नगर निकाय चुनावों की दस्तक के साथ वार्डों में दावेदारों की भीड़ उमड़ पड़ी है। गलियों में जनसंपर्क, चौपालों में बैठकों और सोशल मीडिया पर सक्रियता का शोर बढ़ गया है। लेकिन असली लड़ाई जनता के बीच नहीं, *राजनीतिक दलों के टिकट वितरण कक्ष* में लड़ी जा रही है।आज अधिकांश दलों का पहला और आखिरी सवाल यह नहीं रह गया कि *_उम्मीदवार कितना शिक्षित है, कितना ईमानदार है, समाज के लिए कितना काम किया है या उसका चरित्र कैसा है।_* सवाल सिर्फ एक है
*जीतेगा या नहीं* 

*जिताऊ* शब्द ने राजनीति के सारे आदर्श निगल लिए हैं। शिक्षा, सामाजिक सेवा, संगठन के प्रति वर्षों की निष्ठा, साफ छवि और जनहित के मुद्दे अब टिकट की गारंटी नहीं रहे। टिकट उस व्यक्ति को मिलता दिखता है *_जिसके पास धनबल, प्रभाव, जातीय गणित, समर्थकों की भीड़ और चुनावी प्रबंधन की ताकत हो।_*
विडंबना यह है कि लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई—नगर निकाय—जहां सबसे अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और जनता से जुड़े प्रतिनिधि चाहिए, वहीं सबसे अधिक *मैनेजेबल* और *प्रभावशाली* उम्मीदवारों की तलाश होती दिखाई देती है। कई वार्डों में यह धारणा मजबूत हो रही है कि शरीफ आदमी चुनाव लड़ सकता है, लेकिन जीतने के लिए *दबंग* होना ज्यादा उपयोगी है।
राजनीतिक दल अक्सर इसे चुनावी मजबूरी बताते हैं। उनका तर्क होता है कि चुनाव आदर्शों से नहीं, समीकरणों से जीते जाते हैं। लेकिन _यही सोच लोकतंत्र को धीरे-धीरे जनसेवा से हटाकर शक्ति प्रदर्शन की प्रतियोगिता में बदल देती है।_
सबसे बड़ा नुकसान _उन युवाओं, शिक्षकों, समाजसेवियों, डॉक्टरों, वकीलों और ईमानदार कार्यकर्ताओं का होता है जो वर्षों तक जनता के बीच काम करते हैं, लेकिन *टिकट की दौड़* में उस व्यक्ति से *हार* जाते हैं जिसकी सबसे बड़ी योग्यता केवल *जिताऊ* होना है।_
लोकतंत्र तब कमजोर नहीं होता जब बाहुबली चुनाव लड़ते हैं; लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब राजनीतिक दल उन्हें सबसे सुरक्षित विकल्प मानने लगते हैं।
यदि टिकट का पैमाना केवल जीत रह गया, तो कल नगर परिषदों और निगमों में *नीति नहीं, प्रभाव चलेगा; विकास नहीं, वर्चस्व दिखाई देगा।*
लोकतंत्र का सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं होता जब गलत लोग चुनाव जीतते हैं, बल्कि वह होता है जब अच्छे लोग *_यह मानकर चुनाव लड़ना ही छोड़ देते हैं कि टिकट अब चरित्र से नहीं, ताकत से मिलता है।_*
@ _रुक्मा पुत्र ऋषि_