(14 सितंबर 2026 राष्ट्रीय हिंदी दिवस पर विशेष आलेख)
हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आवाज, भावनाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक एकता की महत्वपूर्ण कड़ी है। देश के करोड़ों लोगों के बीच संवाद का माध्यम बनने वाली हिंदी ने भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी का विकास संस्कृत से हुआ और संस्कृत भारतीय ज्ञान परंपरा की एक समृद्ध आधारशिला रही है। लेकिन विडंबना यह है कि आज अपनी ही भाषाओं के बीच हिंदी और संस्कृत को वह सम्मान और स्थान नहीं मिल पा रहा, जिसके वे हकदार हैं। देश में शिक्षा से लेकर रोजगार और प्रशासन तक अंग्रेजी का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इंटरमीडिएट के बाद अधिकांश व्यावसायिक और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि देश की उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान का बड़ा हिस्सा अपनी भाषाओं में उपलब्ध नहीं होगा, तो भारतीय भाषाओं का व्यापक विकास कैसे संभव होगा? हिंदी को लेकर यह समझना जरूरी है कि यह केवल बातचीत या संचार का माध्यम नहीं है। हिंदी देश में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का भी बड़ा आधार बन चुकी है। हिंदी सिनेमा ने विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई है और बॉलीवुड की लोकप्रियता में हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका है। फिल्म उद्योग से जुड़े हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। इसके अलावा हिंदी समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, टेलीविजन, डिजिटल माध्यमों और सामाजिक मीडिया के जरिए भी लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। इंटरनेट के विस्तार के साथ हिंदी सामग्री की मांग लगातार बढ़ी है। यही वजह है कि कई वैश्विक कंपनियां और विदेशी वेबसाइटें भी भारतीय पाठकों तक पहुंच बनाने के लिए हिंदी में अपनी सेवाएं और सामग्री उपलब्ध करा रही हैं।
महात्मा गांधी हिंदी भाषी नहीं थे, लेकिन वे इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि हिंदी पूरे देश के लिए संपर्क भाषा की भूमिका निभा सकती है। उनके विचारों से प्रेरित होकर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा जैसे प्रयास हुए और देश के विभिन्न हिस्सों में हिंदी के प्रचार-प्रसार को गति मिली। उस दौर में हिंदी सीखना राष्ट्रीय एकता और आपसी संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता था। गांधीजी का मानना था कि किसी भी देश की वास्तविक उन्नति तभी संभव है, जब उसकी शिक्षा और ज्ञान की व्यवस्था आम जनता की अपनी भाषा में हो। वे भारतीय भाषाओं को आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखते थे। उनका यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है। सच्चाई यह है कि आजादी के दशकों बाद भी अंग्रेजी का प्रभाव भारतीय जीवन के लगभग हर क्षेत्र में दिखाई देता है। निजी पत्राचार से लेकर सरकारी और गैर-सरकारी कामकाज तक अंग्रेजी का व्यापक इस्तेमाल होता है। दुकानों के बोर्ड, होटल और रेस्तरां के मेनू, नियम-कायदे, तकनीकी निर्देश और विभिन्न प्रकार की जानकारी अक्सर अंग्रेजी में ही उपलब्ध होती है। समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब किसी वस्तु या उपकरण के इस्तेमाल के निर्देश भी केवल अंग्रेजी में दिए जाते हैं और उसका उपयोग ऐसा व्यक्ति कर रहा हो, जो अंग्रेजी नहीं जानता। अंग्रेजी का ज्ञान निश्चित रूप से आज के वैश्विक दौर में महत्वपूर्ण है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद, व्यापार, विज्ञान और तकनीक की प्रमुख भाषाओं में से एक है। भारत के युवाओं के लिए अंग्रेजी सीखना उपयोगी भी है और कई क्षेत्रों में आवश्यक भी। लेकिन अंग्रेजी सीखना और अपनी भाषा को कमतर समझना दो अलग-अलग बातें हैं।
दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों ने अपनी मातृभाषाओं को प्राथमिकता देते हुए विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, प्रशासन और व्यापार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। वहां विदेशी भाषाओं का ज्ञान हासिल किया जाता है, लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति को पीछे नहीं छोड़ा जाता। भारत में भी इसी संतुलन की जरूरत है। आज देश में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय तेजी से बढ़ रहे हैं। अंग्रेजी सीखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब अंग्रेजी को ज्ञान और योग्यता का एकमात्र पैमाना मान लिया जाता है। अपनी भाषा में पढ़ने वाला विद्यार्थी किसी भी दृष्टि से कम प्रतिभाशाली नहीं होता। जरूरत इस बात की है कि उसे भी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और ज्ञान अपनी भाषा में उपलब्ध कराया जाए। अक्सर यह बहस होती है कि क्या अंग्रेजी को पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए। इसका उत्तर स्पष्ट है कि अंग्रेजी को हटाने की नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाने की आवश्यकता है। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए, जिसमें विद्यार्थी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च स्तर का ज्ञान प्राप्त कर सकें और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी सहित अन्य विदेशी भाषाएं भी सीख सकें। भारत की भाषाई विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। हिंदी का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब हम तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, असमिया, उड़िया और अन्य भारतीय भाषाओं का भी समान सम्मान करें। हिंदी का विकास किसी दूसरी भारतीय भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर होना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि सरकारें और शिक्षण संस्थान उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और प्रशासनिक कामकाज में हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा दें और विज्ञान, तकनीक तथा शोध से जुड़ी गुणवत्तापूर्ण सामग्री भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराएं, ताकि भाषा किसी विद्यार्थी की प्रगति में बाधा न बने। डिजिटल युग ने हिंदी के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट, सामाजिक मीडिया और डिजिटल शिक्षा के माध्यम से हिंदी को दुनिया के करोड़ों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। हमें अंग्रेजी अवश्य सीखनी चाहिए, लेकिन अपनी भाषा के प्रति हीन भावना नहीं रखनी चाहिए। विदेशी भाषा का ज्ञान हमारी ताकत हो सकता है, लेकिन अपनी भाषा और संस्कृति से दूरी हमारी कमजोरी बन सकती है। हिंदी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि हम सभी की है। घर, विद्यालय, कार्यालय और डिजिटल माध्यमों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग से ही इसे मजबूत आधार मिल सकता है। हिंदी को केवल हिंदी दिवस तक सीमित रखने के बजाय इसे शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, तकनीक और दैनिक जीवन का सशक्त माध्यम बनाना होगा। साथ ही, हिंदी के विकास के साथ देश की सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान और संरक्षण भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। आखिरकार, अपनी भाषा का सम्मान अपनी संस्कृति, पहचान और आत्मविश्वास का सम्मान है। यही भावना भारत की भाषाई विविधता को उसकी वास्तविक शक्ति बनाती है। हिंदी को उसका उचित सम्मान और स्थान दिलाना केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करने का संकल्प है।
लेखक
डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत
(Dr. Brahmanand Rajput)
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