मोहन थानवी
बीकानेर। रामदेवरा धाम दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालु पद यात्रियों के टोले दिखाई देने लगे है। सेवा संघ भी जगह जगह सेवा शिविर लगा चुके हैं।
हालो हालो रुणिचे हालां…
चमकती रेत के समन्दर में सेवा की किश्ती
जनपद से बाहर निकलते ही सड़कों पर नाचता, झूमता-गाता दिखता है मिनी भारत
आस्था के सागर में भक्ति की लहरें
सेवा की नाव पर दानी सवार
चहुंओर पुण्य कमाने की होड़
संपर्क सड़कों व राजमार्गों पर उमड़ा पड़ता श्रद्धालुओें का सैलाब

सेवा शिविर 2. – बाई, तूं चाय कोनी पीवै तो ले बेटा काफी या दूध पी ले। बाबा री मेहर स्यूं सेवा शिविर में चाय, दूध, काफी री कोई कमी कोनी। जिकै भगत नै ठंडो शरबत पीवणौ है बाबा री किरपा स्यूं बै भी धाप’र पी सकै।
ये दो सेवा शिविर तो मात्र उदाहरण हैं। ऐसे शिविर लोक देवता बाबा रामदेव जी के मेले से एक पखवाड़ा पहले से पश्चिमी राजस्थान के प्रत्येक प्रमुख मार्ग पर और लगभग सभी गांवों-शहरों में अनगिनत संख्या में लगे हुए दिख रहे हैं । जी हां; आगामी पखवाड़ा बाबा के नाम ही रहेगा। इसकी तैयारियां जोरशोर से की जा चुकी हैं। केवल बीकानेर में ही ऐसे सेवा संघोें की संख्या दो तीन दर्जन से अधिक है जो पैदल जातरूओं की सेवा के लिए रवाना हो गए या रवानगी को तैयार हैं।
देने वाला बाबा रामदेव भेजने वाला बाबा रामदेव
जी हां, ऐसे भामाशाह भी हैं जो सेवा शिविरों में बड़ी धनराशि अथवा सामग्री मुहैया करवाते हैं मगर प्रचार के लिए नहीं बल्कि सच्चे दिल से बाबा के भक्तों के लिए।
खम्मा खम्मा ओ म्हारा रुणिचे रा धणियां… ऐसे ही जयघोषों से गूंजते राजमार्गों पर बाबा के जयकारे लगाने वालों के टोल के टोले रामदेवरा की ओर बढ़े चले जा रहे हैं। लोक मान्यता है कि बाबा रामदेवजी के धाम पर जो सच्चे मन से जाता है उसकी मन्नत पूरी होती है। पंगुओं को पैर, नेत्रहीनों को नेत्र, रोगियों को स्वास्थ्यलाभ और निसंतानों को संतान प्राप्ति के अनेक किस्से यहां लोग श्रद्धा से नतमस्तक होकर सुनते-सुनाते हैं। यहां तक कि ख्यातनाम फिल्म बाबा रामदेव में ऐसे दृश्य और गीत फिल्माए भी गए हैं और यह फिल्म बाबा रामदेवजी या रामदेवरा या रुणिचा धाम के मेले के अवसर पर सिनेमा घरों में विशेष रूप से प्रदर्शित होती है और हर साल खूब भीड़़ खींचती है।
लोकदेवता बाबा रामदेवजी की पगिळयां अंकित धवल ध्वजा और लीले घोड़े की आकृतियां इन दिनों बाजार में छाई है। पैदल जातरू सफेद बनियान, हाफपेंट या पाजायमा, हवाई चप्पल अथवा कपड़े के सफेद बूट, अंगोछा; टॉर्च और ऐसी ही पदयात्रा में काम आने वाली सामग्री की खरीद में जुटे हैं। यह आस्था की मिसाल ही कही जाएगी कि इस मौके पर ऐसी सामग्री का विक्रय करने वाले दुकानदार बाबा का नाम लेकर नो लोस नो प्रोफिट के सिद्धांत पर माल बेचते और सेवा में अपना योगदान करते हैं।
आस्था का ऐसा सागर हर वर्ष भादवा महीने में केवल बीकानेर में ही नहीं बल्कि मरुप्रदेश के जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, श्रीगंगानगर आदि जिलों में भी झिलमिलाता दिख रहा है। बीकानेर से अमावस को पद यात्रियो के संघों की रवानगी से शुरू हुआ सिलसिला आगामी सप्ताह तक जारी रहेगा त और रामदेवरा में दशम पर बाबा का मेला भरने तक बीकानेर के बाजार खाली खाली दिखेंगे। ऐसा हर बरस होता है।
रुणिचा धाम यानी रामदेवरा। जोधपुर और बीकानेर से जाने पर जैसलमेर के बीच स्थित है। बीकानेर से कोलायत-फलौदी-पोकरण मार्ग पर स्थापित बाबा की नगरी रामदेवरा की ओर हरियाणा, पंजाब, गुजरात से आने वाले सभी मार्ग इन दिनों बाबा के जयकारों से गुंजायमान हैं।
