
श्री दीक्षित के मुताबिक जनवरी 2017 में शुरू किये गये जनऔषधि केन्द्र से उन्हें अब तक 20 हजार रूपये का मुनाफा भी हासिल नहीं हुआ है। जबकि उनके लाइसेंस की सालाना फीस ही 90 हजार रूपये प्राप्त हो सकती है जबकि किसी कंपनी में एमआर की नौकरी करने पर 15000 से 30000 तक का वेतन फार्मासिस्ट को मिल जाता है। लेकिन जन औषधि केन्द्र से रोजगार मिलना तो दूर भारी-भरकम घाटे का सौदा साबित हो रहा है। वह बताते हैं कि सरकार की लापरवाही से आगरा में 2 जन औषधि केन्द्र बंद हो चुके हैं, अगर सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो वह तथा उनके अन्य साथी भी केन्द्रों को बंद कर कहीं नौकरी करने पर मजबूर होंगे। इसी तरह मेरठ के किला परीक्षित गढ़ पर संचालित जन औषधि केन्द्र के संचालक विजय पाल सिंह से दूरभाष पर सम्पर्क स्थापित किया गया तो उन्होंने बताया कि योजना के नाम पर सरकार ने जनता के साथ-साथ उनके साथ भी भद्दा मजाक किया है। ना तो सरकर के पास दवाएं उपलब्ध हैं और न ही शिक्षित बेरोजगारों के लिये रोजगार उपलब्ध है। वह कहते हैं कि जनता केन्द्रों पर दवा लेने के लिए आती है लेकिन उसे निराश होकर लौटने पर मजबूर होना पड़ता है। केन्द्रों पर चर्म रोग की कोई दवा उपलब्ध नहीं कराई गई है। जबकि वर्षा के मौसम में जनता के लिये यह दवाएं महत्वपूर्ण हैं। जो दवा एकबार उपलब्ध करा दी जाती है वह फिर कभी दोबारा नहीं मिलती है। कानपुर के किदवई नगर में केन्द्र संचालक सुजीत कुमार मिश्रा की पत्नी गायत्री मिश्रा ने दूरभाष पर कहा कि केन्द्र सरकार की योजनाएं भाषणों और कागजों तक सिमट कर रह गईं हैं। जन औषधि केन्द्र उनके लिये जी का जंजाल साबित हो रहा है। जिसमें जनता दवा न मिलने पर अभद्रता करने पर उतारू हो जाती है एवं आरोप लगाती है कि जान-बूझकर दवाएं नहीं दी जा रही हैं, उन्हें ब्लैक में बेचा जा रहा है। श्रीमती मिश्रा का कहना है कि सरकार द्वारा जारी सूची में 757 दवाओं का विवरण दिया गया है लेकिन 600 से अधिक दवाएं उपलब्ध नहीं करा पा रही है। सरकार को उन दवाओं को राष्ट्रीय सूची से हटा देना चाहिए जिससे जनता से विवाद का सामना न करना पड़े। वह बताती हैं कि पूर्व में केन्द्रों को प्राजोसिन लोप्रामाइड, मेटोक्लोप्रामाइड टेम्सुलोसिन, मल्टी विटामिन्स, फेब्युक्सोस्टेट, एएसपी, आइरन सीरप, कीटोकोनाजोल, विटामिन बी काॅम्पलैक्स, पीरसेटम जैसी दवाएं एक बार उपलब्ध कराने के बाद दूसरी बार उपलब्ध नहीं कराई गई हैं, जिन्हें लेकर आये दिन केन्द्रों पर जनता हंगामा करती है। जिससे जन औषधि केन्द्रों का संचालन बहुत मुश्किल होता जा रहा है। श्रीमती मिश्रा का कहना है कि कोई भी डाॅक्टर पर्चों पर साल्ट का नाम नहीं लिख रहा है जिसकी शिकायत उन्होंने लोकवाणी पोर्टल पर नवम्बर 2016 में की। जिसका निस्तारण पोर्टल पर तो कर दिया गया लेकिन जमीनी हकीकत में शिकायत की कोई जांच ही नहीं की गई है। वह कहती हैं कि स्वयं उन्होंने कानपुर के ‘बड़ा चैराहा’ स्थिति उर्सला हाॅस्पीटल में पर्चा बनवाकर डा. गौतम जैन को दवा का साल्ट लिखने के लिये कहा था लेकिन उन्होंने भी इसे नजरअंदाज कर दिया था। यही वजह है कि जनऔषधि केन्द्रों पर डाक्टरों का कोई भी पर्चा मरीज लेकर नहीं आते हैं। एक तरफ केन्द्र सरकार योजना के प्रचार-प्रसार पर अरबों की राशि खर्च कर रही है वहीं दूसरी तरफ औषधि केन्द्र स्वयं बीमार होते नजर आ रहे हैं।
जन औषधि केन्द्र की वेबसाइट के मुताबिक पूरे देश में 2149 जनऔषधि केन्द्र खोले गये हैं। जिसमें उत्तरप्रदेश में 301, गुजरात में 188, कर्नाटक मंे 127, राजस्थान में 75, महाराष्ट्र में 162, दिल्ली में 27, पंजाब में 58, हरियाणा में 46, उत्तराखण्ड में 62, मध्यप्रदेश में 63, त्रिपुरा में 20, मिजोरम में 6, आंध्रप्रदेश में 102, उड़ीसा में 44, चंडीगढ़ में 5, जम्मू कश्मीर में 23, हिमाचल प्रदेश में 23, झारखण्ड में 40, बिहार में 39, केरल में 261, छत्तीसगढ़ में 171, अरूणाचल प्रदेश में 21, तेलंगना में 46, तमिलनाडु में 137, असम में 42, पश्चिम बंगाल में 9, नागालैण्ड में 11, मणिपुर में 30, दादर और नागर हवेली में 5, दमन एवं दीव में 1 तथा पांडिचेरी में 3 जनऔषधि केन्द्रों को लाइसंेस जारी किये गये हैं। जिसमें सबसे बदतर हालत यूपी के जनऔषधि केन्द्रों की है जहां न दवा है और न ही मरहम पट्टी है। लेकिन कागजों और विज्ञापनों में यह योजना तेजी से हवा में दौड़ रही है जो आम जनता के साथ बेहूदा मजाक साबित हो रही है। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिले से ‘न्यू इण्डिया’ का सपना साकार करने का ऐलान कर रहे हैं। अगर नई योजनाओं की बजाय पुरानी योजनाओं को ही वह साकार रूप दे दें तो शायद यह भारत देश पूरे विश्व में नया ही नजर आने लगेगा।
मफतलाल अग्रवाल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)