एकात्म मानववाद: पुनर्जागरण का भारतीय मंत्र

प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल

वैश्विक इतिहास में एक समय ऐसा आता है, जब प्रगति का शिखर भी शून्यता का अहसास कराने लगता है; जब उपलब्धियाँ भी असंतोष को जन्म देती हैं; और जब विकास का वैभव अन्दर की दरिद्रता को छिपा नहीं पाता। आज का वैश्विक परिदृश्य कुछ ऐसा ही है—बाह्य समृद्धि और आंतरिक विखंडन का एक बेमेल संगम। विज्ञान ने सीमाएँ लांघ दी हैं, तकनीक ने समय और दूरी को पराजित कर दिया है, परंतु मनुष्य का मन आज भी शांत नहीं है, समाज विखंडित है, और प्रकृति आहत है। ऐसे संक्रमण काल में, जब मानवता दिशाहीनता के कुहासे में भटक रही हो, तब एक ऐसे‌ विचार दर्शन की आवश्यकता होती है, जो केवल समाधान नहीं दे, अपितु जीवन की मूल प्रकृति को पुनः परिभाषित करे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का “एकात्म मानववाद” इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। यह केवल एक राजनीतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की उस गहन परंपरा का आधुनिक स्वरूप है, जो समन्वय, संतुलन और समरसता को जीवन‌ सिद्धांतो पर आधारित है।
भारतीय चिंतन की उपेक्षा से आत्मविस्मृति का संकट उत्पन्न हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने अपने विकास का मार्ग तो चुना, परंतु उस मार्ग के चयन में उसने अपने ही बौद्धिक और सांस्कृतिक स्रोतों की उपेक्षा कर दी। पश्चिमी विचारधाराओं—पूँजीवाद और समाजवाद—को हमने बिना सम्यक् परीक्षण के अपनाया, जबकि हमारे अपने मनीषियों ने जीवन और समाज के संबंध में जो गहन दृष्टि प्रस्तुत की थी, उसे हाशिए पर डाल दिया गया। भारतीय चिंतन का मूल स्वभाव ही समन्वयकारी रहा है, हमने जीवन को एक अखंड सत्ता के रूप में देखा गया। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, रामायण से लेकर महाभारत तक—हर स्थान पर यह भावना विद्यमान है कि समस्त सृष्टि एक ही चेतना के विविध रूप हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, अपितु एक जीवन-दृष्टि है। किन्तु आधुनिक भारत ने इस दृष्टि को विस्मृत कर दिया। परिणामस्वरूप, विकास की प्रक्रिया में एक गहरा असंतुलन उत्पन्न हुआ—जिससे आर्थिक प्रगति तो हुई, परंतु नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास भी समान रूप से हुआ।
एकात्म मानववाद समग्रता की पुनर्स्थापना का आह्वान है। यह हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य केवल एक आर्थिक इकाई नहीं है, जिसे उत्पादन और उपभोग के संदर्भ में समझा जा सके। वह शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित रूप है—एक ऐसी चेतना, जिसकी पूर्णता संतुलन में निहित है। यह दर्शन जीवन के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—को संतुलित रूप में स्वीकार करता है। पश्चिमी चिंतन प्रायः अर्थ और काम तक सीमित रह जाता है, किन्तु एकात्म मानववाद धर्म को आधार और मोक्ष को अंतिम लक्ष्य के रूप में स्थापित करता है। इस प्रकार यह जीवन को केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे आध्यात्मिक उत्कर्ष की ओर भी अग्रसर करता है।
एकात्मक मानववाद द्वंद्व नहीं, समन्वय का सिद्धांत है। पाश्चात्य विचारधाराएँ प्रायः द्वंद्व पर आधारित हैं—व्यक्ति बनाम समाज,राज्य बनाम नागरिक, प्रकृति बनाम विकास,भौतिकता बनाम आध्यात्मिकता। इन द्वंद्वों ने मानवता को निरंतर संघर्ष की स्थिति में बनाए रखा है। परिणामस्वरूप, समाज में तनाव, प्रतिस्पर्धा और विखंडन की प्रवृत्ति बढ़ती गई है। इसके ठीक विपरीत, एकात्म मानववाद इन सभी द्वंद्वों को अस्वीकार करता है। यह कहता है कि जीवन का मूल स्वभाव संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय है। व्यक्ति और समाज एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। राज्य का उद्देश्य व्यक्ति को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसकी उन्नति में सहायक होना है। प्रकृति कोई शोषण की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।
