
नयनों से मुस्काना सीखो ।
परिवर्तन की बहती धारा ,
उसमें ज़रा नहाना सीखो।
देवघरों में देव बंद है ,
ख़ुद में देव जगाना सीखो ।
असहायों की सेवा करके ,
थोड़ा पुण्य कमाना सीखो ।
पशु-पक्षी को दाना -पानी ,
मन में दया जगाना सीखो ।
अपना पेट सभी भरते हैं ,
थोड़ा उन्हें खिलाना सीखो ।
आग लगाना बहुत सरल है ,
मित्रों! आग बुझाना सीखो ।
भ्रातृ- भाव संस्कार हमारे ,
उनको मूर्त्त बनाना सीखो ।
सब ग्रंथों का सार यही है ,
मिलजुलकर सब रहना सीखो ।
आज जरूरत देशभक्ति से ,
माँ का मान बढ़ाना सीखो ।
– *नटवर पारीक*, डीडवाना