*अतिथि देवो भव का सिद्धांत मुक्ति का आधार:गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि*

संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि भगवान महावीर मंगलमय थे ।वह एक विशाल वट वृक्ष के समान समस्त जीवों के लिए आश्रयकारी थे।उन्होंने नयसार के भव में सम्यकत्व रूपी बोधि का बीज प्राप्त किया था। नयसार एक योग्य व्यक्ति था। अपने साथ काम करने वाले कर्मचारियों का पूरा ख्याल रखने वाला था। आज देखा जाता है व्यक्ति बाहर में सबका ध्यान दे देता है, मगर रात दिन सेवा करने वाले कर्मचारियों का पर पूरा ध्यान नहीं दे पाता है।इसका परिणाम यह आता है कि या तो वह कर्मचारी काम पर पूरा ध्यान नहीं देता है या फिर गुस्सा करने लग जाता है। अतः कर्मचारी का भी ध्यान रखने का प्रयास करें। नयसार का नियम था की अतिथि को खिलाकर ही भोजन करता था। आज आप भोजन से पूर्व अतिथि की प्रतीक्षा करते हैं या अतिथि को खिलाकर भोजन करते हैं? होना तो यह चाहिए की भोजन के पूर्व भावना भानी चाहिए कि पहले कोई अतिथि आ जाए तो उन्हें देकर या उन्हें खिलाकर फिर भोजन करूं। नयसार ने मुनियों को शुद्ध भाव से आहार आदि का दान देकर वन में उन्हें मार्ग बताने का पवित्र कार्य किया। इसी प्रकार व्यक्ति को भी पूर्ण रूप से निर्दोष व शुद्ध दान देने का प्रयास करें। देने से पूर्व देते समय व देने के बाद पूर्ण रूप से अपूर्व आनंद की अनुभूति का अनुभव प्राप्त करने का प्रयास करें।
इसी के साथ पूज्य गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने उत्तराध्ययन सूत्र का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि पांचवें अध्ययन का नाम अकाममरणिया या मरण विभक्ति है। जिस प्रकार दूध में मलाई, मलाई में मक्खन और घी निश्चित रूप से होता है। उसी प्रकार जन्म लेने वालों की मृत्यु निश्चित होती है।दवाइयां की एक्सपायरी डेट फिर भी निश्चित होती है। मगर हमारी मृत्यु उस गुब्बारे की तरह है जो कभी भी फूट सकता है। मरण दो प्रकार का होता है। इच्छाओं के रहते हुए मृत्यु को प्राप्त करना, बाल अज्ञान मरण कहलाता है, और इच्छाओं से रहित होकर मृत्यु प्राप्त होना पंडित मरण कहलाता है।छठे अध्ययन का नाम शुल्लक निग्रंथीय है इसमें साधु की छोटी समाचारी ही होने के कारण इसका यह नाम रखा गया है। इस अध्ययन में जीव के दुख का मूल कारण उसका अज्ञान बतलाया गया है ।व्यक्ति को स्वयं के सत्य की खोज करने की प्रेरणा करते हुए इस देह के मिलने का कारण बताया है कि यह देह पूर्व कर्मों का क्षय करने के लिए मिली है।तथा पक्षी की तरह संग्रहवृत्ति का त्याग करने का निर्देश दिया है।
सातवें अध्ययन में भेड़ के बच्चे का उदाहरण देते हुए भोग के दुष्परिणामों को बताया है कि उसे अंत में पश्चाताप करना पड़ता है।थोड़े से सुख की खातिर बहुत काल तक दुखों को प्राप्त करना पड़ता है यहां मनुष्य भव को मूल पूंजी बताया है।जो मनुष्य भवरूपी मूल पूंजी को खो देते हैं वह नरक व प त्रियच गति को प्राप्त करते हैं।जो मनुष्य उनको सुरक्षित रखते हैं उन्हें फिर मनुष्य जन्म मिल जाता है, और जो मूल पंजी बढ़ाते हैं वह देवलोक व मोक्ष में जाते हैं। अत:जिनवाणी को सुनकर मूल पूंजी को बढ़ाने का प्रयास करेंगे तो यत्र तत्र सर्वत्र आनंद ही आनंद होगा।
धर्म सभा को का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।
पदमचंद जैन

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