भाजपा अपने फायदे के लिए ला रही है शैक्षिक योग्यता का चुनाव सुधार

हरिराम कोडवानी

वरिष्ठ समाजसेवी हरिराम कोडवानी ने बताया अव्यावहारिक, साठ वर्ष से अधिक उम्र के प्रत्याशियों को छूट का सुझाव

अजमेर। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का शोर अभी थमा भी नहीं है कि भाजपा एक और चुनाव सुधार लाने की तैयारी कर रही है। एसआईआर जहां चुनाव आयोग का फैसला था वहीं भाजपा अगले साल होने जा रहे पंचायत व पालिका चुनावों में शैक्षिक योग्यता को पुन: लागू कर अनपढ़ नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का रास्ता निकाल रही है। यूडीएच मंत्री ने शहरी निकाय चुनाव और पंचायतीराज मंत्री ने चुनावों में शैक्षणिक योग्यता लागू करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के पास मंजूरी के लिए भेजा है। प्रस्तावों में सरपंच के लिए कम से कम 10वीं पास होने की अनिवार्यता लागू करने का प्रस्ताव दिया है। पार्षदों के लिए 10वीं और 12वीं में से एक योग्यता लागू करने का प्रस्ताव है।शहर के वरिष्ठ समाजसेवी नेता हरीराम कोडवानी ने इसे भाजपा का पैंतरा करार देते हुए इस प्रस्ताव को अव्यावहारिक व गैरजरूरी बताया है।
अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी रहे कोडवानी ने दैनिक मरु़ प्रहार से बातचीत करते हुए कहा कि वसुंधरा सरकार ने पंचायतों और निकाय चुनाव में शैक्षणिक योग्यता लागू की थ जिसका बीजेपी को गांवों में फायदा हुआ था। कांग्रेस की तुलना में बीजेपी के ज्यादा संख्या में स्थानीय जनप्रतिनिधि जीतकर आए थे। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। चुनाव जीतकर कांग्रेस ने इस प्रावधान को हटाया था क्योंकि जब विधायक और सांसद के लिए किसी तरह की शैक्षणिक योग्यता नहीं है, तो पंचायतीराज और शहरी निकायों पर प्रावधान क्यों लागू हो? अब भजनलाल सरकार इसे फिर से लागू करने की तैयारी में है।
कोडवानी ने कहा कि जनप्रतिनिधियों का शिक्षित होना अच्छा विचार है, इससे जनप्रतिनिधि अफसरशाही के सामने कमजोर नहीं पड़ेंगे लेकिन इससे पहले भी ग्रामीण व शहरी निकाय चुनावों में कई सुधार अपेक्षित हैं। प्रधान पति, सरपंच पति, पंच पति या पार्षद पति जैसे शब्द लोकतंत्र के शब्दकोश में कहीं नहीं हैं लेकिन यथार्थ में इन पदों को कई जगह पति चला रहे हैं और कहीं पुत्र। मीडिया भी बिना किसी अपराधबोध के गैर जिम्मेदाराना तरीके से सरपंच पति व पार्षद पति लिखता ही है। इसका कारण यह है कि जब पार्टी सरकार महिलाओं को अवसर देती है तो नेता अपनी पत्नी या मां को आगे कर देते हैं और पार्टी युवाओं को अवसर देती है तो नेताओं की संतानें आगे कर दी जाती हैं। खास तौर पर गांवों में कुछ ही परिवार होते हैं जिनके इर्द गिर्द पंचायतों व पंचायत समितियों के पद घूमते रहते हैं। बैठकों में महिलाएं घूंघट में भाग लेती हैं या फिर सीधे सीधे पति ही विराजमान हो जाते हैं। अफसर इन्हें अनदेखा कर जाते हैं क्योंकि उन्हें वापस घर लौटना है। इसलिए सरकार इन पदों पर डमी नहीं बैठे उसके लिए रास्ते निकाले।
कोडवानी ने कहा कि अगर जनप्रतिनिधि शिक्षित होने चाहिए ही चाहिए तो सुधार की गंगा ऊपर से क्यों बहाई जाए? नालों को साफ करने से क्या होगा? गंगोत्री साफ होनी चाहिए। निकायों में भी इसे लागू करना ही है तो इसे आयुसीमा से जोड़ा जाना चाहिए। शैक्षिक योग्यता की शर्त उन प्रत्याशियों पर लागू हो जिनकी आयु साठ वर्ष से कम हो। साठ या उससे अधिक उम्र के प्रत्याशी वे हैं जिनके समय में शिक्षा इतनी सहज सुलभ नहीं थी। कई लोग पारिवारिक व आर्थिक मजबूरियों से स्कूल नहीं जा पाए लेकिन उन्हें जीवन में अनुभव किसी शिक्षित से कम नहीं है। अगर शैक्षिक योग्यता की शर्त लागू की गई तो कई अनुभवी सरपंच, पंच व पार्षद इस दौड़ से बाहर हो जाएंगे या फिर उनके परिवारों से डमी जनप्रतिनिधि चुने जाएंगे।
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