पर्युषण महापर्व के पांचवें दिन हुई वापसी ने दिया अहिंसा और करुणा का जीवंत संदेश
श्रमण डॉ पुष्पेन्द्र
जैन समाज के लिए अहिंसा केवल धर्मग्रंथों में वर्णित सिद्धांत नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और संरक्षण का जीवन-संकल्प है। कोल्हापुर के नांदणी स्थित जैन मठ से जुड़ी हथिनी ‘माधुरी’ (महादेवी) की 14 महीने बाद हुई घरवापसी ने इसी भावना को एक बार फिर जीवंत कर दिया। विशेष बात यह रही कि माधुरी की वापसी पर्युषण महापर्व के पांचवें दिन हुई, जिससे जैन समाज में इस क्षण का भावनात्मक और धार्मिक महत्व और बढ़ गया।
एक मूक प्राणी के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना, उसकी सुरक्षा और कल्याण को लेकर आवाज उठाना, न्यायालय का दरवाजा खटखटाना और अंततः उसे उसके परिचित परिवेश में वापस लाना—यह घटनाक्रम केवल एक हथिनी की वापसी की कहानी नहीं है। यह जीवदया, मानवीय संवेदना और अहिंसा के प्रति सामाजिक प्रतिबद्धता का उदाहरण बनकर सामने आया है।
14 महीने तक जारी रहा संघर्ष
माधुरी को जामनगर स्थित वनतारा ले जाया गया था। इसके बाद उसकी वापसी को लेकर जैन समाज और स्थानीय लोगों की ओर से लगातार प्रयास किए गए। मामला न्यायालय तक पहुंचा और करीब 14 महीने तक चली कानूनी एवं सामाजिक प्रक्रिया के बाद माधुरी को वापस कोल्हापुर लाया गया।
इस पूरे संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि माधुरी स्वयं अपनी बात कहने में सक्षम नहीं थी। वह न अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त कर सकती थी और न ही अपने पक्ष में न्यायालय के समक्ष खड़ी हो सकती थी। ऐसे में समाज ने उसकी ओर से आवाज उठाने की जिम्मेदारी निभाई।
यह संघर्ष किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि एक मूक जीव की सुरक्षा, सम्मान और बेहतर जीवन की चिंता को लेकर था।
पर्युषण के दौरान घरवापसी ने बढ़ाया भावनात्मक महत्व
जैन धर्म में पर्युषण आत्मशुद्धि, संयम, तप, क्षमा और जीवमात्र के प्रति करुणा का महापर्व माना जाता है। ऐसे समय में माधुरी की घरवापसी होना अपने आप में एक भावनात्मक संयोग बन गया।
जिस पर्व में मनुष्य अपने भीतर की हिंसा, क्रोध, अहंकार और वैरभाव को त्यागने का संकल्प लेता है, उसी दौरान एक मूक जीव का अपने परिचित परिवेश में लौटना अहिंसा के उस संदेश को व्यवहारिक रूप में सामने रखता है।
माधुरी की वापसी ने यह सवाल भी समाज के सामने रखा कि यदि हम जीवदया की बात करते हैं तो क्या उसे केवल धार्मिक आयोजनों और प्रवचनों तक सीमित रखा जा सकता है? या फिर किसी जीव के जीवन और सुरक्षा पर संकट आने पर उसके लिए खड़ा होना भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी है?
स्वागत में उमड़ा जनसमुदाय
माधुरी के कोल्हापुर पहुंचने पर बड़ी संख्या में लोग उसके स्वागत के लिए उमड़े। लंबे इंतजार के बाद हुई इस वापसी ने लोगों को भावुक कर दिया। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि मनुष्य और मूक प्राणियों के बीच संबंध केवल उपयोगिता का नहीं, बल्कि संवेदना, सह-अस्तित्व और करुणा का भी हो सकता है।
इस घटनाक्रम का एक उल्लेखनीय पहलू यह भी रहा कि माधुरी को जामनगर ले जाने वाली वनतारा की टीम ही न्यायिक प्रक्रिया के बाद उसे वापस कोल्हापुर लेकर आई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि पूरे घटनाक्रम के अंतिम चरण में माधुरी की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण को केंद्र में रखा गया।
अहिंसा विचार नहीं, व्यवहार भी है
जैन दर्शन में अहिंसा और जीवदया जीवन-मूल्यों की आधारशिला हैं। जैन परंपरा मनुष्य तक करुणा को सीमित नहीं रखती, बल्कि छोटे से छोटे जीव के प्रति भी संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना विकसित करती है।
माधुरी के लिए चला 14 महीने का संघर्ष इसी विचार को व्यवहार में बदलने की मिसाल है। इसने यह संदेश दिया कि जीवदया केवल मंदिरों, धार्मिक सभाओं और प्रवचनों में कही जाने वाली बात नहीं है। जब किसी मूक प्राणी के जीवन, सुरक्षा अथवा सम्मान का प्रश्न सामने आए, तब उसके लिए आवाज उठाना भी धर्म और मानवीय कर्तव्य का हिस्सा है।
माधुरी की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने समाज को एक मौन प्रश्न दिया है—जिन जीवों के पास अपनी पीड़ा बताने के लिए शब्द नहीं हैं, क्या उनकी आवाज बनना हमारी जिम्मेदारी नहीं है?
इस प्रश्न का उत्तर कोल्हापुर के लोगों और जैन समाज ने अपने संघर्ष से दिया।
घरवापसी के साथ छूटा बड़ा संदेश
माधुरी की घरवापसी केवल कोल्हापुर की एक घटना भर नहीं है। यह देश और समाज के लिए अहिंसा, करुणा तथा जीवों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश है। यह घटना बताती है कि किसी मूक प्राणी के लिए खड़ा होना कमजोरी नहीं, बल्कि समाज की नैतिक शक्ति और मनुष्य की संवेदनशीलता का प्रमाण है।
माधुरी लौट आई है, लेकिन अपने पीछे एक ऐसा संदेश छोड़ गई है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा—
जिस जीव की अपनी आवाज नहीं होती, उसकी आवाज बनना ही सच्ची जीवदया है।
और यही अहिंसा का वास्तविक अर्थ भी है—
जीव मात्र के प्रति करुणा, संरक्षण और सह-अस्तित्व का संकल्प।
माधुरी की घरवापसी को केवल एक जीव की वापसी के रूप में नहीं, बल्कि उस संवेदना की जीत के रूप में देखा जाना चाहिए, जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है।