*चुनाव के पहले भी, साथ भी और बाद भी*

-सोशल मीडियाई यूनिवर्सिटी पर ’’ज्ञान’’ की रेलमपेल
-इसमें भी वाट्सएपिया यूनिवर्सिटी वाले सबसे आगे
-एक-दूसरे की छिछालेदारी में भाजपाई-कांग्रेसी पीछे नहीं

✍️प्रेम आनन्दकर, अजमेर।
👉चुनाव चाहे कोई-सा भी हो। चाहे स्थानीय निकाय के चुनाव हों, पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव हों, विधानसभाओं के चुनाव हों या लोकसभा के चुनाव हों। सोशल मीडियाई यूनिवर्सिटी पर ’’ज्ञान’’ पेलने वालों की कमी नहीं रहती है। इसमें भी वाट्सएपिया यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले हर समय अपना ज्ञान बघारने और ऊटपटांग पोस्टों की रेलमपेल करने में सबसे आगे रहते हैं। राजस्थान में पिछले साल नवंबर में विधानसभा और अब अप्रैल में लोकसभा के चुनाव निपटे हैं। चाहे भाजपाई हों या कांग्रेसी, कोई भी इस रेलमपेल में पीछे नहीं रहे हैं और ना ही कभी रहते हैं। कांग्रेसी भक्त भाजपा की, तो भाजपाई भक्त कांग्रेस की ऐसी-तैसी करने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। सोशल मीडिया के कमोबेश सभी प्लेटफॉर्म पर दोनों ही दलों के छुटभैया नेताओं ने एक-दूसरे के दल और उनके नेताओं की छिछालेदारी करने में कोई कमी नहीं छोड़ी और ना ही गाहे-बगाहे छोड़ते हैं। ऐसी-ऐसी छींटाकशी करते हैं, मानो, इस देश के कर्ता-धर्ता, निर्णायक और भाग्यविधाता वे ही हों। पांच महीने पहले विधानसभा के चुनाव निपटते ही दोनों दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बढ़ा-चढ़ाकर दावे-प्रतिदावे करना शुरू कर दिया था। अब लोकसभा चुनाव निपटते ही ऐसा किया जा रहा है। यही नहीं, बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने और ऊंची-ऊंची फेंकने में मीडिया के साथ भी पीछे नहीं रहे हैं और ना ही अब हैं। चुनाव निपटते ही ऐसी फेंकना शुरू कर देते हैं, जैसे वे ही प्रकांड पंडित और राजनीति के भविष्यवेत्ता हों। अभी तो आचार संहिता है और जब तक लोकसभा चुनाव में मतदान के सभी चरण पूरे नहीं हो जाते, तब तक एक्जिट पोल पर पाबंदी है। आखिरी चरण का मतदान खत्म होते ही इलैक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों पर जो ऊंची-ऊंची फेंकी जाएगी, वह बेमिसाल होगी। ऐसे-ऐसे दावे करेंगे, मानो प्रत्येक मतदाता ने इन मीडिया वालों को ही बताकर वोट दिए हों। एक्जिट पोल में कुछ हजार मतदाताओं के विचार जानकर उनके आधार पर लाखों-करोड़ों मतदाताओं की राय बनाएंगे और फिर दावे करेंगे कि फलां पार्टी की सरकार बनेगी या फलां-फलां पार्टी को इतनी-इतनी सीटें मिलेंगी। एक्जिट पोल देख-सुनकर ऐसा लगने लगता है, मानो ये ही वोटिंग मशीनों के अंदर घुसे बैठे हैं और वोटों की गणित बता रहे हैं। पिछले कुछ चुनावों के एक्जिट पोलों को देखें, तो कमोबेश सभी धराशायी होते हुए नजर आए थे। कुछ मीडिया के साथियों ने यह भी बखान करना शुरू कर दिया है कि फलां लोकसभा क्षेत्र में फलां उम्मीदवार की हार लगभग तय है। आज तक यह बात समझ में नहीं आती है कि किस आधार ऐसी ऊंची-ऊंची फेंकी जाती है या फेंकी जा रही है।

प्रेम आनंदकर
यह बात जगजाहिर है कि जब चुनाव होते हैं, तो चाहे कितने ही उम्मीदवार मैदान हों, जीतेगा या जीतता एक ही है। यह भी जरूरी नहीं है कि जिस उम्मीदवार को जीता हुआ माना जाए या माना जा रहा है, वह जीत ही जाए और जिसको हारा हुआ माना जा रहा है, वह हार ही जाए। कई बार वोटिंग मशीनों से निकलने वाले वोट पासा पलट देते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कुछ साथियों ने जिन उम्मीदवारों को पूरी तरह हारा हुआ मानकर ना केवल भविष्यवाणी कर दी थी, बल्कि ब्लॉग भी लिख दिए थे, वे ही उम्मीदवार जीत गए थे। दोस्तों भाग्य और समय का कोई भरोसा नहीं है, कब किसका भाग्य और समय बदल जाए। और फिर यह तो पूरी तरह गुप्त मतदान होते हैं, तो फिर हम किस आधार पर दावे कर देते हैं। महज कुछ मतदाताओं की राय या विचार के आधार पर अपना आकलन निकाल कर उसे सही साबित करने के लिए इधर-उधर के तर्क देने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। कयासों के आधार पर केवल इतना ही कह सकते हैं कि भाजपा फिर से 25 सीटें जीत सकती है या कांग्रेस उसकी राह रोकते हुए ज्यादा से ज्यादा सीटें अपनी झोली में डाल सकती है। वैसे भी अब विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदान से पहले मतदाताओं का मूड भांपना और मतदान के बाद मतदाताओं से यह उगलवाना बड़ी ही टेढ़ी खीर है कि आप किसको वोट देकर आए हैं। हां, भाजपा, कांग्रेस या अन्य किसी राजनीतिक दल से जुड़े नेता और कार्यकर्ता तो सीना ठोक कर कहते हैं कि उन्होंने किसे वोट दिया है, किंतु आम मतदाता कभी भी यह नहीं बताता है कि उसने किसे वोट दिया है या किसको वोट देकर आएगा। इसमें कुछेक अपवाद हो सकते हैं। बहरहाल, दोस्तों हम और आप ऊंची-ऊंची फेंक देखते और लपेटते रहिए। और इस फेंकोलॉजी का आनंद लेते रहिए।

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