महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालयए अजमेर में नव संवत्सर 2083 एवं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के पावन अवसर पर एक भव्य एवं प्रेरणादायक समारोह का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम को अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के सहयोग से आयोजित किया गया। समारोह में पुष्कर.चित्रकूट धाम के प्रधान उपासक पूज्य श्री पाठक जी महाराज का आशीर्वचन एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रोण् सुरेश कुमार अग्रवाल ने की। कार्यक्रम का संचालन प्रोण् अरविंद पारिक ने किया।
कुलगुरु प्रोण् सुरेश कुमार अग्रवाल का उद्बोधन
कुलगुरु प्रोण् सुरेश कुमार अग्रवाल ने अपने उद्बोधन में विश्वविद्यालय को गुरुकुल परंपरा के आधार पर विकसित करने के संकल्प को दोहराया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में प्रतिदिन प्रातःकाल वैदिक मंत्रों एवं गायत्री मंत्र से दिन का शुभारंभ होता है तथा संध्या भी इसी परंपरा के साथ संपन्न होती है। यह विश्वविद्यालय महर्षि दयानंद सरस्वती जी की प्रेरणा को आत्मसात कर उनके आदर्शों एवं वैदिक सिद्धांतों पर आगे बढ़ रहा है।
कुलगुरु महोदय ने नव संवत्सर के दार्शनिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व केवल एक वर्ष के बीत जाने का प्रतीक नहीं हैए बल्कि यह परिवर्तन का उद्घोष है। परिवर्तन सृष्टि का शाश्वत नियम है और परिवर्तन के साथ ही सृजन की प्रक्रिया आरंभ होती है। जिस प्रकार प्रकृति बसंत ऋतु में नवपल्लव धारण करती हैए उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन और कार्य में गतिशीलता ;क्लदंउपेउद्ध बनाए रखनी चाहिए तथा स्थिरता ;ैजंहदंजपवदद्ध से बचना चाहिए।
उन्होंने विकसित भारत के निर्माण में शैक्षणिक संस्थाओं की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण की यात्रा आत्मावलोकन ;ैमस.िप्दजतवेचमबजपवदद्ध से प्रारंभ होती है। इसके लिए प्रत्येक शिक्षकए शोधार्थी एवं विद्यार्थी को अपने कर्तव्यों का चिंतन करना आवश्यक है। उन्होंने इस अवसर पर यह महत्त्वपूर्ण घोषणा की कि विश्वविद्यालय में प्रतिवर्ष श्आत्मावलोकन दिवसश् ;ैमस.िप्दजतवेचमबजपवद क्ंलद्ध मनाया जाएगाए जिसकी शुरुआत इसी वर्ष से होगी। इस दिवस पर विश्वविद्यालय परिवार अपनी उपलब्धियोंए कमियों और सुधार की दिशा का मूल्यांकन करेगा।
उन्होंने रामायण में वर्णित गिलहरी की प्रेरक कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि भले ही यह विश्वविद्यालय राष्ट्र निर्माण में एक छोटा.सा योगदान करेए किंतु वह योगदान राष्ट्र के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।
कला संकाय के अधिष्ठाता प्रोण् अनिल दधीच का उद्बोधन
कला संकाय के अधिष्ठाता प्रोण् अनिल दधीच ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के ऐतिहासिकए आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व को विस्तार से प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा कि यदि इस दिन को केवल श्नया सालश् मान लिया जाए तो यह इसके गहन अर्थ के साथ अन्याय होगा। यह दिन भारतीय कालबोध का वह उद्गम बिंदु है जहाँ सृष्टिए इतिहासए धर्मए संस्कृति और प्रकृति एक साथ संवाद करते हैं।
उन्होंने नव संवत्सर से जुड़ी प्रमुख ऐतिहासिक एवं धार्मिक घटनाओं को एक सूत्र में पिरोते हुए बतायारू परमपिता ब्रह्मा जी द्वारा इसी दिन सृष्टि रचना का शुभारंभ हुआ थाय ईसा पूर्व 57 में सम्राट विक्रमादित्य ने शक शक्तियों पर विजय प्राप्त कर विक्रम संवत् का आरंभ कियाय भगवान श्री राम का राज्याभिषेक एवं महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी कालखंड से जुड़ा हैय और चैत्र नवरात्रि के रूप में मातृशक्ति की उपासना इसी दिन से प्रारंभ होती है।
प्रोण् दधीच ने बताया कि इस विश्वविद्यालय का नाम जिन महापुरुष के नाम पर हैए उन महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भी इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की थीए जो सामाजिक पुनर्जागरण की एक ऐतिहासिक घटना है। उन्होंने अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के बारे में जानकारी दी कि यह संगठन देश भर के लगभग 13 लाख शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करता है और अधिकारों की माँग के बजाय कर्तव्यपालन को प्राथमिकता देता है।
उन्होंने अंत में कहा कि नव संवत्सर हमें यह प्रश्न करने का अवसर देता है कि पिछले वर्ष में हमने अपने भीतर क्या नया रचा और इस वर्ष हम क्या नया सृजन करने वाले हैं। यह दिन हमें सृजनए संघर्षए संस्कार और आत्मनिर्माण के लिए आमंत्रित करता है।
