नई दिल्ली, दिसंबर, 2025- राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र में जाति, वर्ग और लिंग असमानता को लेकर संघर्ष कर रही दो बहनों की कहानी कहती पुरस्कार विजेता 29 मिनट की लघु फिल्म रू-ब-रू को कल इंडिया हैबिटेट सेंटर में प्रदर्शित किया गया। इस विशेष शो में प्रेस, फिल्म प्रशंसकों, संस्कृति के पैरोकारों और महिला केंद्रित संगठनों के प्रतिनिधियों आमंत्रित किया गया था।
अनिता और सीपी गुरनानी एवं रू-ब-रू की पूरी टीम द्वारा आयोजित इस फिल्म की स्क्रीनिंग से पूर्व यह अंतरराष्ट्रीय जगत में अपनी धमक जमा चुकी है। इस फिल्म के निर्माताओं की यह पहली फिल्म है जिसे प्रमुख भारतीय एवं वैश्विक उत्सवों में कई सर्वोत्तम लघु फिल्म के अवार्ड मिले हैं। इनमें केरल के इंडियन डॉक्युमेंटरी एंड शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल, 56वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (इंडियन पैनोरामा-नॉन फीचर), कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ शिमला में इस फिल्म को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है।
इंदिरा तिवारी, रिचा मीना और लोकेश मित्तल अभिनीत रू-ब-रू के निर्माण का नेतृत्व पूरी तरह से महिलाओं की टीम द्वारा किया गया जिसमें अन्विता गुप्ता, अनिता गुरनानी और प्रियंका चोपड़ा शामिल हैं। फरौक मलिक के साथ इस फिल्म की कहानी लिखने वाले कपिल तंवर के निर्देशन में बनी यह फिल्म दो बहनों- एक रुदाली (पेशेवर शोक मनाने वाली) और दूसरी नचनिया की गहरी भावनात्मक यात्रा की कहानी कहती है। ये बहनें जाति, वर्ग और लिंग असमानता भरी दुनिया में अपनी स्वतंत्रता को फिर से हासिल करने के लिए संघर्षरत हैं। अपनी विचारोत्तेजक लोक संगीत, नृत्य परंपराओं और भावनात्मक किस्सागोई से सराबोर इस फिल्म ने राजस्थानी संस्कृति को वैश्विक सिनेमाई परिदृश्य पर लाने के लिए काफी प्रशंसा बंटोरी है।
इस फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद फिल्म के निर्देशक, निर्माता और मुख्य किरदार निभाने वाले कलाकारों ने पत्रकारों और प्रख्यात हस्तियों के साथ संवाद किया और इस फिल्म की यात्रा, रचनात्मक पसंद और व्यापक सामाजिक विषयों पर चर्चा की।
रू-ब-रू की सह निर्माता अनिता गुरनानी ने कहा, “दिल्ली स्क्रीनिंग में रू-ब-रू देखकर ऐसी संजीदा बातचीत करना काफी सार्थक रहा। यह फिल्म हमेशा से ही उन महिलाओं के लिए जगह रखती है जिनके जीवन की सच्चाई ईमानदारी के साथ बहुत कम दिखाई जाती है और दर्शकों को इस फिल्म में तल्लीन देखकर लगता है कि जो भी हमें उम्मीद थी, हमने वह हासिल कर लिया। प्रत्येक स्क्रीनिंग यह धारणा मजबूत करती है कि जीवंत अनुभवों पर आधारित कहानियां बहुत
गहरा असर छोड़ती हैं और यह मायने नहीं रखता कि वह कहां कही गई हैं।”
अपने विचार साझा करते हुए निर्देशक कपिल तंवर ने कहा, “आज दिल्ली के दर्शकों के साथ रू-ब-रू को साझा कर ऐसा महसूस हुआ कि जैसे इस कहानी को एक नए तरीके से घर में लाया गया है। यह फिल्म गरिमा और अस्तित्व के बारे में एक शांत प्रश्न के साथ शुरू होती है और प्रत्येक स्क्रीनिंग मुझे यह दिखाती है कि ये प्रश्न सही मायने में कितने वैश्विक हैं। कमरे में प्रतिबिंब मुझे यह याद दिलाता है कि मैंने यह फिल्म क्यों बनाई.. इसलिए बनाई ताकि महिलाओं की भावनात्मक दुनिया जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं और बहुत कम देखते हैं, वह दुनिया देख सके। मैं इस बातचीत के लिए आभारी हूं जो निरंतर मेरे भीतर ऊर्जा भरती है।”
