भारत के रक्षा एवं अंतरिक्ष क्षेत्र के नेताओं ने युद्ध के नए क्षेत्र में प्रवेश करने के साथ संप्रभु अंतरिक्ष क्षमताओं का आह्वान किया

नई दिल्ली, अप्रैल, 2026- बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आधुनिक युद्ध में अंतरिक्ष की बढ़ती केंद्रीयता के बीच भारत के रक्षा एवं अंतरिक्ष क्षेत्र के शीर्ष नेताओं ने इंडियन स्पेस एसोसिएशन (इस्पा) द्वारा आयोजित संगोष्ठी इंडियन डिफेंस स्पेस सिंपोजियम (आईडीएस) 2026 में लचीले, संप्रभु एवं एकीकृत अंतरिक्ष क्षमताओं के निर्माण की तत्काल जरूरत रेखांकित की। आज नई दिल्ली में शुरू हुआ यह दो दिवसीय फोरम भारत के रक्षा एवं अंतरिक्ष पारितंत्र के बीच तालमेल मजबूत करने पर केंद्रित रहा जिसमें रक्षा मंत्रालय, सशस्त्र बलों, रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी से अधिकारी, नीति निर्माता, सार्वजनिक उपक्रम, स्टार्टअप्स और उद्योगपति शामिल हुए।

उद्घाटन सत्र को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने वर्चुअल तौर पर संबोधित किया। कार्यक्रम में एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) एवं पूर्व चीफ ऑफ एयर स्टाफ आरकेएस भदौरिया, रक्षा एवं आरएंडडी विभाग के सचिव और चेयरमैन डीआरडीओ डाक्टर समीर वी. कामत, डिप्टी चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (ऑपरेशंस), मुख्यालय आईडीएस लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए. मीनवाला और इंडियन स्पेस एसोसिएशन के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल एके भट्ट सहित अन्य गणमान्य अतिथि शामिल हुए।

अपने वर्चुअल संबोधन में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, भारतीय सशस्त्र बल, जनरल अनिल चौहान ने कहा, हमें अतिरेक, अंतर उपग्रहीय लिंक और तीव्र पुनर्भरण क्षमता से युक्त वितरित, लचीले और व्यापक वास्तुकलाओं की दिशा में लक्षित होना चाहिए। भावी अंतरिक्ष क्षमता का निर्माण अकेले सरकारी एजेंसियों के बल पर नहीं होगा। इसे उद्योग, स्टार्टअप्स और प्रौद्योगिकी नवप्रवर्तकों के साथ मिलकर विकसित किया जाएगा। हमें अंतरिक्ष को एक कार्यक्रम के तौर पर उपयोग से इसे एक सतत परिचालन संपत्ति के तौर पर लेना होगा। हमारा उद्देश्य महज अंतरिक्ष तक पहुंच की नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष के जरिए परिचालन लाभ सुरक्षित करना है। हमें हमारी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता किए बगैर रणनीतिक साझीदारी पर काम करना होगा। हमें एक ऐसे अंतरिक्ष ढांचे का निर्माण करना होगा जो लचीला हो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से युक्त हो, क्वांटम सुरक्षित हो, साइबर ढांचा सख्त हो, तेजी से पुनः भरने योग्य हो और निःसंदेह हमारे लिए संप्रभु हो। इससे कुछ भी कम हमें एक रिएक्टिव मोड में छोड़ देगा।

संगोष्ठी के प्रथम दिन वैश्विक टकरावों और विरोधी अंतरिक्ष क्षमताओं सहित उभरते खतरा परिदृश्य की समीक्षा की गई और साथ ही इस बात की संभावना तलाशी गई कि कैसे वाणिज्यिक अंतरिक्ष सैन्य परिणामों को आकार दे रहा है। साथ ही इसमें आधुनिक टकरावों, रणनीतिक संचार और नेटवर्क केंद्रित परिचालनों में अंतरिक्ष की भूमिका एवं विवादित वातावरण में अंतरिक्ष आधारित इंटेलिजेंस, निगरानी एवं टोह (आईएसआर) की भूमिका पर भी चर्चा की गई।

