गिरिराज परिक्रमा, महारास और रुक्मिणी विवाह उत्सव ने भक्ति रस से सराबोर किया कथा पंडाल

डॉ. संजय कृष्ण सलिल जी महाराज बोले— रासलीला काम नहीं, काम पर विजय की दिव्य लीला है

अजमेर। ज्ञान विहार स्थित श्री कल्याण जी मंदिर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिवस रविवार को कथा पंडाल पूर्णतः भक्तिमय वातावरण में डूब गया। कथा के दौरान गिरिराज परिक्रमा का प्रतीकात्मक चित्रण, दिव्य महारास तथा भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह उत्सव का अत्यंत भावपूर्ण मंचन हुआ। “आजा कृष्ण कन्हाई” और “चलो गिरिराज परिक्रमा करें”, “कारे ने कर दिया लाल” तथा “जोड़ी का जवाब नहीं” जैसे भक्तिमय भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे तथा संपूर्ण वातावरण कृष्णमय हो गया।

अंतरराष्ट्रीय भागवत कथा वाचक डॉ. संजय कृष्ण सलिल जी महाराज ने छप्पन भोग का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण जब सात दिनों तक गिरिराज गोवर्धन धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा कर रहे थे, तब उनके लिए सात दिनों के 56 समय के भोजन की व्यवस्था की गई थी। इसी कारण भगवान को छप्पन भोग अर्पित करने की परंपरा प्रारंभ हुई। उन्होंने कहा कि रासलीला कामलीला नहीं, बल्कि काम पर विजय प्राप्त करने की परम दिव्य लीला है। भगवान श्रीकृष्ण ने रास के माध्यम से कामदेव के अहंकार का नाश किया, जिसके फलस्वरूप कामदेव ने भगवान के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लिया।

अपने प्रेरक प्रवचनों में महाराज श्री ने उत्तम मनुष्य के लक्षण बताते हुए कहा कि उदारता, मधुर वाणी, ठाकुरजी के ध्यान में निरंतर लीन रहना तथा पूर्वजों के प्रति धार्मिक कर्तव्यों का पालन करना ही श्रेष्ठ जीवन की पहचान है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सुख और दुःख उसके अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं, किसी का भाग्य कोई दूसरा नहीं बदल सकता। जब जीवन में प्रतिकूल समय आए तो अधैर्य या भूल करने के बजाय धैर्यपूर्वक समय के अनुकूल होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

महाराज श्री ने एकादशी व्रत के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान श्रीहरि को एकादशी अत्यंत प्रिय है, इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु को श्रद्धापूर्वक एकादशी का पालन करना चाहिए। उन्होंने त्रि-एकादशी की महिमा का भी वर्णन किया तथा कहा कि संध्या आरती के पश्चात किसी भी तीर्थ में स्नान नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन का सबसे श्रेष्ठ संबंध भगवान से अथवा उनके किसी सच्चे भक्त से जोड़ना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का वर्णन करते हुए उन्होंने संदेश दिया कि भगवान जो भी करते हैं, वह भक्तों के कल्याण के लिए ही करते हैं।

कथा प्रवक्ता उमेश गर्ग ने बताया कि छठे दिवस की कथा में नंद बाबा एवं बालक श्रीकृष्ण के मध्य इंद्र पूजन संबंधी संवाद, इंद्र पूजा का त्याग कर गिरिराज गोवर्धन महाराज की पूजा, ब्रजवासियों द्वारा गोवर्धन पूजन, इंद्र का प्रकोप, भगवान द्वारा गिरिराज धारण कर समस्त ब्रजवासियों की रक्षा, दिव्य महारास, भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाएं, कंस वध, हस्तिनापुर गमन, द्वारका नगरी की स्थापना, बलराम जी का विवाह तथा रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को लिखे गए सात श्लोकों के प्रेमपत्र, रुक्मिणी हरण एवं रुक्मिणी विवाह का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया गया।

उन्होंने बताया कि सोमवार को कथा के अंतिम दिवस सुदामा चरित्र, गुरु मंत्र दीक्षा एवं श्रीमद्भागवत कथा का भव्य समापन होगा।

उमेश गर्ग
मो.: 98297 93705

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