घुमंतू, कलाकार और दस्तकार समुदायों के मुद्दों पर हुई प्रदेश-स्तरीय जनसुनवाई; वंचित समुदायों ने अपनी पहचान के संकट पर सरकार से मांगे जवाब
जयपुर, 19 जून / लोक कला एवं लोक संगीत के कारण पूरी दुनिया में राजस्थान की एक अनूठी पहचान है लेकिन आज यह पहचान सरकार की उपेक्षा का शिकार हो गई है. इन कलाओं को आगे ले जाने के लिए लोक कलाकारों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है. दूसरी ओर लोक कलाकारों की स्थिति बेहद ही गंभीर एवं चिंताजनक बनी हुई है. राजस्थान सरकार लोक कलाकारों की अनदेखी कर रही है और यही कारण है कि उन्हें तमाम तरह के अभावों में अपना जीवन बसर करना पड़ रहा है. जयपुर के शहीद स्मारक पर दिए जा रहे ’जवाब दो’ धरने में आज प्रदेश भर से आए लोक कलाकारों ने सरकार द्वारा उनकी निरंतर की जा रही उपेक्षा का आरोप लगाया. उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि राजस्थान के समस्त कलाकारों एवं दस्तकारों का पंचायतवार एक सर्वे करवाया जाए और इन सभी के पहचान के दस्तावेज – कलाकार परिचय पत्र, राशन कार्ड, फोटो पहचान पत्र आदि बनाये जायें. इन्हें अपने गाँव या शहर में निःशुल्क आवासीय भूखण्ड दिये जाएं. इनके लिए विशेष आवासीय योजना बनाई जाए. कई लोग बरसों से चारागाह भूमि पर मकान बना कर रह रहे है उन्हें उस जमीन को आबादी में परिवर्तन कर उपलब्ध कराया जाये और इन्हें बी पी एल में भी चयनित किया जाये.
शहीद स्मारक पर पिछले 1 जून से दिए जा रहे ‘जवाब दो’ धरने में आज प्रदेश के लोक कलाकारों व हाशिये पर जी रहे घुंमतू, अर्ध घुमंतु और विमुक्त समुदायों के मुद्दों पर एक जनसुनवाई आयोजित की गई. इस जनसुनवाई में जोधपुर, नागौर, जयपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, भरतपुर और राजस्थान के अन्य जिलों से रेबारी, नट, कालबेलिया, सांसी, मांगनियार, बंजारा, कलंदर, मिरासी, गाड़िया लोहार, कंजर, आदि समुदायों से आये लोगों ने हिस्सा लिया.
घुमंतू एवं कलाकार समुदायों के मुद्दों पर काम करने वाले पारस बंजारा ने बताया कि आज भी इन समुदायों की समस्याओं के प्रति सरकार गंभीर नहीं है. उन्होंने कहा कि ये ज़रूरी है कि घुमंतू, अर्धघुमंतू एवं विमुक्त समुदायों के लिए राज्य स्तर पर एक घुमंतू आयोग बनाया जाये और साथ ही सहरिया जनजाति की तर्ज़ पर कलाकारों और घुमंतुओं के लिए विशेष विकास योजनाएं बनाई जायें. उन्होंने सरकार से मांग की कि कलाकारों पर खर्च किया जाने वाला बजट सिर्फ शास्त्रीय कलाकारों पर ही खर्च न किया जाये बल्कि लोक कलाकारों के कल्याण और प्रोत्साहन पर भी खर्च किया जाये और जो घुमंतू लोग वन क्षेत्रों में रहते हैं उन्हें वन अधिकार मान्यता कानून, 2006 के तहत भूमि के पट्टे दिए जायें.
