arvind apoorvaदुखद… हृदय विदारक…। शब्द नहीं हैं आज के घटनाक्रम के लिए…। बच्चों को विनम्र श्रद्धांजलि। क्योंकि उन्हें भगवान भी नहीं बचा सके। भगवान… इस धरती पर डॉक्टर हैं भगवान का दूसरा रूप। वो हमें बचाते हैं…। पर यह क्या? एक साथ इतने बच्चे… चले गए। वो उन्हें नहीं बचा सके। संवेदनाओं उन माता-पिताओं के साथ… जिन्होंने अपने लाल को लेकर कई भविष्य के ताने-बाने बुने थे। वो एक साथ धुमिल हो गए। संवेदनाएं उन माताओं के साथ… जिन्होंने नौ माह तक उन बच्चों को गर्भ में पाला और कई सपने देखे। अफसोस कि भगवान उन्हें बचा न सके। संभाग के सबसे बड़े जेएलएन अस्पताल में चार दिन में यह दूसरी सबसे बड़ी घटना है। सरकार अब भी सबक ले ले। अब भी समय है… अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार की…। कुछ करिए सरकार…नहीं तो हर साल-दो साल में ऐसी घटनाएं हृदय चीरती रहेंगी हमारा। हम सिर्फ दुख ही व्यक्त कर पाएंगे… क्योंकि वो हमारे अपने नहीं थे। अपने होते तो रोते-चिल्लाते…। अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार की सख्त जरूरत है…। कलेक्टर साहब…आप अभी-अभी अजमेर आएं हैं। आपसे काफी उम्मीदें हैं। शायद आप इस अस्पताल को ढर्रे पर ले आएं। आम आदमी परेशान हो रहा है… मर रहा है…खास लोग प्रदर्शन कर रहे हैं… राजनीति हो रही है… बस व्यवस्थाएं भी दुरुस्त हो जाए तो मेहरबानी होगी।
कम से कम यहां न हो राजनीति
अस्पताल में भी राजनीति बोल उठी। व्यवस्थाओं के नाम पर हंगामा। राजनीति से जुड़े लोग अस्पताल पहुंच गए और नारेबाजी करने लगे। क्या यह उचित था? अपनी मांग रखना उचित है, लेकिन अस्पताल में और भी मरीज हैं, उनकी भी चिंता करनी चाहिए थी। सोचिए… उनकी नारेबाजी से न तो बच्चे वापस आ सकते थे… और न ही कोई चमत्कार हो सकता था। लेकिन इतना जरूर हुआ कि उनके शोर-शराबे ने अन्य मरीजों को परेशान जरूर कर दिया। अस्पताल में इतना शोर-शराबा नहीं होना चाहिए था।
By- Arvind Apoorva
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