
कहानियाँ, कविताएँ और मनिखेज क़िस्से
बहुत अधिक पढ़े जाते हैं
अख़बार, इश्तहार और धार्मिक किताबें
बहुत कम देखे जाते हैं
जंगल, पहाड़ और समंदर
बहुत अधिक दिखते हैं
इमारतें, रास्ते और सिर
बहुत कम होती हैं
ज़रूरतें, जिजीविषा और जीवन
बहुत अधिक होते हैं
भूख, उम्मीदें और मृत कामनाएँ
बहुत कम होती है
आग, पानी और पृथ्वी
बहुत अधिक होता
शुन्य, सन्नाटा और सितारें
बहुत कम सुना होता है
मन, पीड़ा और प्रेम
बहुत अधिक पाला जाता है
ईर्ष्या, अहंकार और अंधकार
बहुत कम होते हैं मनुष्य
बहुत अधिक होते हैं
कीटाणु,जीवाणु और शुक्राणु
बहुत कम होते हैं
हमारे भीतर हम
बहुत अधिक होते हैं
हमारे भीतर दूसरे चेहरें
बहुत कम को जान लेना
बहुत अधिक को पा लेना है
*रास बिहारी गौड़*