इसके अलावा, संगोष्ठी में तीन प्रकाशनों का भी विमोचन किया गया जिसमें इन-स्पेस सर्विसिंग, असेंबली एवं विनिर्माण (आईएसएएम) पर ऑर्बिटएड एवं इस्पा द्वारा तैयार एक रिपोर्ट शामिल है जिसमें भावी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को सुगम बनाने में इसकी भूमिका और मजबूत नीति संरेखण एवं उद्योग के साथ गठबंधन के जरिए इन-ऑर्बिट सेवाओं में नेतृत्व हासिल करने के लिए भारत के समक्ष मौजूद अवसर को रेखांकित किया गया। सैटश्योर एवं इस्पा द्वारा तैयार दूसरी रिपोर्ट जियोस्पैटियल फाउंडेशन मॉडल्स में यह रेखांकित किया है कि कैसे एआई संचालित, पुनः उपयोग लायक इंटेलिजेंस की परतें अर्थ ऑब्जर्वेशन डेटा से व्यापक स्तर का प्रभाव हासिल कर सकती हैं जिससे सभी क्षेत्रों में त्वरित, विस्तार योग्य एवं निर्णय के लिए तैयार अंतर्दृष्टि सुगम होगी। एमिटी दवारा तैयार तीसरी रिपोर्ट में इस्पा इंडिया इंटरनेशनल स्पेस कॉनक्लेव 2025 से प्रमुख परिचर्चाओं एवं रणनीतिक निष्कर्षों के समाहित किया गया जिसके आधार पर नीति, उद्योग की वृद्धि, टेक्नोलॉजी विकास एवं अंतरिक्ष क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन को लेकर प्राथमिकताएं रेखांकित की गई हैं।

सचिव डीडी (आरएंडडी) एवं चेयरमैन डीआरडीओ डाक्टर समीर वी कामत ने कहा, “अंतरिक अब केवल सहायक कारक नहीं रह गया है। यह वह प्रमुख क्षेत्र है जो भविष्य के युद्धों के परिणाम तय करेगा। डीआरडीओ और देश को आगे बढ़ाने के लिए यह एक चुनौती बनने जा रहा है और यह तभी किया जा सकता है जब हम राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण से काम करें। ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां टेक्नोलॉजीज़ को बाहर से लिया जा सकता है, लेकिन कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां संप्रभु क्षमताएं आवश्यक हैं और यही वे क्षेत्र हैं जहां डीआरडीओ ध्यान केंद्रित कर रहा है। आज हम हमारी जीडीपी का केवल 0.65 प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करते हैं और हमारे रक्षा बजट का केवल 5 प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करते हैं। हमें हमारे आरएंडडी प्रयासों में कहीं अधिक निवेश करने की जरूरत है। अगर हमें हमारे प्रतिद्वंदियों से आगे निकलना है तो हमें निश्चित तौर पर इसे बढ़ाने की जरूरत है।”

डिप्टी चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (ऑपरेशंस), मुख्यालय आईडीएस लेफ्टिनेंट जनरल जुबिन ए मीनवाला ने कहा, “भारत को निजी उद्योग की गति, चपलता और बुद्धिमत्तापूर्ण एकीकरण के आधार पर अपना स्वयं का मार्ग तैयार करना होगा। केवल एक एजेंसी पर निर्भरता ठीक नहीं होगी। हमें एक ऐसा पारितंत्र तैयार करना होगा जहां सभी भागीदार एक दूसरे के पूरक हों। रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी ने डिफेंस विजन 2047 के तहत संयुक्त सैन्य अंतरिक्ष सिद्धांत और एक दीर्घकालीन रूपरेखा व्यक्त की है। रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी एक पूर्णतः कार्यरत त्रि-सेवा इकाई के रूप में विकसित हो चुकी है और भविष्य में यह एक पूरी तरह से चालू अंतरिक्ष कमांड होगी। हम महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में निर्भरता और हाई-एंड देशज प्रणालियों में कमी का निरंतर सामना कर रहे हैं। यह फोकस परिचालन समय सीमा के साथ देशज विकास पर होना आवश्यक है।”

