अजमेर, 31 अगस्त। जिले में कृषि विभाग द्वारा कीट व्याधि सर्वेक्षण किया गया। फसलों पर लगने वाले कीटों को विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार नष्ट करने के लिए कहा गया।
कृषि विभाग के उपनिदेशक श्री वी.के. शर्मा ने बताया कि लगातार बादल छाये हुये रहने एवं हवा में नमी होने से फसल में लगने वाले कीटों का प्रकोप बढ जाता हैं। जवाजा पंचायत समिति के टाटगढ क्षैत्र में मक्का फसल में फाल आर्मी वर्म (वैज्ञानिक नाम- स्पोडेपटेरा फरजीपेरडा) नाम के नये कीट की रिपोर्ट प्राप्त हुई हैं। इस कीट की प्रजनन क्षमता ज्यादा एवं जीवन चक्र छोटा है। साथ ही यह एक दिन मे 100 किलोमीटर तक दूरी तय कर सकता है। इसी कारण यह कीट चिंता का विषय है। इसका प्रकोप निकटवर्ती भीलवाड़ा जिले में भी देखा गया है।
उन्होंने बताया कि इस कीट की पहचान इल्ली की तीसरी अवस्था निकलने के बाद की अवस्था इल्ली के सिर पर उलटा वाई (⅄) के आकार के निशान एवं इल्ली के 8 वें बाडी सेगमेंट पर 4 वर्गाकार बिंदू से की जा सकती है। व्यसक नर कीट के अगले पंख धूसर-भूरे रंग से होती हैं। इसके मध्य मे सफेद रंग की त्रिभुजाकार आकृति होती है तथा किनारो पर सफेद रंग के धब्बे होते है। इल्ली की प्रारम्भिक अवस्था पौधों की पत्तियों को खुरचकर खाती है, जिसके कारण सफेद निशान दिखाई पडते है। वृि़द्ध करने के बाद मक्का के गाले मे घुसकर पत्तियाँ खाती रहती है। जिसके कारण पत्तियों पर एक कतार में गोल एवं लम्बे छिद्र दिखाई देते हैं। इल्लियों की मल भी पत्तियों पर साफ दिखाई देती है। तना छेदक कीट की तुलना में इस कीट के कारण पत्तियों पर बडे छिद्र बनते है एवं इस कीट की लार्वी बडे होने पर गाले मे ही रहती है। इस कीट के नियंत्रण के लिए किसानों को कृषि विभाग द्वारा सलाह दी गई है।
उन्होंने बताया कि प्रकाश पाश (1 प्रति हेक्टेयर ) का उपयोग कर व्यसक मोथ पर निगरानी रखी जाएं। सायनेट्रेनीलीप्रोल 19.8 प्रतिशत एवं थायोमेथोगजाम 19.8 प्रतिशत से 4 मिली. मिश्रण प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। रसायनिक उपचार के छिडकाव या भुरकाव हेतु एमामेक्टिन बेंजोएट 5 एसजी 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी या थायोमेथोगजाम 12.6 प्रतिशत एवं लेम्डासायलोथ्रिन 9.5 प्रतिशत 0.5 मिली. प्रति लीटर पानी या क्लोट्रेनीलीप्रोल 18.5 प्रतिशत एस.सी. 0.4 मिली प्रति लीटर पानी या स्पिनोसेड 45 ईसी 0.3 मिली. प्रति लीटर पानी प्रति हेक्टेयर में से किसी भी एक कीटनाशक का प्रयोग कर सकते हैं।
उन्होंने बताया कि इसी प्रकार खरीफ दलहन व तिलहन में पीतशिरा मोजेक (वायरस) रोग का प्रकोप देखा गया है। यह विषाणु जनित रोग है। रोग का विषाणु सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। इस रोग के कारण पत्तियों में चितकबरा पीलापन हो जाता है। रोग की उग्रता में सभी पत्तीयां चितकबरी पीली हो जाती है। पौधे में फलियां बहुत कम बनती है।