हम सब एकमएक:- सभी धर्म-सम्प्रदायों के हर वर्ग के श्रद्धालुओं की आस्था के केन्द्र की ओर हर मार्ग पर यह गूंज बीकानेर से एकम संघ के रवाना होने तक बढ़ती जाएगी – बढ़ती जाएगी। इसके बाद आरंभ होगा अन्य संघों की रवानगी का सिलसिला। मगर इससे पहले जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य प्रदेशों से पैदल, दण्डवत पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की सेवा के लिए मरुभूमि का हर पुत्र सेवा का संकल्प लिए तत्पर है।
सच ही कहा जाता है, मरु प्रदेश में पानी जितना गहराई में मिलता है, यहां के जुझारू निवासी भी आपसी सौहार्द और प्रेम में उतना ही डूबे हुए है। छोटी काशी सदृश्य इस धरती के चप्पे चप्पे पर पुरखों की परम्पराओं का निर्वहन जोशोखरोश से करने के लिए युवा पीढ़ी में उत्साह है। सेवा संघ न केवल चाय नाश्ते की मनुहार कर रहे हैं बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं देने में भी आगे है।
गुजरात की ओर से पचपदरा, पाली, मारवाड़ जोधपुर के रास्ते फलौदी होते हुए रामदेवरा तक पहुंचने वालों के जत्थों और दूसरी ओर कच्छ की ओर से भी जैसलमेर बाड़मेर की ओर का रास्ता पैदल जातरूओं से अटा हुआ है । इधर हरियाणा और पंजाब के रास्ते से जम्मू कश्मीर उत्तर भारत से आने वाले जातरूओं का रैला हनुमानगढ़, राजगढ़ सीकर, चूरू, रतनगढ़, श्रीडूंगरगढ़ और पीलीबंगा, सार्दूलशहर, सूरतगढ़, लूणकरणसर और श्रीगांगनगर से विजयनगर, धड़साना मंडी आदि मार्गों से होते हुए बाबा रामदेव के जयकारे लगाते जातरूओं के जत्थे दिखाई दे रहे हैं। बाबा के इन आस्थावानों को रास्ते में किसी तरह की तकलीफ न हो, इसका ख्याल गांवों और शहरों में बरसों से कार्यरत सेवा संघ तो कर ही रहे हैं मजे की बात तो यह है कि राजमार्गों पर चलने वाले भारी वाहन ट्रक, बस आदि के चालक भी लोकदेवता के भक्तों की शान में सड़क के किनारे अपने वाहन रोक लेते हैं ताकि पैदल जातरू आराम से रामदेवरा धाम तक पहुंच सकें।
भाद्रपद की शुक्लपक्ष दशम के दिन मुख्य मेला रुणिचा में भरेगा मगर तब तक लाखों भक्त बाबा के दर्शन कर चुके होंगे और बाकी प्रतीक्षा में होंगें। आस्था का ऐसा समन्दर और कहीं शायद ही दिखाई देता हो जैसा अमीर-गरीब, हिन्दू-मुस्लिम, दलित और सिख-ईसाई के सामूहिक लोकदेवता लीले घोड़े के असवार बाबा रामदेवजी के धाम रुणिचा में दिखाई देता है।
रातभर गूंजते भजन:- यहां जागरणों का दौर आरंभ हो चुका है और प्रत्येक रात्रि को जगह जगह लगाए जा रहे जागरण में प्रसिद्ध गायक रुणिचे रा धणियां के भजन सुबह होने तक गुंजा रहे हैं । टेर लगाते हैं गांव-शहर के वे श्रद्धावान जो बाबा के धाम पर धोक लगाने हर साल न केवल खुद पैदल जाते हैं बल्कि अपने गांव-मोहल्ले के साथियों को भी पैदल तीर्थयात्रा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। जागरणों में कचौरी, पकौड़ी, चाय, शरबत की सेवा भी की जा रही है।
सबसे अलहदा और रोचक बात तो यह कि मेले का मुख्य दिन दशम आते आते शहर खाली-खाली लगने लगता है। दुकानों कारखानों में काम करने वाले ही नहीं बल्कि इनके संचालक भी बाबा के धाम या तो धोक लगाने अपने साधनों से रुणिचा पहुंच जाते हैं।
रोडवेज और रेलवे प्रशासन तो स्पेशल गाड़ियां रियायती किराये के साथ उपलब्ध करवाते ही हैं, निजी ट्रेवल्स संचालक भी श्रद्धालु यात्रियों की सुविधा के लिए मेला स्पेशल की व्यवस्था करते हैं।