कश्मीर विश्वविद्यालय में गूंजा राजस्थान का साहित्यिक स्वर, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समन्वय का बना सशक्त मंच अजमे

कश्मीर विश्वविद्यालय के गांधी भवन में 9 जून 2026 को प्रातः 10 बजे हिंदी विभाग, कश्मीर विश्वविद्यालय द्वारा “कवि गोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम” का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम अजमेर लेखिका मंच एवं समाज सेवा संस्थान के सहयोग तथा विश्वविद्यालय के स्टूडेंट्स वेलफेयर विभाग के समर्थन से संपन्न हुआ। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि कश्मीर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नीलोफर खान थीं। एवं रजिस्ट्रार श्रीमान नासिर इकबाल सर रहे
इस अवसर पर राजस्थान और कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक परंपराओं तथा राष्ट्रीय एकता का अनुपम संगम देखने को मिला।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित अजमेर लेखिका मंच एवं समाज सेवा संस्थान की संस्थापिका डॉ. मधु खंडेलवाल ने अपने उद्बोधन में कुलपति प्रो. नीलोफर खान, हिंदी विभाग के मुदस्सिर अहमद भट्ट, विभागाध्यक्ष प्रो. रूबी खान, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार आदरणीय नसीर इकबाल तथा समस्त विश्वविद्यालय परिवार का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने साहित्य को दिलों को जोड़ने वाला सबसे सशक्त माध्यम बताते हुए प्रेम, संवेदना और मानवीय रिश्तों पर आधारित अपनी चर्चित ग़ज़ल प्रस्तुत की

“महज़ क़ुर्बत के लम्हों में मोहब्बत का मुकम्मल है,
किसी के दिल की धड़कन को समझना भी ज़रूरी है।”

साथ ही उनका यह शेर भी खूब सराहा गया
“अपने लहजे में मोहब्बत की शकल रखना,
लोग रिश्तों में ज़रा-सी मिठास ढूंढते हैं।”

इस अवसर पर अजमेर लेखिका मंच की ओर से विश्वविद्यालय के गणमान्य अतिथियों का सम्मान भी किया गया।
कार्यक्रम में मंच की सदस्य डॉ. नंदिता चौहान ने पारंपरिक कविता-पाठ के स्थान पर एक अनूठा सांस्कृतिक संवाद प्रस्तुत किया। उन्होंने राजस्थानी अभिवादन “राम-राम सा” और “खम्मा घणी” से शुरुआत करते हुए मायड़ भाषा में प्रेम की व्याख्या की
“धरती बदल जावै, बोली बदल जावै, रीत बदल जावै, पण मनख री पीर अर प्रेम रो रंग कदी नी बदलै।”
उन्होंने राजस्थान की लोकगाथाओं मूमल-महेंद्र, ढोला-मारू तथा कश्मीर की प्रेम-परंपराओं हब्बा खातून और हिमाल-नागराय का उल्लेख करते हुए दोनों प्रदेशों की सांस्कृतिक आत्मा को एक सूत्र में पिरोया। उनकी पंक्ति
“बात करस्यां उन कथां री, जिणै समय नी हरायो, जिणै लोक याद राख्यो, अर जिणै प्रेम ने अमर कर दियो”
को श्रोताओं ने विशेष सराहना दी।

अनिता यादव ने अपने काव्य-पाठ की शुरुआत इस शेर से की
“माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूं मैं,
फिर भी तू मेरा शौक देख, मेरा इंतज़ार देख।”
इसके बाद उन्होंने अपनी मार्मिक कविता “शहीदों के नाम” प्रस्तुत कर गुमनाम शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उनकी पंक्तियाँ
“जो शहीद हुए वतन पे अनाम मिट गए,
वो धुंधले से चेहरे फिर जगमगाए हैं”
ने उपस्थित श्रोताओं को भावुक कर दिया। समापन में उन्होंने कहा
“उजले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

अजमेर की वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवयित्री श्रीमती पुष्पा क्षेत्रपाल ने अपनी कविता “रेत और वादियों का संगम” का प्रभावशाली पाठ किया। उन्होंने राजस्थान के मरुधर और कश्मीर की वादियों के सांस्कृतिक सौंदर्य को राष्ट्रीय एकता के भाव से जोड़ते हुए कहा
“एक तरफ है केसर महके,
एक तरफ है मरुधर प्यारा,
दोनों मिलकर गाते जैसे,
भारत माँ का स्वर न्यारा।”
उनकी कविता ने विविधता में एकता, प्रेम और सांस्कृतिक समन्वय का सशक्त संदेश दिया।

युवा कवयित्री दीपशिखा क्षेत्रपाल ने “रेत से वादियों तक चली एक लड़की” शीर्षक कविता का प्रभावशाली पाठ किया। उन्होंने मरुभूमि से कश्मीर की हसीन वादियों तक की अनुभूतियों को संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करते हुए कहा
“अगर हिंदुस्तान एक नज़्म है, तो कश्मीर उसका सबसे हसीन शेर है।”
इस पंक्ति ने श्रोताओं का विशेष ध्यान आकर्षित किया।

भावना शर्मा ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत राजस्थानी दोहे से की
“केसर उपजे सुथरी,
उजली घणी तासीर।
फूलां री क्यारी जिवा,
मोहे यो कश्मीर।”
इसके साथ ही उन्होंने यह शेर सुनाकर श्रोताओं का मन मोह लिया
“आंखों की ज़ुबान नहीं है,
ज़ुबां की आंखें नहीं।
कैसे करूं तेरी तारीफ,
इतनी खूबसूरत तो मिसालें नहीं।”
उन्होंने अपनी चर्चित कविता “स्त्री” का भी भावपूर्ण पाठ किया।।

कार्यक्रम में डॉ. इंदुबाला ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का संदेश देते हुए श्रोताओं को प्रभावित किया। उनकी प्रस्तुति को भी भरपूर सराहना मिली।

संपूर्ण कार्यक्रम के दौरान राजस्थान की लोक-संस्कृति, साहित्य और कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। कार्यक्रम ने साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक संवाद और भावनात्मक एकजुटता को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण संदेश दिया।
कवि गोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में डॉ. मधु खंडेलवाल, डॉ. नंदिता चौहान, अनिता यादव, श्रीमती पुष्पा क्षेत्रपाल, दीपशिखा क्षेत्रपाल, भावना शर्मा तथा डॉ. इंदुबाला सहित सभी साहित्यकारों की प्रस्तुतियों ने राजस्थान और कश्मीर के बीच साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सेतु को और अधिक मजबूत बनाया।

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