अजब कहानी प्रेम की (राधा- कृष्ण-गोपियां)

शिव शर्मा

कृष्ण के प्रेम में आत्मविभोर गोपियां; बेखुद गोपियां, बेसुध गोपियां। कैसा था वह प्रेम जो कि माखन चुराने से प्रारंभ हुआ था, चीरहरण में परिभाषित हुआ, रास में रसमय हुआ और महारास में संपूर्ण हुआ! कैसा था वह कृष्ण प्रेम! मां-बेटी, सास-बहू, जेठानी-देवरानी सब की सब उधर ही भाग रही हैं। तवे की रोटी छोड़कर, थाली का भोजन छोड़कर, दूध पीते हुए शिशु को छोड़कर, सारी गोपियां कृष्ण की तरफ भाग रही हैं। सब अपनी-अपनी पहचान छोड़कर एक ही दिशा में भाग रही हैं। आधी रात गए तक कृष्ण के साथ नाच रही हैं। कितना निर्भय था वह प्रेम! देह से ऊपर, संदेह से परे; सौ फीसदी खरा प्रेम!

प्रेम में गोपियों की अनूठी दीवानगी। खुद कृष्ण हो जाने की रूहानगी। सब की सब में कृष्ण ही रह जाने का उन्माद। बाकी सब विस्मृत; केवल कृष्ण याद। प्रेम की धारणा ब्रज की भूमि में जीवंत हो गई। रास में बद-हवास गोपियों का देह बोध विसर्जित हो गया। केवल जीवात्मा ही रह गई। सौंदर्य, श्रृंगार, नृत्य, ताल वंशी- नाद। अद्भुत रास, ब्रह्म् जीव का रास, प्रकृति- पुरुष का रास; पूरी ब्रजभूमि ही रास मय हो गई। ब्रजमंडल ही प्रेम का वेद हो गया। कैसा उदात्त था वह प्रेम जो आज पांच हजार साल बाद भी सजीव है। कृष्ण सजीव है, बांसुरी सजीव है, राधा-गोपियां सजीव हैं, ब्रजभूमि सजीव है। पांच हजार वर्ष लंबा रास, उल्लास! पांच हजार साल लंबा उत्सव! संपूर्ण प्रेम योग जो आज भी हम सबमें धड़कता है।
कैसा था वह प्रेम जो भागवत-पुराण हो गया, जो सूर का भ्रमर गीत हो गया; जो जयदेव का गीत गोविंद हो गया; जो मीरा हो गया। जो संपूर्ण भारत का कृष्ण भक्ति काव्य हो गया। कैसा था वह प्रेम जो कृष्ण मंदिरों में बेजोड़ स्थापत्य हो गया; चित्रकला में रंगोपासना हो गया और संगीत में वंशी वादन हो गया। यही अलौकिक प्रेम पूरी दुनिया में इस्कॉन टेंपल हो गया।
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