
सब को ज्ञात ही है कि द्वापर युग में जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तब दरबार में उपस्थित अधिकांश महारथी या तो चुप रहे या कौरवों की हां में हां मिलाते रहे.
आजादी के आंदोलन में जब जनता ब्रिटिश हकुमत के विरूध्द आंदोलन कर रही थी तब राजा-महाराजा,निजाम, नवाब और उनके जमीदार साथी अंग्रेजों का साथ दे रहे थे . यह लोग उनकी हां में हां मिलाते थे बदले में ब्रिटिश हकूमत उन्हें तरह तरह से मदद करती थी. उन्हें रायबहादुर, खानबहादुर की पदवियां देती थी. पुराने समय से ही कई धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों में अधिकांश लोग, असरदार लोगों के पक्ष में हां में हां मिलाते आएं है. 1975 के आपातकाल में अधिकांश लोग इंदिरागांधी की हां में हां मिलाते थे. तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष ने तो यहां तक कह दिया था “Indra is India & India is Indra.” उन्ही दिनों कई स्वयं घोषित भगवान भी हुए और अधिकतर लोग उनकी हां में हां करते रहते थे.
“हां में हां” का एक वाकया एक कचहरी में भी हुआ. वहां कत्ल के मुकदमें में, मुलजिम को दोषी ठहराते हुए, इस्तगासे के वकील ने काजी से कहा कि मैं दो आदमी ऐसे पेश कर सकता हूं जिन्होंने अभियुक्त को कत्ल करते देखा है तो काजीजी ने वकील साहब को कहा कि “तुम ठीक कहते हो.” बाद में जब बचाव पक्ष के वकील ने काजी को दलील दी कि मैं चार आदमी ऐसे पेश कर सकता हूं जिन्होंने अभियुक्त को कत्ल करते हुए नही देखा तो कुछ देर सोचने के बाद काजीजी ने कहा कि “हां तुम भी ठीक कहते हो.” दलीलें देने के बाद जब वकील लोग कचहरी से चले गए तो काजीजी के पास बैठे पेशकार ने उन्हें कहा हुजूर ! आपने वादी-प्रतिवादी दोनों के वकीलों को सुनने के बाद कह दिया कि “हां तुम ठीक कहते हो.” ऐसे में केस का फैसला कैसे होगा ? तो काजीजी ने उसे कहा कि “हां तुम भी ठीक कहते हो.”
अब हां में हां मिलाने का आधुनिक संस्करण चला है हालांकि रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने नवधा यानि नौ भक्ति का ही जिक्र किया है लेकिन पिछले कुछ समय से देश में दसवी भक्ति (स्वामी भक्ति)का प्रचलन भी बढा है. उदाहरणार्थ, नवभारत, पूने दि.20.1.22 के अनुसार, मध्यप्रदेश के कृषी मंत्री ने कहा बताते है कि प्रधानमंत्री का जंम भगवान राम और कृष्ण के अवतार के रूप में हुआ है. कई स्वयंभू घोषित भक्त भी उनकी हां में हां मिला रहे है. हिन्दू धर्म सहिष्णु है. इसमें ईश्वर को निर्गुण-निराकर से लेकर सगुण-साकार तक मानने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है. ईशोपनिषद में तो कहा गया है कि ईश्वर सर्वत्र है, सब में है, सब समय है लेकिन कोई व्यक्ति स्वयं ईश्वर नही हो सकता है. यह गलती हमने 1975 के आपातकाल में की थी जब कई लोगों ने या उनके अनुयाइयों ने उनको भगवान घोषित कर दिया था.वही गलती हम वर्तमान शासनकाल में भी कर रहे है अत: विवेकशील लोगों को चाहिए कि वह इस प्रवृति का विरोध करें.