्मा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सतर्कता ,सतीश चंद्र जांगिड़ को सौंप दिया है ।इससे पीडित और उनके परिजनों ने राहत की सांस ली है। इसी “आशा” के सहारे कि न्याय जरूर मिलेगा । किन्तु वैसे भी जबतक दूध का दूध और पानी का पानी सामने नही आजाता तब तक इन बेचारे भुक्त भोगियों के – दिलो-दिमाग पर आशंका और भय का भूत तो सवार रहेगा ही……..!