पूज्य श्री पाठक जी महाराज का आशीर्वचन
पुष्कर.चित्रकूट धाम के प्रधान उपासक पूज्य श्री पाठक जी महाराज ने अपने ओजस्वी आशीर्वचन में सनातन धर्म की वैज्ञानिकता को प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा कि हमारा सनातन धर्म शुद्ध गणित एवं विज्ञान पर आधारित है कृ इसमें कहीं भी अंधश्रद्धा के लिए स्थान नहीं है। प्रत्येक परंपराए प्रत्येक पर्व और प्रत्येक अनुष्ठान के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक आधार है।
उन्होंने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवरात्रि आरंभ होने के संदर्भ में शक्ति.उपासना और नारी सम्मान के गहरे दर्शन को उजागर किया। उन्होंने कहा कि भगवान शिव के नाम से यदि शक्ति रूपी श्इश् की मात्रा हटा दी जाए तो श्शिवश् शब्द श्शवश् में परिवर्तित हो जाता है कृ अर्थात् शक्ति के बिना शिव भी अधूरे हैं। इसी दार्शनिक आधार पर उन्होंने कहा कि बिना शक्ति के कोई सृजन संभव नहीं है। इसलिए नारी को हृदय मेंए वाम भाग में आसन देने की हमारी परंपरा वास्तव में उसे सर्वोच्च सम्मान प्रदान करने की परंपरा है।
उन्होंने वेदों एवं शास्त्रों में वर्णित 14 भुवनों की काउंटिंग का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक विज्ञान भी अब यह मानने लगा है कि ऐसे अनेक ब्रह्मांड हो सकते हैं। इससे सिद्ध होता है कि हमारे ऋषि.मुनि कितने ज्ञानवान और विज्ञान से परिपूर्ण थे। उन्होंने युवाओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज का युवा बहुत ऊर्जावान है कृ उसे सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है और यह दायित्व गुरुजनों का है कि वे उनके हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए तत्पर रहें।
महाराज जी ने राष्ट्र धर्म को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि राष्ट्र है तो हम हैंए हम हैं तो श्रद्धा हैए श्रद्धा है तो विश्वास है। अतः सबसे पहले राष्ट्र धर्म को अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो राष्ट्र.हितों कोए समाज की संस्कृति को और जीवन के मूल्यों को समझने की क्षमता प्रदान करे।
कुल सचिव श्री कैलाश जी शर्मा का धन्यवाद ज्ञापन
कुल सचिव श्री कैलाश जी शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए पूज्य पाठक जी महाराज के आशीर्वचन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि महाराज जी ने नव संवत्सर के कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊंचाइयाँ प्रदान कीं और सनातन की वैज्ञानिकता को प्रतिपादित कर सभी का मार्गदर्शन किया। उन्होंने कुलगुरु महोदय द्वारा श्आत्मावलोकन दिवसश् मनाने की घोषणा के लिए विश्वविद्यालय परिवार की ओर से आभार व्यक्त करते हुए आश्वस्त किया कि समस्त विश्वविद्यालय परिवार इस पहल में कंधे से कंधा मिलाकर चलेगा। उन्होंने अपने संबोधन के अंत में एक सूक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कृ श्उद्यमेन सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैःश् अर्थात् कार्य केवल सोचने से नहीं बल्कि प्रयत्न करने से सिद्ध होते हैं।
कार्यक्रम की प्रमुख घोषणाएँ एवं निर्णय
ऽ विश्वविद्यालय में प्रतिवर्ष श्आत्मावलोकन दिवसश् ;ैमस.िप्दजतवेचमबजपवद क्ंलद्ध मनाया जाएगा कृ इसका शुभारंभ इसी वर्ष से।
ऽ इस दिवस पर विश्वविद्यालय परिवार अपने कार्यों का मूल्यांकनए कमियों का विश्लेषण और भविष्य की दिशा का निर्धारण करेगा।
ऽ नव संवत्सर को महर्षि दयानंद सरस्वती के आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में विशेष रूप से स्मरण किया गया।
ऽ राष्ट्रीय शिक्षा नीति.2020 के क्रियान्वयन में विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया गया।
ऽ कर्तव्यपालन को अधिकारों की माँग से पूर्व रखने का संकल्प समस्त विश्वविद्यालय परिवार ने लिया।
उपस्थित गणमान्य जन
कार्यक्रम में पुष्कर.चित्रकूट धाम के प्रधान उपासक पूज्य श्री पाठक जी महाराजए कुलगुरु प्रोण् सुरेश कुमार अग्रवालए कुल सचिव श्री कैलाश जी शर्माए छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रोण् सुभाष चंद्र शर्माए कला संकाय के अधिष्ठाता प्रोण् अनिल दधीचए कार्यक्रम संचालक प्रोण् अरविंद पारिकए परीक्षा नियंत्रक महोदयए विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापकगणए अधिकारी एवं कर्मचारीगणए पीएचडी कोर्स वर्क के शोधार्थी एवं विद्यार्थीगणए मीडियाकर्मी तथा अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के सदस्य उपस्थित रहे।