स्वयं को होशियार समझता ऐसा भ्राता नहीं हूं मैं,
गले मिलकर ही गला काटें ऐसी-मात्रा नहीं हूं मैं।
गैरों का भी जो दर्द समझते ऐसा एक इंसान हूं मैं,
क्या होता है यें प्रेम भली-भांति से समझता हूं मैं ।।
दिल में अपनें दुःख समेटे उम्र भर जीता रहा हूं मैं,
सब देखकर भी अनजानों की तरह रह रहा हूं मैं।
मेरी औकात शून्य है महल के ख़्वाब न देखता मैं,
अपनों को धोखा देना बहुत ग़लत समझता हूं मैं।।
मेहनत करके धन जोड़ता सब्र से काम लेता हूं मैं,
वो भी कोई छीनले हमसे महसूस न होने देता मैं।
अतिथियों के सम्मान में कभी पीछे न रहता हूं मैं,
बड़ों के साथ नज़रें मिलाकर बात न करता हूं मैं।।
कागज़ क़लम की ताक़त सभी को दिखाता हूं मैं,
थोड़ा-थोड़ा लिखकर के अपने ग़म भुलाता हूं मैं।
स्वार्थी व झूठें रिश्तों की बात बताना चाहता हूं मैं,
रिश्ता हो या दोस्ती बस नियत साफ़ रखता हूं मैं।।
किस्मत ने जैसा चाहा था वैसा ही ढल गया हूं मैं,
बिकते देखा है भू मकान भाई बिकते देखा हूं मैं।
बहुत कुछ है बाकी भाई क्या-क्या अब सुनाऊं मैं,
बहुत संभलकर चला फिर भी फिसल गया हूं मैं।।
सैनिक कवि
गणपत लाल उदय अजमेर राजस्थान