नंगे पैर रहने से अनेकानेक लाभ

नंगे पैर रहने या चलने के कई शारीरिक, मानसिक और पारंपरिक लाभ माने गए हैं। कुछ विज्ञान से जुड़े हैं, कुछ अनुभव और संस्कृति से। नंगे पैर रहने से पैरों की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। जूते पैरों को सहारा देते हैं, जबकि नंगे पैर चलने से प्राकृतिक संतुलन बनता है और मांसपेशियाँ सक्रिय रहती हैं। इसके अतिरिक्त रक्त संचार बेहतर होता है। तलवों में अनेक नर्व पॉइंट्स होते हैं। जमीन से सीधा संपर्क रक्त प्रवाह को उत्तेजित करता है। साथ ही पैरों की बनावट सुधरती है। लंबे समय तक जूते पहनने से अंगुलियाँ दबती हैं। नंगे पैर रहने से पैर अपनी प्राकृतिक आकृति में रहते हैं। नंगे पैर रहने से घुटनों और कमर पर दबाव कम पडता है। सही मुद्रा बनती है, जिससे जोड़ों पर अनावश्यक तनाव घटता है। एक महत्वपूर्ण बात। मानसिक व तंत्रिका लाभ होता है। तनाव कम होता है। घास, मिट्टी या रेत पर नंगे पैर चलना (जिसे ग्राउंडिंग या अर्थिंग कहा जाता है) मन को शांत करता है। एक लाभ यह भी है कि इससे एकाग्रता बढ़ती है। शरीर और मस्तिष्क का तालमेल बेहतर होता है, जिससे ध्यान और सजगता बढ़ती है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि नंगे पैर रहने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा पृथ्वी में चली जाती है। मंदिरों में नंगे पैर जाना विनम्रता और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक माना गया है। ध्यान रखने योग्य बातें यह हैं। बहुत गरम, ठंडी या गंदी सतह पर नंगे पैर न चलें।
कुछ शोधों में पाया गया है कि जब शरीर के तलवे पृथ्वी की सतह से सीधे संपर्क में आते हैं, तो इससे कुछ एंटीऑक्सिडेंट- जैसे इलेक्ट्रॉनों का प्रभाव शरीर में बढ़ सकता है, जिससे सूजन से जुड़े बायोमार्कर कम होते हैं, जो शरीर में जलन और दर्द को घटा सकते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि ग्राउंडिंग के एक सत्र (लगभग 1 घंटे) के बाद रक्त की मोटाई कम हो सकती है। इसका मतलब बेहतर रक्त प्रवाह और संभावित रूप से दिल पर सकारात्मक असर पडता है। कुछ शोध बताते हैं कि पृथ्वी के संपर्क से कॉटिसोल (तनाव-हार्मोन) का स्तर संतुलित हो सकता है और स्लीप-वेक चक्र में सुधार हो सकता है, जिससे नींद बेहतर होती है।

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