पुलिस अनुसंधान अधिकारी पर पसंदीदा वकील नियुक्त करने का दबाव बनाने का गंभीर आरोप

अखिल भारतीय संयुक्त अधिवक्ता मंच के प्रदेश सचिव मनोज आहूजा एडवोकेट ने DGP राजस्थान को लिखा पत्र

“पुलिस का काम निष्पक्ष अनुसंधान करना है,अधिवक्ता तय करना नहीं”_मनोज आहूजा

केकड़ी (1 अगस्त )सड़क दुर्घटना में मृतक के परिजनों पर मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण में एक विशेष अधिवक्ता को नियुक्त करने के लिए पुलिस अनुसंधान अधिकारी द्वारा कथित रूप से दबाव बनाने और बात नहीं मानने पर क्लेम प्रभावित करने की धमकी देने का गंभीर मामला सामने आया है।

इस संबंध में अखिल भारतीय संयुक्त अधिवक्ता मंच के प्रदेश सचिव मनोज आहूजा एडवोकेट ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर पूरे प्रकरण की वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच करवाने, वर्तमान अनुसंधान अधिकारी को तत्काल बदलने तथा आरोप सही पाए जाने पर कठोर विभागीय एवं विधिक कार्रवाई करने की मांग की है।

आहूजा ने बताया कि अजमेर जिले के भगवानपुरा,टांटोटी निवासी पूसाराम पुत्र सुखदेव गुर्जर के मामा के लड़के रामलाल पुत्र भोलूराम की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।इस संबंध में 27 जुलाई 2026 को एमबीजीएच हॉस्पिटल, उदयपुर की मोर्चरी में पुलिस थाना खेरोदा के सहायक उप निरीक्षक के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी।

आहूजा के अनुसार पीड़ित पक्ष द्वारा उन्हें दी गई जानकारी में आरोप लगाया गया है कि रिपोर्ट लेने के बाद संबंधित पुलिस अधिकारी ने बेहतर मोटर दुर्घटना क्लेम दिलाने की बात कहते हुए एक विशेष अधिवक्ता से फोन पर बातचीत करवाई।उक्त अधिवक्ता द्वारा कथित रूप से थाना एवं न्यायालय में अपनी अच्छी “सेटिंग” होने की बात कहते हुए अच्छा क्लेम दिलाने का दावा किया गया।

मामले में पुलिस थाना खेरोदा द्वारा एफआईआर संख्या 130/2026 अंतर्गत धारा 281 एवं 106(1) भारतीय न्याय संहिता दर्ज कर अनुसंधान सहायक उप निरीक्षक अशोक कुमार को सौंपा गया।

क्लेम प्रभावित करने की धमकी देने का आरोप

आहूजा ने DGP को लिखे पत्र में कहा कि पीड़ित पक्ष के अनुसार अंतिम संस्कार के बाद अनुसंधान अधिकारी तथा संबंधित अधिवक्ता द्वारा लगातार फोन कर उसी अधिवक्ता को नियुक्त करने का कथित दबाव बनाया गया।

आरोप है कि ऐसा नहीं करने पर क्लेम प्रभावित करने,प्रतिकूल रिपोर्ट प्रस्तुत करने तथा चश्मदीद गवाहों के संबंध में अनुसंधान को प्रभावित करने जैसी बातें कही गईं।जब पीड़ित पक्ष ने अपनी पसंद के अधिवक्ता के माध्यम से केकड़ी में दावा प्रस्तुत करने की बात कही तो कथित रूप से यह तक कहा गया कि जांच उनके हाथ में है और उनकी बात नहीं मानने पर “एक रुपया भी नहीं मिलेगा।”

“चश्मदीद गवाह मैनेज” करने जैसी कथित बातचीत बेहद गंभीर : आहूजा

आहूजा ने बताया कि 29 जुलाई को पीड़ित पक्ष के लोग थाना खेरोदा पहुंचे और अनुसंधान अधिकारी के साथ घटनास्थल पर गए।पीड़ित पक्ष का आरोप है कि नक्शा मौका तैयार करते समय भी दो प्रत्यक्षदर्शी गवाह लाने और संबंधित विशेष अधिवक्ता को नियुक्त करने का दबाव बनाया गया।

आहूजा के अनुसार जब उन्होंने स्वयं अनुसंधान अधिकारी से दूरभाष पर बातचीत कर पूछा कि किसी विशेष अधिवक्ता को नियुक्त करने के लिए पीड़ित पक्ष पर दबाव क्यों बनाया जा रहा है,तब अनुसंधान अधिकारी द्वारा कथित रूप से संबंधित अधिवक्ता के स्थानीय होने, “चश्मदीद गवाह मैनेज” करवाने तथा मजिस्ट्रेट से “सेटिंग” होने जैसी बातें कही गईं।

आहूजा ने कहा कि इन आरोपों की सत्यता की निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।यदि कोई पुलिस अधिकारी अनुसंधान की शक्ति का इस्तेमाल किसी विशेष अधिवक्ता को लाभ पहुंचाने अथवा पक्षकार की स्वतंत्र पसंद को प्रभावित करने के लिए करता है तो यह पुलिस व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

“वकील चुनना पक्षकार का अधिकार,पुलिस अधिकारी का नहीं”

प्रदेश सचिव मनोज आहूजा ने कहा—

“पुलिस अधिकारी का दायित्व निष्पक्ष,स्वतंत्र और कानूनसम्मत अनुसंधान करना है।किसी नागरिक को यह बताना कि वह किस अधिवक्ता को नियुक्त करे और अधिवक्ता नियुक्त नहीं करने पर जांच अथवा क्लेम प्रभावित करने का भय दिखाना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। पक्षकार किस अधिवक्ता से अपनी पैरवी करवाएगा, यह उसका स्वतंत्र निर्णय है।”

उन्होंने कहा कि पुलिस एवं न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इस प्रकार की शिकायतों को अत्यंत गंभीरता से लिया जाना चाहिए।यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध ऐसी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए जिससे भविष्य में किसी पीड़ित परिवार पर इस प्रकार का दबाव बनाने का साहस कोई न कर सके।

DGP से पांच प्रमुख मांगें

आहूजा ने पुलिस महानिदेशक से पूरे प्रकरण की वरिष्ठ अधिकारी से निष्पक्ष जांच करवाने,अनुसंधान अधिकारी एवं संबंधित अधिवक्ता के बीच कथित मिलीभगत की जांच करने,पीड़ित पक्ष को किए गए फोन कॉल एवं धमकियों के आरोपों की जांच कराने, एफआईआर संख्या 130/2026 का अनुसंधान किसी अन्य निष्पक्ष अधिकारी को सौंपने तथा पीड़ित परिवार एवं गवाहों को किसी प्रकार की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई से संरक्षण प्रदान करने की मांग की है।

साथ ही उन्होंने मांग की है कि राजस्थान पुलिस में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं कि कोई भी पुलिस अधिकारी किसी परिवादी,पीड़ित अथवा उसके परिवार पर किसी विशेष अधिवक्ता को नियुक्त करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव नहीं बनाए।

पत्र की प्रतिलिपि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन व महानिरीक्षक पुलिस,उदयपुर रेंज तथा पुलिस अधीक्षक,उदयपुर को भी आवश्यक कार्रवाई के लिए प्रेषित की गई है।

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