विज्ञान भारत की विरासत, हमने दुनिया को सिखाया – देवनानी

रीजनल कॉलेज में विज्ञान विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ
देश के प्रसिद्ध विद्वान करेंगे विज्ञान के उत्थान पर चर्चा

प्रो. वासुदेव देवनानी
प्रो. वासुदेव देवनानी
अजमेर, 21 नवम्बर। शिक्षा एवं पंचायतीराज राज्यमंत्री श्री वासुदेव देवनानी ने कहा कि विज्ञान प्राचीन भारतीय सभ्यता की विरासत है। हमने पूरी दुनिया को विज्ञान का मूल सिखाया। हजारों साल पहले हमारे विद्वानों ने अंतरिक्ष, गणित, रसायन, आर्कीटेक्चर, सर्जरी और साइंस के रहस्यों को जानकर उनका उपयोग करना सीख लिया था। आज विज्ञान जिस उन्नत अवस्था में है, तो कहीं ना कहीं उसके पीछे भारत है। वर्तमान में विज्ञान को हमारी रोजमर्रा की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल कर आगे बढ़ने की जरूरत है। विज्ञान में शोध को अधिक से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
शिक्षा राज्यमंत्री श्री देवनानी ने आज क्षेत्रीय शिक्षण संस्थान में विज्ञान विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ किया। उन्होंने कहा कि विज्ञान एक ऎसा विषय है। जिस पर अधिक से अधिक शोध होता रहे ताकि मानवता लाभान्वित हो सके। देश में रोजमर्रा की जिन्दगी में विज्ञान शोध को बढ़ावा देकर गतिविधियों को सरलता से सम्पादित किया जाना चाहिए। आज विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय युवा बड़ा नाम है। लेकिन ब्रेन ड्रेन को रोकना आवश्यक है ताकि हमारे युवाओं की प्रतिभा देश के विकास में काम आए।
श्री देवनानी ने कहा कि आधुनिक इतिहास पश्चिमी देशों को विज्ञान की विविध खोजों का श्रेय देता है। लेकिन यह एक तरफा सत्य है। प्राचीन भारतीय सभ्यता ने विज्ञान जगत को कई अतुलनीय देन दी है। विश्व की प्राचीन वैज्ञानिक परम्पराएं एवं विद्याएं भारतीय जीवन पद्धति से निकलती है। हडप्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता भवन निर्माण, धातु विज्ञान, वस्त्र विज्ञान एवं परिवहन व्यवस्था जैसी वैज्ञानिक परम्पराओं से परिचित थी।
उन्हाेंने कहा कि भगवान श्री गणेश को हाथी का सिर लगाना, हनुमान चालीसा में “युग सहस्त्र योजन पर भानु, लील्यो ताही मधुर फल जानीं“ यह दो उदाहरण स्पष्ट करते है कि हमारा शल्य और अंतरिक्ष विज्ञान कितना समृद्ध था। चिकित्सा के क्षेत्र में महर्षि चरक, महर्षि सुश्रुत ने विश्व को चिकित्सा विज्ञान में शानदार योगदान दिया। शल्य चिकित्सा यहीं से शुरू मानी जाती है। इसी तरह गणित में आर्यभट्ट, ब्रहमगुप्त, भास्कराचार्य, रसायन विज्ञान में नागार्जुन, खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट एवं वराहमिहित, भौतिकी में महर्षि कणाद आदि ने जो सिद्धांत सैकड़ों हजारों साल पहले प्रतिपादित किए, वे आज भी प्रासंगिक हैं। विश्व के वैज्ञानिक इनके आधार पर अपना शोध को आगे बढ़ाते है।
श्री देवनानी ने कहा कि राज्य सरकार अपने इसी प्राचीन गौरव को आगे बढ़ाने तथा वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुसार विज्ञान विषय के शिक्षण की दिशा में आगे बढ़ रही है। हमारा प्रयास है कि स्कूली स्तर पर विद्याार्थियों को विज्ञान की शिक्षा रटाने के बजाए समझायी जाए ताकि यह शिक्षा जीवन भर काम आ सके।
इससे पूर्व क्षेत्रीय शिक्षण संस्थान के प्राचार्य सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्धानों ने कार्यक्रम को सम्बोधित किया। विभिन्न तकनीकी सत्रों में विषय से जुड़े विद्धानों ने अपने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

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