हिंदी फिल्म जगत के ‘कांछा भाई’ और नेपाली संगीत जगत के लीविंग लेजेंड नेपाली संगीतकार रंजीत गजमेर जी के 86वें जन्मदिन के अवसर पर समस्त गोरखा- नेपाली समुदाय के गीत-संगीतप्रेमी जनों द्वारा हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं देते हैंआज 3 अक्टूबर का दिन है।
आज का दिन हम गोरखाओं के लिए खास दिन है। क्योंकि सन्1941 को आज ही के दिन हमारे लिविंग लेजेंड नेपाली और हिंदी के प्रख्यात संगीतकार रंजीत गजमेर जी का जन्म दार्जलिंग में हुआ था।
आपने प्रारंभिक संगीत की विधिवत शिक्षा दार्जिलिंग के ‘दी आर्ट एकेडमी आफ म्यूजिक’ में प्रख्यात नेपाली संगीतज्ञ अंबर गुरुंग से हासिल की । अंबर गुरुंग की देखरेख में संगीत सीखने के क्रम में गोपाल योन्जन. कर्म योन्जन, शरण प्रधान और अरुणा लामा जैसे प्रसिद्ध संगीत मर्मज्ञ कलाकारों से उनका परिचय हुआ ये सभी उनके सहपाठी थे। इनमें से हर एक प्रतिभासंपन्न छात्र थे,आगे चलकर इन सभी कलाकारों ने नेपाली संगीत के क्षेत्र में बेहतरीन काम किया,और नेपाली गीत-संगीत के खजाने को खूब मालामाल किया। साथ ही सभी ने काफी प्रसिद्धी भी पाई। आप सभी कलाकार नेपाली गीत-संगीत जगत की धरोहर हैं।
संगीत की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात गजमेर जी संगीत के क्षेत्र में कुछ करने के लिए नेपाल पहुंचे। जहां उन्होंने नेपाल रेडियो में अपनी सेवाएं दी। नेपाल में ही वहां उनकी भेंट बंबई के प्रसिद्ध सेक्सोफोन वादक और म्यूजिक अरेंजर मनोहरी सिंह से मुलाकात हुई । उन्होंने ही रंजीत जी को मुंबई जाने के सलाह दी साथ ही हौसला भी दिया। इस तरह वो पहले दार्जिलिंग से नेपाल, फिर नेपाल से अपने मादल को साथ लेकर माया नगरी मुंबई (तब बंबई) पहुंचे। वहां एक लंबे इंतजार के बाद संगीतकार आर.डी.बर्मन से मुलाकात का अवसर मिला। मुंबई में कितनी कोशिशों और इंतजार के बाद आर.डी. बर्मन से गजमेर जी की मुलाकात का जिक्र मुझे दार्जिलिंग के प्रसिद्ध नेपाली गायक स्वर्गीय कुमार सुब्बा जी से सलुवा के ट्रेनिंग बैरेक के उस्ताद के रूम में सुनने का मौका मिला था। कुमार सुब्बा जी नेपाली नाटक ‘अनि देउराली रुन्छ- की टीम के साथ आए हुए थे। उन्होंने बताया कि रोज- रोज स्टूडियो जाकर बर्मन दा से मिलने की कोशिश करते रहना और बिना मिले मायूस लौटना पडता था रंजीत जी को। ऐसे कई दिन, कई हफ्ते बीते तब जाकर एक दिन मिलना हुआ …. फिर बाद में क्या हुआ किसी से छुपा हुआ नहीं है। आ.डी बर्मन से मिलने पर मिलने पर उन्होंने कुछ सुनाने को कहा तो उन्होंने लोकप्रिय नेपाली लोकभुन पर आभारित रचना “कांछी रे कांछी…” सुना दिया। आर.डी.बर्मन धुन से बहुत प्रभावित हुए। जिसे उन्होंने फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में इस्तेमाल किया। धीरे-धीरे फिल्मी गीत-संगीत की बिरादरी में लोग उन्हें जानने-पहचानने लगे। उन्हें प्यार से सभी ‘कांछा भाई’ बुलाने लगे। इस तरह मुंबई फिल्म जगत में वे कांछा भाई के नाम से पुकारे जाने लगे। आगे चलकर इसी नाम से मशहूर भी हो गए। तब से लेकर आज तक हर कोई उन्हें कांछा के नाम से ही जानते- पहचानते हैं।