समकालीन समय में एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता और बढ़ी है। आज विश्व जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वे केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं हैं; वे मूलतः वैचारिक और सांस्कृतिक संकट हैं।.
(i)सामाजिक विखंडन – परिवार टूट रहे हैं, समुदाय बिखर रहे हैं, और व्यक्ति अकेलापन अनुभव कर रहा है।
(ii)मानसिक तनाव- प्रतिस्पर्धा और उपभोग की अंधी दौड़ ने मनुष्य को भीतर से थका दिया है।
(iii)पर्यावरणीय संकट- प्रकृति के अंधाधुंध दोहन ने जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक असंतुलन को जन्म दिया है।
(iv)नैतिक पतन- भौतिकता की अति ने नैतिक मूल्यों को कमजोर कर दिया है। इन सभी समस्याओं का मूल कारण है—असंतुलन।
और एकात्म मानववाद इसी असंतुलन को संतुलन में परिवर्तित करने का मार्ग प्रस्तुत करता है।
एकात्म मानववाद में ‘धर्म’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। धर्म जीवन की धुरी है। धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय या पंथ से नहीं, बल्कि उस सार्वभौमिक नियम से है, जो जीवन को संतुलित और व्यवस्थित करता है। धर्म ही वह शक्ति है, जो व्यक्ति को मर्यादा प्रदान करती है, समाज को समरसता देती है, और राष्ट्र को दिशा प्रदान करती है। धर्म के अभाव में स्वतंत्रता भी अराजकता में परिवर्तित हो जाती है।
प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व मानव जीवन का अभिन्न अंग है।‌एकात्म मानववाद प्रकृति को केवल संसाधन नहीं मानता, अपितु उसे जीवन का अभिन्न अंग मानता है। भारतीय संस्कृति में नदियों को माता, पर्वतों को देवता, और वृक्षों को जीवनदाता के रूप में देखा गया है। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है, तब यह दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित नहीं करेगा, तो उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा।
एकात्म मानववाद के संदर्भ में विकास को पुनर्भाषित करने की आवश्यकता है। एकात्म मानववाद विकास की उस अवधारणा को चुनौती देता है, जो केवल उत्पादन और उपभोग पर आधारित है। एकात्म मानववाद मानता‌ है कि विकास का वास्तविक अर्थ है—मानव जीवन की समग्र उन्नति। विकास तभी सार्थक है, जब—
वह नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करे, सामाजिक समरसता को बढ़ाए
प्रकृति के संतुलन को बनाए रखे और व्यक्ति को आंतरिक शांति प्रदान करे।
अंतत: यह कहना समीचीन होगा कि आज जब विश्व अपने ही निर्मित संकटों से जूझ रहा है, तब एकात्म मानववाद एक नई दिशा प्रदान करता है—एक ऐसी दिशा, जो अतीत की जड़ों से जुड़ी हुई है और भविष्य की संभावनाओं को आलोकित करती है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि सच्चा विकास वही है, जिसमें व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन हो; जहाँ प्रगति का अर्थ केवल बाहरी विस्तार नहीं, बल्कि आंतरिक परिष्कार भी हो। यदि मानवता को अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखना है, तो उसे इस समन्वयकारी दृष्टि को अपनाना ही होगा। एकात्म मानववाद केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। जब विश्व अंधकार में डूबा हो, तब एक दीपक ही पर्याप्त होता है दिशा दिखाने के लिए। एकात्म मानववाद एक ऐसा दीपक है—जो न केवल मार्ग दिखाता है, बल्कि उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है।यह हमें अपने भीतर झाँकने, अपनी जड़ों को पहचानने और एक संतुलित, समरस और मानवीय विश्व के निर्माण की ओर अग्रसर होने का आह्वान करता है।

 

प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल
कुलगुरू
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर

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