j k gargमान्यताओं के अनुसार तेजा जी की बहिन राजल भी खरनाल के पास जोहड़ में सती हो गई थी | भाई के पीछे सती होने का यह अनूठा एक मात्र उदाहरण है | राजल बाई का मंदिर खरनाल में गाँव के पूर्वी जोहड़ में है जिसे बांगुरी माता का मंदिर कहते हैं | तेजाजी की प्रिय घोड़ी लीलण ने भी अपना शारीर छोड़ दिया | लीलण घोड़ी का मंदिर आज भी खरनाल के तालाब के किनारे पर बना हुआ है | रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाये पर वचन नहीं जी का पालन करते हुए तेजा जी का बलिदान आज भी हम सभी को प्रेरणा देता है तेजाजी के निर्वाण दिवस भाद्रपद शुक्ल दशमी को प्रतिवर्ष तेजा दशमी के रूप में मनाया जाता है |