एयर चीफ मार्शन आरकेएस भदौरिया (सेवानिवृत्त), पूर्व चीफ ऑफ एयर स्टाफ ने कहा, “यह बड़ा सोचने, बड़ा करने और नियमों को बदलने का समय है। यदि हम सार्थक परिणाम हासिल करने को लेकर गंभीर हैं तो हमें परिदृश्य को नए सिरे से तैयार करना होगा। तीन साल बाद हमें खुद से पूछना होगा कि हमने क्या हासिल किया। सैन्य अभियानों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी संप्रभुता आवश्यक है और यह देश के भीतर ही प्रणालियों को डिजाइन और विकसित करके ही हासिल किया जा सकता है। चुनौती टेक्नोलॉजी नहीं है, बल्कि विरासत प्रक्रियाओं का उपयोग कर कैसे हम इस बदलाव को लागू कर रहे हैं। हम परंपरागत पद्धतियों का उपयोग कर अंतरिक्ष क्षमता विकसित करना जारी नहीं रह सकते। समय अब विलासिता का नहीं रह गया।”

भारती एयरटेल के मुख्य नियामकीय अधिकारी एवं इस्पा के वाइस चेयरमैन राहुल वत्स ने कहा, “दि इंडियन डेफस्पेस सिंपोजियम रक्षा जरूरतों, उद्योग की क्षमताओं और इन दोनों के बीच कनवर्जेंस को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण फोरम बन गया है। यह वह क्षेत्र है जहां उपग्रह संचार महत्वपूर्ण बन गया है। भारत अब सैटेलाइट संचार सेवाएं शुरू करने की दहलीज पर है। विश्वसनीयता, सुरक्षा और सप्लाई चेन को लेकर भी महत्वपूर्ण विचार हैं। एक भारतीय के तौर पर मैं मानता हूं कि हमें खुद की सैटेलाइट संचार प्रणालियां विकसित करना चाहिए। सैटेलाइट संचार इसे सुगम बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है जिससे ना केवल रक्षा क्षमताएं बढ़ाने में योगदान मिलेगा, बल्कि आर्थिक वृद्धि बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। आगे की राह महत्वपूर्ण है और हम एक नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं जहां बातचीत और नियोजन का क्रियान्वयन में तब्दील होना आवश्यक है।”

इंडियन स्पेस एसोसिएशन के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल एके भट्ट ने कहा, “डिफेंस स्पेस सिंपोजियम, भारत के रक्षा अंतरिक्ष से जुड़ी बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में उभरा है जहां परिचालन समुदाय, नीति निर्माता और उद्योग एक साथ आ रहे हैं। यह सामंजस्य हासिल करने के लिए सशस्त्र बलों और एक सक्षम एवं उत्तरदायी औद्योगिक आधार के बीच गहन एकीकरण आवश्यक है। भारत का निजी क्षेत्र आज राष्ट्रीय क्षमता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हालांकि, हमें महत्वपूर्ण आयातों पर निर्भरता घटानी होगी और परिचालन की जरूरतों के मुताबिक देशज क्षमताओं का निर्माण करना होगा।”

अगले दो दिनों में आईडीएस 2026 कई उच्च स्तरीय सत्रों, परिचर्चाओं और उद्योग के साथ संवाद का आयोजन करेगा जिसमें इंडस्ट्री शोकेस, अन्य बातचीत और सशस्त्र बलों एवं निजी क्षेत्र के बीच बातचीत के लिए समर्पित फोरम शामिल हैं। इस संगोष्ठी में वैश्विक भागीदार भी शिरकत करेंगे जिससे उभरते रुख और गठबंधन के अवसरों पर संवाद होगा और इस प्रकार से यह संगोष्ठी परिचालन जरूरतों के अनुरूप उद्योग की क्षमताओं को दुरुस्त करने के लिए एक प्रमुख मंच के तौर पर काम करेगा।

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