शव दफ़नाने के लिए भी नहीं मिलती ज़मीन
सुनवाई में आये मशहूर भपंग वादक ज़हूर खान के बेटे महमूद खां ने कहा कि कुछ लोगों को उनकी कला की वजह से पैसा और समृद्धि तो मिल गयी है लेकिन जिन गाँवों में वो रहते हैं वहां के समाज में आज भी वे इज्ज़त की ज़िन्दगी से बहुत दूर हैं. न सिर्फ उन्हें गाँव से एक दूरी पर रहना पड़ता है और अक्सर गांववालों की बेरुखी और अत्याचार सहना पड़ता है बल्कि उन्हें अपने प्रियजनों के शव दफनाने के लिए जगह तक देने को गांववाले तैयार नहीं होते! और यह कहानी सिर्फ किसी एक गाँव या एक इलाके की नहीं चाहे बाड़मेर हो या जैसलमेर या जोधपुर या फिर भरतपुर हर जगह यही कहानी है. अलवर के महमूद की तरह ही बाड़मेर के गुढ़ा मालानी के रेखानाथ कालबेलिया ने भी अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि स्कूल, अस्पताल, मंदिर बनाने या किसी और बहाने प्रशासन उन्हें अक्सर एक जगह से दूसरी जगह खदेड़ता रहता है. इसी तरह भरतपुर के बावरिया समुदाय के लोगों ने भी कहा कि पुलिस उनके पूरे गाँवों को चोरों का गढ़ घोषित कर उन्हें प्रताड़ित करती है.
कठपुतली कॉलोनी में है समस्याओं की भरमार
एक ओर सरकार न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी ‘स्वच्छ भारत’ का ढिंढोरा पीट रही है और इस पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है वहीँ राजस्थान विधानसभा से कुछ ही दूरी पर इसे धता बताते हुए 500 से 700 परिवारों वाली कठपुतली कॉलोनी में आज भी एक भी शौचालय नहीं है. कलाकारों की इस बस्ती के बुज़ुर्ग धन्ना भाट ने कहा कि पिछले कई दशकों से वे यहाँ रह रहे हैं लेकिन आज भी उनकी बस्ती में पानी, बिजली, और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. उनका कहना था कि सरकारी अधिकारी और नेता दोनों ही पिछले कई सालों से उनकी समस्याएं दूर करने के बजाय उन्हें यहाँ से बेदखल करने की कोशिशें कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि चाहे हमें भूखा मरना पड़े लेकिन फिर भी हम अपना कठपुतलियां बनाने का काम नहीं छोड़ेंगे. सवाल उठता है कि राजस्थान की शान समझी जाने वाली कठपुतलियां बनाने वाले इन कलाकारों को एक इज्ज़त भरी ज़िन्दगी जीने का हक कभी मिलेगा या नहीं?
इस जनसुनवाई में राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस विध्या शंकर दवे, राष्ट्रीय घुमंतू, अर्धघुमंतू एवं विमुक्त जाति आयोग, नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष बालकृष्ण रेनके, सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, उम्मेद रेबारी, राधाकांत सक्सेना एवं अन्य मौजूद थे.
राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस दवे ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि जब देश आज़ाद हुआ तो उस वक़्त के जन प्रतिनिधि कलाकारों, घुमंतुओं और अन्य वंचित समुदायों के प्रति संवेदनशील थे और उन्होंने इनके कल्याण के लिए कई कदम उठाये लेकिन आज के नेता तो जनता को सुनने के लिए भी तैयार नहीं हैं. अरुणा रॉय ने कहा कि जो सरकार उन कलाकारों का सम्मान नहीं करती जो प्रदेश की शान और पहचान हैं उसे राज करने का क्या अधिकार है? उन्होंने मांग की कि सरकार कलाकारों, घुमंतुओं और अन्य वंचित समुदायों के साथ हर स्तर पर नियमित संवाद आयोजित कर उनकी समस्याओं का समाधान करे. घुमंतू आयोग के पूर्व अध्यक्ष बालकृष्ण रिनके ने कहा कि एक ओर तो इन कलाकारों की अद्भुत प्रतिभा को देखकर गर्व और ख़ुशी होती है वहीँ दूसरी ओर इनके साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार को देखकर आँखों में आंसूं भर आते हैं.
सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान की ओर से
मुकेश – 9468862200, कमल – 9413457292, बाबूलाल नागा – 9829165513