j k gargचिंता का जन्म लोभ से ही होता है। लोभ का आशय इच्छा से है और आज हर व्यक्ति किसी-न-किसी वस्तु की इच्छा,आकांक्षा या कामना अपने मन में पाले हुए है |वास्तविकता तो यही है कि चिंता संज्ञानात्मक,शारीरिक,भावनात्मक और व्यवहारिक विशेषता वाले घटकों की मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दशा है, यह एक अप्रिय भाव बनाने के लिए जुड़ते हैं जो की साधारणतया बेचैनी,आशंका,डर और क्लेश से सम्बंधित हैं | देखा जाए तो चिंता भय से कुछ अलग है,भय किसी ज्ञात अथवा अज्ञात खतरे के कारण उत्पन्न होता है वहीं, चिंता अनुभव किये गये अनियंत्रित या अपरिहार्य खतरों का परिणाम है |
चिंता का कारण है निराशावादी दृष्टिकोण नकारात्मकता एवं निराशावादी सोच ही चिंता की जननी है | चिंता को सिर्फ चिन्ता के कारणों का नाश करके ही मिटाया जा सकता है | दर असलह में जितना मिलता है हम उससे ज्यादा की आस में थोडा और,थोडाऔर की रट लगा रहते हैं इसी सोच के कारण एक दिन हम अपने अपने सुख और शांति से भी हाथ धो बैठते हैं और चिंता के चक्रव्यू में उलझते ही जाते हैं | प्रसिद्ध विचारक बीचर कहते थे कि व्यक्ति काम से नहीं मरता,बल्कि चिंता उसे मार डालती है।