फिर आया वह दिन जब उनको एक बड़ा मौका मिला। जिसने उनके नाम और काम को बड़ी पहचान दिलाई। निर्देशक शक्ति सामंत द्वारा निर्देशित फिल्म ‘अजनबी’ का किस्सा हे। फिल्म का संगीत राहुल देव बर्मन दे रहे थे। एक गीत की तैयारी चल रही थी। गीत के बोल थे… ” हम दोनों दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले…” गीत की अंतिम रिहर्सल संपन्न हुई जिसमें रंजीत जी ने मादल बजाया। रिहर्सल के बाद पंचम बोले , ” कांछा, इसी तरह तुम्हें फाइनल रिकार्डिंग में भी बजाना है जैसा तुमने अभी बजाया” उन्हें बताया गया कि इस गीत में मुख्यत: गायक कलाकार लता मंगेशकर और किशोर कुमार के अलावा गीत में दो ही वाद्य होंगे मादल और गिटार उस पर भी मादल पर ही गीत का अधिकतर भार होगा। खैर, निर्धारित दिन मादल और गिटार के साथ गीत को रिकार्ड कर लिया गया। रिकार्डिंग के खत्म होने के बाद लता मंगेशकर जी ने रंजीत जी के कंधे को थपथपाते हुए कहा था, “कांछा तुमने बहुत बढ़िया बजाया” कहकर उनकी प्रशंसा की थी। रंजीत गजमेर जी नेपाली टीवी के एक कार्यक्रम ‘गोरेटो’ में काफी साल पहले इस वाकये की चर्चा करते हुए कहते हैं कि,” यह बात सन् 1973-74 की है पर लगता है ये अभी कल- परसों की ही बात हो।” गाने की रिकार्डिंग हुई गीत काफी पसंद की गई। मादल की ध्वनि ने गीत में अतिरिक्त मधुरता बढ़ाने में भरपूर मदद की है।
यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैने यह लेख सिर्फ उन्हें स्मरण करने, उनको जन्म दिन की बधाई और शुभकामनाएं देने के लिए लिखा है। बाकी रंजीत गजमेर जी ने हिंदी फिल्म में अच्छा खासा योगदान देने के अलावा 40-42 नेपाली फिल्मों में संगीत देकर अपने गीत संगीत से समस्त गोरखा जनमानस के हॄदय में अपनी जो अमिट छाप छोड़ी है उससे अनभिज्ञ होने वाले कम ही हैं। उनके द्वारा बनाए गए गीत चाहे वो फिल्म ‘बासुरी ‘के हों, ‘सिंदुर’ के हों या फिल्म लाहुरे, दक्षिणा,साइनो, कुसुमे रुमाल , देउता हो या सम्झना। सभी फिल्मों के गीत अत्यंत मधुर और कर्णप्रिय थे जिसे हर वर्ग के लोगों ने काफी पसंद किया, सराहा और प्यार दिया। इन फिल्मों में उन्होंने अनगिनत ऐसी रचनाएं दी हैं जो आज तक मंच और महफिल की शान हैं चाहे वह गीत– लहना ले जुटायो कि…., कुसुमे रुमाल का शीर्षक गीत जिसे उदित नारायण और दीपा झा ने स्वर दिया है या मोहनी लागला हई… या मिरमिरे सांझ मा…., माया त माया हो….., झझल्को लिए आए छ आंखामा…. हो या डैनी का गाया गीत – सुन कथा एउटा गीत…. इन सारे गीतों ने अपार लोकप्रियता पाई थी। ये सारे ही गीत कालजयी बन गए हैं
नेपाली फिल्म जगत के दिग्गज एवं स्वनामधन्य संगीतकार लिवींग लिजेंड रंजीत गजमेर को उनके जन्मदिन की बधाई और शुभकामना देने का मौका हमें प्राप्त होना एक सौभाग्य की बात है। आपके द्वारा रचित हर एक गीत किसी मंच और समारोह मे न बजे और न गाए जाएं ऐसा हो ही नहीं सकता।
अपनी पीढ़ी और आने वाली अनेक पीढ़ियों तक को गीत-संगीत की अमूल्य सौगात देने वाले हमारे रंजीत गजमेर उर्फ़ कांछा दाई को उनके 86वें जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देते हुए मैं, श्याम कुमार राई ‘ सलुवावाला’ उनके लंबे तथा स्वस्थ जीवन की हार्दिक कामना करता हूं….
— श्याम कुमार राई
‘ सलुवावाला’