रू-ब-रू की निर्माता अन्विता गुप्ता ने कहा, “हर बार रू-ब-रू एक नए दर्शक से मिलती है तो एक नई परत उभारती है कि महिलाएं जो प्रयास करती हैं, उनसे कैसे पार पाती हैं। आज की स्क्रीनिंग ने मेरा विश्वास और मजबूत किया कि प्रमाणिकता और सांस्कृतिक स्मरण द्वारा आकार दी गई कहानियां जबरदस्त ताकत रखती हैं। दिल्ली में यह फिल्म देखकर इन आवाज को सामने लाने की हमारी प्रतिबद्धता और मजबूत हुई।”
जैसा कि इस फिल्म ने 2025 में अपनी फेस्टिवल यात्रा जारी रखी है, रू-ब-रू स्वतंत्र भारतीय सिनेमा में एक शक्तिशाली आवाज के रूप में खड़ी है और वैश्विक भावनात्मक पहुंच के साथ एक स्थानीय कहानी की पेशकश करती है और उन समुदायों को की कहानियां सामने लाती है जिनकी हकीकत अक्सर अनदेखी रह जाती है।
रू-ब-रू एक ताकतवर लघु फिल्म है जो दो बहनों की यात्रा के जरिए महिलाओं की कहानियों को सामने लाती है। इनमें एक बहन रुदाली (पेशेवर शोक मनाने वाली), जबकि दूसरी नृत्यांगना है जो जाति, वर्ग और लिंग बाधाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं। मूलतः राजस्थान से आने वाले और निर्देशन के क्षेत्र में कदम रख रहे कपिल तंवर ने इस फिल्म में समृद्ध सांस्कृतिक जड़ों को भावनात्मक गहराई के साथ मिलाया है और यह कहानी सभी संदर्भों से गहराई से जुड़ी है। अन्विता गुप्ता (शादाम फिल्म्स) द्वारा निर्मित, अनिता गुरनानी द्वारा सह निर्मित और प्रियंका चोपड़ा द्वारा कार्यकारी तौर पर निर्मित रू-ब-रू ने इमेजिनइंडिया फिल्म फेस्टिवल मैड्रिड 2025 में सर्वोत्तम लघु फिल्म, एटलाटा इंडियन फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट सिनेमाटोग्राफी (लघु), अयोध्या इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट सिनेमाटोग्राफी, बेस्ट साउंड डिजाइन और सेकेंड बेस्ट शॉर्ट फिल्म के साथ ही गोवा शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल 2025 में बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड जीता। इस फिल्म को दादासाहेब फाल्के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में शीर्ष 21 लघु फिल्मों में शामिल किया गया और यह यूरोप के सबसे बड़े भारतीय फिल्म शोकेस- इंडियन फिल्म फेस्टिवल स्टुटगार्ट में “इन कंप्टीशन” वर्ग में शामिल रही।
सफल प्राइवेट स्क्रीनिंग के बाद इस टीम ने इस फिल्म का पूर्ण सिनेमाई संस्करण विकसित करने की घोषणा की है। जहां लघु फिल्म ताकत और सशक्तिकरण के विषयों को तलाशती है, विस्तृत फिल्म में बाल शिक्षा केंद्र में होगी। फिल्म निर्माताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि यह कहानी ग्रामीण भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी थीम सभी मध्यम वर्गीय परिवारों और समुदायों में समान रूप से गूंजती है जहां लड़कियों के लिए शिक्षा पर अब भी उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए। वे अब सरकारी एजेंसियों, मीडिया संगठनों, एनजीओ और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध कंपनियों से इस विजन को जीवंत करने के लिए सहयोग मांग रहे हैं। आगामी फिल्म का लक्ष्य महिलाओं के सशक्तिकरण और बाल शिक्षा की परिवर्तनकारी भूमिका पर सार्थक चर्चा को जन्म देना और समाज के विविध तबकों पर एक भावनात्मक और दूरगामी प्रभाव पैदा करना है।