बतरस-माननीय का वाद-विवाद

रासबिहारी गौड
जब से चुनाव परिणाम आए हैं तब से अनेक माननीय नगर में ऐसे उग आए हैं, जैसे बरसात के मौसम में कुकरमुत्ते के फूल। यूँ तो इनकी अनेक क़िस्में हैं लेकिन इन दिनों दो क़िस्म के माननीय अधिक प्रचलन में हैं।
एक क़िस्म के माननीय ख़ुशी और दुःख के मिश्रित भाव में जी रहे हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि उन्हें ख़ुश दिखना है या दुःखी। इसी पशोपेश में जब कोई उन्हें मुबारक बाद देता है तो वे उस पर टूट पड़ते हैं और अफ़सोस जताता है तो अपना विजयी झंडा तान देते हैं। अल्बता अंदर से वे जानते हैं कि कुछ खो सा तो गया है क्योंकि अब ऐसे वैसे लोग भी आते- जाते उन पर फीकी सी मुस्कान फेंक कर जा रहे हैं। लेकिन उन्होंने ने तय कर रखा है कि कुछ भी हो जाए अपनी नीची नहीं होने देंगे।
दूसरी क़िस्म माननीय हम चौड़े सड़क सकड़ी के अंदाज़ में इस तरह फैल कर चलते हैं की कोई तो उनसे टकरा। वे पहले क़िस्म को चिढ़ाने के सारे मंत्र सोशल मोदी से बटोर कर हवा ऐसे फैला रहे हैं मानो सारा प्रदूषण साफ़ करने का ठेका उन्हें ही मिला हो।
कल दूसरे क़िस्म के माननीय पहले क़िस्म के माननीय को चिढ़ा रहे थे ,” क्यों क्या हुआ..? निकल गई गर्मी..!”
पहले कहाँ कम पड़ने वाले थे, तड़ाक से बोले, “ हम फ़र्स्ट क्लास फ़र्स्ट नहीं आए तो क्या ..? पास तो हो गए…सरकार हम ही बना रहे हैं .. तुम तो फेल के फेलही रहे..।”
चूँकि दूसरे क़िस्म के माननीय भी बहुत दिन से दबी अपनी भड़ास निकालने का रास्ता सोच रहे थे सो उलझ पड़े, “अरे ये पास होना भी कोई पास होना है लल्लू.. पहले से पेपर आउट, परीक्षक घर के, टॉप करूँगा-टॉप करूँगा का शोर ..और फिर भी ग्रेस से पास ..। हमारे वालों को देखो! मेज़ कुर्सी छीन ली… किताबें फाड़ दी.. और तो और failure failure कह कर चिढ़ाया फिर भी पहले से दुगने नम्बर आए ..”
पहले ने फिर वाद किया। दूसरे ने विवाद किया। दोनों का वाद -विवाद बारस्ता आज़ादी रानी लक्ष्मीबाई पर आकर रोचक और रोमांचक हो गया क्योंकि उसने अब ग्लैमर तड़का लग चुका था, रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका में फ़िल्म की चर्चित अभिनेत्री आ चुकी थी।
दूसरे क़िस्म के माननीय कह रहे थे, “देखा आपने ! कल आपकी नक़ली लक्ष्मीबाई को देश की असली लक्ष्मीबाई ने कूट दिया..।”
दूसरे बोले, “तुमसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है ..? लक्ष्मीबाई तो आज पिटी है तुमने उसकी फ़िल्म पहले ही पीट दी थी.. तुम अंग्रेजो के पिट्ठू हो…मलेच्छ हो …।”
दूसरे ने प्रतिक्रिया स्वरूप नई गालियाँ ईजाद की ..पहले ने परंपरागत गालियों का सहारा लिया .. दूसरे ने गालियों में रिश्ते डाले तो पहले ने गालियों को अधिक नंगा किया। कुल मिलाकर दोनों माननीय एक-दूसरे की नीचता के निम्नतम स्तर पर काट ने लगे।
मोहल्ले वाले झुंड बनाकर इस तमाशे का मजा ले रहे थे। इसी बीच मोहल्ले के सोते हुए चौकीदार अर्थात् कि कुत्ते जाग गए और वे भी दोनो माननीय की लय में भौंकने लगे..अब किसी के कुछ समझ नहीं आ रहा था , कौन क्या कह रह है और किससे कह रह रहा है ..?
हम यह दृश्य हम देखकर संसद के भावी सत्र की कल्पना करने लगे और लोकतंत्र ज़िंदा है ,यह सोचकर आगे बढ़ गए

*रास बिहारी गौड़*

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